कुल मिला कर द्विपक्षीय संबंध रूस के पक्ष में बेहद झुका हुआ है। उसका क्या समाधान पुतिन पेश करेंगे? उधर रूस और चीन के हित एक दूसरे के संपूरक बने हुए हैं, जबकि यह पहलू भारत के नजरिए एक समस्या है।
नई दिल्ली आने से ठीक पहले व्लादीमीर पुतिन ने भारत- रूस के संबंध के बारे में अपना टेम्पलेट सामने रखा है। उन्होंने संदेश दिया कि वे भारत से वैसी ही ‘असीमित दोस्ती’ चाहते हैं, जैसी उन्होंने चीन के स्थापित की है। पुतिन ने कहा- ‘चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हमने आर्थिक मुद्दों पर ठोस वार्ता कायम की है। भारत यात्रा के दौरान हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी इन मुद्दों पर विस्तार से बातचीत करेंगे। इनमें रूसी बाजार में भारतीय उत्पादों का आयात बढ़ाना भी शामिल है।’
यही संदेश देने के लिए क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने भारतीय पत्रकारों से ऑनलाइन बातचीत की। उन्होंने कहा- ‘हमारा चीन के साथ असीमित सहयोग बना है। भारत के बारे में भी हमारा वही रुख है। रूस वहां तक जाने को राजी है, जहां तक भारत तैयार हो।’ पेस्कोव ने संकेतों में यह भी कहा कि भारत को रूस से अपने संबंध तय करने में अमेरिकी हस्तक्षेप का ख्याल नहीं करना चाहिए। उन्होंने एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली और सुखोई-57 लड़ाकू विमान भारत को बेचने की पेशकश की। उम्मीद जताई भारत रूस से कच्चा तेल खरीदता रहेगा। मगर भारत में चिंता यह है कि ये रूसी मंशाएं पूरी हुईं, तो उसका खराब असर अमेरिका से रिश्तों पर पड़ेगा। फिर बढ़ते व्यापार घाटे की भारत की अपनी चिंताएं भी हैँ।
भारत इस समय रूस को जितना निर्यात करता है, उससे लगभग 17 गुना ज्यादा आयात कर रहा है। इसके अलावा अप्रैल 2000 से सितंबर 2025 तक भारत में प्रत्यक्ष रूसी निवेश महज 1.33 बिलियन डॉलर का हुआ, जबकि रूस में 12.8 बिलियन डॉलर का भारतीय निवेश हुआ है। तो कुल मिला कर द्विपक्षीय संबंध रूस के पक्ष में बेहद झुका हुआ है। उसका क्या समाधान पुतिन पेश करेंगे? दरअसल, रूस और चीन के हित संपूरक बने हुए हैं, जबकि यह पहलू भारत के नजरिए एक समस्या है। इस कारण भारत- चीन विवाद में रूस निष्पक्ष रुख लेने की स्थिति में नहीं रह गया है। ये सारे वो पेच हैं, जिन्हें खोले बिना भारत और रूस की दोस्ती शायद “असीमित” रूप ना ले पाए।


