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जान देना समाधान नहीं

व्यापक जन गोलबंदी के जरिए राजनीतिक ताकत बनाने के बजाय नैतिक दबाव से मांग पूरी करवाने की सोच हमेशा से समस्याग्रस्त रही है। इस प्रश्न पर अब फिर से व्यापक बहस की जरूरत है।

सोनम वांगचुक से अनेक विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, और प्रमुख शख्सियतों ने भूख हड़ताल खत्म करने की अपील की है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के समर्थन में ढाई हफ्तों से अधिक समय से अनशन कर रहे 59 वर्षीय वांगचुक की सेहत काफी बिगड़ चुकी है। यही स्थिति उनके साथ अनशन कर रहे छह छात्रों की भी है। इन सब ने सरकार पर नैतिक दबाव बनाने और लोगों में जागरूकता लाने के लिए ये रास्ता अपनाया है। मुद्दा परीक्षा व्यवस्था ढहने की जवाबदेही तय करने का है। इसी मकसद से कोकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) से जुड़े नौजवानों ने लगभग चार हफ्तों से दिल्ली में धरना दे रखा है।

मगर केंद्र ने अब तक इन लोगों की खोज-खबर नहीं ली है। नतीजतन, जंतर-मंतर पर एक तरह का गतिरोध बन गया है। असहमति की हर आवाज और हर जन प्रतिरोध को अवैध एवं अनुचित मानने वाली नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में ऐसी गतिरोधों का लंबा सिलसिला है। सीजेपी का प्रतिरोध उसकी नई कड़ी बनता दिख रहा है। नतीजतन अनशनकारियों की जान खतरे में पड़ती दिख रही है। शिक्षा एवं जलवायु संरक्षण के क्षेत्रों में वांगचुक के अनूठे प्रयोगों से परिचित लोगों का उनकी, एवं अपने उद्देश्य के लिए अपनी जान को दांव पर लगाने वाले नौजवानों की जिंदगी के लिए चिंतित होना लाजिमी है।

वैसे ये सवाल भी महत्त्वपूर्ण है कि किसी राजनीतिक मांग को पूरा कराने के लिए आमरण अनशन का सहारा लेना कितना उचित समझा जाना चाहिए? व्यापक जन गोलबंदी के जरिए राजनीतिक ताकत बनाने के बजाय नैतिक दबाव से मांग पूरी करवाने की सोच हमेशा से समस्याग्रस्त रही है। इस प्रश्न पर अब फिर से व्यापक बहस की जरूरत है। ये चर्चा इसलिए भी अनिवार्य हो गई है, क्योंकि इस वक्त हम जिस मुकाम पर हैं, उसमें सत्ता का एक खास स्वरूप उभरा है, जब वह विरोधियों एवं विपक्ष के प्रति एक हद तक निर्मम और असंवेदनशील हो गई दिखती है। इसी के मद्देनजर वांगचुक और उनके साथी छात्रों से अनशन खत्म करने की गुजारिश की गई है। उन सबकों यह आग्रह अवश्य स्वीकार कर लेना चाहिए।

By NI Editorial

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