जब देश के कई हिस्सों में फर्ज़ी मुठभेड़ और बुल्डोजर जस्टिस को प्रशासनिक नीति का हिस्सा बना लिया गया है, मद्रास हाई कोर्ट ने यातना के विरुद्ध नागरिकों के मौलिक अधिकार को इतनी गंभीरता से लिया, ये काबिल-ए-तारीफ है।
दो व्यक्तियों की हिरासत में मौत के मामले में नौ पुलिसकर्मियों को सजा-ए-मौत सुनाया जाना आज के दौर में असाधारण घटना है। जब देश के कई हिस्सों में फर्ज़ी मुठभेड़ और बुल्डोजर जस्टिस को प्रशासनिक नीति का हिस्सा बना लिया गया है, मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने यातना के विरुद्ध नागरिकों के मौलिक अधिकार के उल्लंघन को इतनी गंभीरता से लिया, ये काबिल-ए-तारीफ है। मामला जून 2020 में कोविड संबंधी प्रतिबंधों के दौरान तय से अधिक समय तक मोबाइल रिपेयर की दुकान खोले रखने से संबंधित था। महज इतनी-सी जुर्म के लिए पुलिस कर्मियों ने 59 वर्षीय जयराज को हिरासत में ले लिया। जब उन्हें छुड़ाने उनके 31 वर्षीय बेटे बेनिक थाने गए, तो उन्हें भी हवालात में डाल दिया गया। वहीं दोनों की मौत हो गई।
मजिस्ट्रेट की जांच के दौरान उनके शरीर पर गंभीर किस्म के 18 जख्म पाए। इनमें जलने के निशान भी थे। डॉक्टरों की टीम ने पुष्टि की कि दोनों की मौत उन्हीं जख्मों के कारण हुई। इस पर भड़के जन विरोध के मद्देनजर मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। हाई कोर्ट ने सीबीआई की इस दलील को स्वीकार किया है कि हिरासत में रात भर दी गई यातना पूर्व-नियोजित थी, इसलिए आरोपियों को अधिकतम संभव दंड मिलना चाहिए। सजायाफ्ता पुलिसकर्मियों के पास अभी सुप्रीम कोर्ट में जाने का विकल्प है। मगर अब तक की न्यायिक कार्यवाही से स्पष्ट है कि जब देश महामारी से गुजर रहा था, उन पुलिसकर्मियों ने अपने अधिकार का दुरुयोग किया।
दो आम नागरिकों को हिरासत में लेकर उन्होंने उनकी जान ले ली। उनका मकसद क्या था, इस बारे में अनुमान ही लगाए जा सकते हैं। मगर ऐसी घटना किसी रूप में क्षम्य नहीं है। डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल सरकार के मामले में 1997 में सर्वोच्च न्यायालय ने हिरासत में मौतों को अत्यधिक गंभीरता से लेते हुए इस बारे में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए थे। लेकिन उसके बाद देश का माहौल बदलता चला गया, जिससे नागरिक अधिकार पृष्ठभूमि में चले गए। मगर मद्रास हाई कोर्ट ने अपने ताजा फैसले से उन अधिकारों को फिर बल प्रदान किया है।


