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अज़ीब मुकाम है यह!

सोनिया

सोनिया गांधी अपने अनुभव सुनाना चाहती हैं, तो आखिर उसका अवसर उन्हें क्यों नहीं मिलना चाहिए? अगर उनकी टिप्पणियां पूर्वाग्रह भरी हुईं, तो उनसे आहत पक्ष के पास जवाब देने का पूरा अवसर मौजूद रहेगा।

कहने को तो भारत लोकतंत्र है, लेकिन यहां विपक्ष के सर्व-प्रमुख नेताओं तक को अपनी कहानी बताने की आजादी नहीं है! सोनिया गांधी नरेंद्र मोदी या आरएसएस के बारे में अपने अनुभव या अपनी राय सुनाना चाहती हैं, तो आखिर उसका अवसर उन्हें क्यों नहीं मिलना चाहिए? भारत- चीन संबंध से जुड़ी किसी घटना पर उनकी राय को देश के सामने आने से क्यों रोका जाना चाहिए? अगर उनकी टिप्पणियां पूर्वाग्रह भरी होंगी या उनसे कोई गलतबयानी सामने आएगी, तो उससे आहत व्यक्ति या पक्ष के पास जवाब देने का अवसर तो मौजूद ही रहेगा। एक बार एक फिल्म पर प्रतिबंध से संबंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि असहमत व्यक्ति फिल्म ना देखने या अभिव्यक्ति के अपने माध्यम से उसका जवाब देने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन लोकतंत्र में कलाकृति या वैचारिक अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध का कोई औचित्य नहीं है।

लेकिन ये उस दौर की बात है, जब प्रतिबंध सरकार का विशेषाधिकार समझा जाता था। तब परोक्ष दबाव या सामाजिक ट्रोलिंग के जरिए अघोषित प्रतिबंध का चलन नहीं था। ताजा मामले में प्रत्यक्ष रूप से सरकार कहीं मौजूद नहीं है। मगर देश के मौजूदा सियासी माहौल का गहरा साया इस पर साफ देखा जा सकता है। सोनिया गांधी की आत्म-कथा- ‘बिलॉन्गिगः ए जर्नी ऑफ लव’ को जो प्रकाशक अमेरिका में छाप रहा है, खबरों के मुताबिक उससे ही जुड़े भारतीय प्रकाशक ने भारत में इसे जारी करने से इनकार कर दिया है।

बताया जाता है कि भारतीय संस्करण में सोनिया गांधी से कुछ हिस्सों को हटाने को कहा गया, जिससे उन्होंने मना कर दिया। गुजरे सवा दशक में उसी प्रकाशक ने भारत में कई किताबों को इसीलिए नहीं प्रकाशित किया, क्योंकि उससे सत्ता या अन्य शक्तिशाली पक्षों के नाराज होने का अंदेशा था। जबकि कुछ लेखकों ने प्रकाशकों के दबाव में “आपत्तिजनक” हिस्से हटा कर किताब छपवा लेना बेहतर समझा। ऐसा करने से सोनिया गांधी का इनकार काबिल-ए-तारीफ निर्णय है। मगर इस घटनाक्रम ने भारत में अभिव्यक्ति के सिकुड़ते दायरे को जग-जाहिर कर दिया है, जिससे लोकतंत्र की स्थिति पर उठे सवाल और संगीन हो गए हैं।

By NI Editorial

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