जिस प्रक्रिया से 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम काटे गए हैं, उस पर तीन में से दो निर्वाचन आयुक्तों का भी भरोसा नहीं रहा, तो नई मतदाता सूची की क्या विश्वसनीयता होगी?
मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (एसआईआर) को जिस तरह आगे बढ़ाया गया, उस पर निर्वाचन आयोग के भीतर गहरे मतभेद थे। निर्वाचन आयुक्तों एस.एस. संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों के दौरान 14 बार अपनी गंभीर आपत्तियां दर्ज कराईं। एक अंग्रेजी अखबार की खोजी रिपोर्ट के मुताबिक इन आपत्तियों के तहत उन दोनों सदस्यों ने मतदाता सूची से नाम काटने और जोड़ने में मामले में उनको अंधेरे में रखने, नए वोटरों को जोड़ने की ‘अनधिकृत’ प्रक्रिया अपनाने, तथा राज्यों के अधिकारियों को नजरअंदाज करते हुए सारे अधिकार ‘दिल्ली में केंद्रित’ करने की शिकायत की। उन्होंने वोटर सॉफ्टवेयर की साख पर चिंता जताई। यहां तक कि अपनी शिकायतों को लेकर उन्होंने कैबिनेट सचिव का दरवाजा खटखटाया।
द इंडियन एक्सप्रेस की ताजा रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि एसआईआर को लेकर सार्वजनिक दायरों में जो संदेह और एतराज हैं, उन्हें आयोग के अंदर भी जताया गया। निर्वाचन आयोग के अंदर मतभेद के मामले पहले भी सामने आए हैं, लेकिन जिस स्तर पर एसआईआर के मामले में हुआ, वह अभूतपूर्व है। इसका अर्थ है कि सबकी आपत्तियों को ठुकराते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बुल्डोजरी अंदाज में इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। ऐसा वे कैसे कर पाए और इसके लिए उन्हें कहां से ताकत मिली, इस पर अब स्वाभाविक कयास लगाए जाएंगे।
जिस प्रक्रिया से 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम काटे गए हैं, कई जगहों पर सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी से वैध नाम काटने के तथ्य सामने आए, और नए वोटर शामिल करने की प्रक्रिया पर विपक्षी खेमों से लगातार शक जताए गए, उस पर तीन में से दो निर्वाचन आयुक्तों का भी भरोसा नहीं रहा, तो आखिर नई मतदाता सूची की क्या विश्वसनीयता रहेगी? और क्या इनके आधार पर होने वाले चुनावों पर आम जन का यकीन बना रहेगा? ये अत्यंत गंभीर प्रश्न हैं। इसलिए इस पूरी मशक्कत को पलटने की जरूरत है। नई सूची रद्द कर पुरानी सूची अविलंब बहाल की जानी चाहिए। एसआईआर अगर जरूरी है, तो अब यह अनिवार्य हो गया है कि पहले इसकी प्रक्रिया पर सबको भरोसे में लेकर इसे दोबारा संपन्न किया जाए।
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