एनएचआरसी के बारे में जस्टिस श्रीधरन की टिप्पणी इस धारणा की पुष्टि करती है कि संवैधानिक/वैधानिक संस्थाएं अपना काम करने के बजाय किसी राजनीतिक परियोजना से संचालित हो रही हैं।
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने 588 मदरसों पर लगे आरोप की जांच करने का आदेश उत्तर प्रदेश सरकार को दिया। इल्जाम है कि ये मदरसे राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से अनुदान हासिल करते हैं, लेकिन इमारत, फर्नीचर, हॉस्टल आदि के मामलों में बुनियादी शैक्षिक मानदंडों का पालन नहीं करते। एनएचआरसी के इस आदेश को टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया और अन्य कई पक्षों ने हाई कोर्ट में चुनौती दी। वहां न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति विवेक शरण की बेंच ने एनएचआरसी के आदेश पर रोक लगा दी।
लेकिन निर्णय सुनाने के क्रम में उन्होंने जो टिप्पणियां कीं, उनसे उनके मतभेद जाहिर हुए। जस्टिस शरण का कहना था कि चूंकि एनएचआरसी की तरफ से कोर्ट में कोई मौजूद नहीं हुआ, अतः उसके खिलाफ नकारात्मक टिप्पणी करना उचित नहीं है। जबकि जस्टिस श्रीधरन ने एनएचआरसी की कुल भूमिका पर सख्त आलोचनात्मक बातें कहीं। कहा कि जब मुसलमानों पर अत्याचार या उनकी लिंचिंग होती है, तो एनएचआरसी उन घटनाओं का संज्ञान नहीं लेता। उन्होंने ध्यान दिलाया कि एनएचआरसी का गठन मानव अधिकार अधिनियम 1993 के तहत हुआ था। उस कानून में मानव अधिकार की परिभाषा मौजूद है। उसके मुताबिक वे अधिकार इस दायरे में आएंगे, जिन्हें भारतीय संविधान में व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा को सुनिश्चित करने के लिए शामिल किया गया है।
साथ ही जो अंतरराष्ट्रीय संधियां भारत में लागू हैं, उनमें वर्णित अधिकार भी मानव अधिकार के दायरे में आते हैं। न्यायमूर्ति श्रीधरन ने कहा कि ऐसे अधिकारों की रक्षा तक खुद को सीमित रखने के बजाय एनएचआरसी वैसे मामलों में दखल दे रहा है, जिन्हें सामान्यतः संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत जन हित याचिका के जरिए अदालतों के सामने लाया जाना चाहिए। आज के दौर में संवैधानिक या वैधानिक संस्थाओं की बनी भूमिका के संदर्भ में ये टिप्पणी बेहद अहम है। यह इस आम धारणा की पुष्टि करती है कि ये संस्थाएं अपेक्षित कार्य करने के बजाय किसी राजनीतिक परियोजना से संचालित हो रही हैं। अतः जस्टिस शरण की आपत्ति तकनीकी रूप से जायज है, लेकिन जस्टिस श्रीधरन ने जो कहा, उसका संदर्भ व्यापक है।


