मुद्दा है कि प्राइवेट सेक्टर की एक कंपनी को सरकार ने बड़ी राहत दी, तो किस तर्क पर वह दूसरी कंपनियों को ऐसी राहत देने से इनकार कर सकती है? स्पष्टतः यह मुसीबत खुद केंद्र ने मोल ली है।
केंद्र ने वोडोफोन आइडिया कंपनी को दो बार बेलआउट दिया। पहली बार उसमें 49 प्रतिशत हिस्सा खरीद कर और अभी हाल में उस पर बकाया रकम को चुकाने की अवधि में दस साल की छूट देकर। वोडाफोन आडिया पर एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (एजीआर) मद में लगभग 85 हजार करोड़ रुपये से अधिक का बकाया है। ऐसा बकाया अन्य कंपनियों पर भी है। अब खबर है कि टाटा ग्रुप की दो कंपनियों- टाटा टेलीसर्विसेज और टाटा टेलीसर्विसेज महाराष्ट्र लिमिटेड तथा भारती एयरटेसल ने वोडाफोन आइडिया जैसी राहत की मांग की है। टाटा ग्रुप की दोनों कंपनियों पर सवा 19 हजार करोड़ और भारती एयरटेल पर 48 हजार करोड़ रुपये बकाया हैं।
कंपनी अधिकारियों ने कहा है कि सरकार को सभी टेलीकॉम कंपनियों से समान व्यवहार करना चाहिए। इसलिए जब तक इस बारे में फैसला नहीं होता, वे बकाये का भुगतान रोक रहे हैं। इन कंपनियों ने अदालत जाने का इरादा भी जताया है, हालांकि वोडाफोन मामले में सुप्रीम कोर्ट निर्णय दे चुका है कि ऐसे फैसले सरकार के दायरे में आते हैं। गौरतलब है कि एजीआर मद में रिलायंस जियो इन्फोकॉम पर 1,700 करोड़, बीएसएन पर चार करोड़ और एमटीएनएल पर पौने 13 हजार करोड़ रुपये बकाया हैं। देर-सबेर ये कंपनियां भी सरकार राहत की मांग कर सकती हैं। मुद्दा है कि प्राइवेट सेक्टर की एक कंपनी को सरकार ने बड़ी राहत दी, तो किस तर्क पर वह दूसरी कंपनियों को ऐसी राहत देने से इनकार कर सकती है?
स्पष्टतः यह मुसीबत खुद केंद्र ने मोल ली है। मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक धन से किसी कंपनी को संभालने की सोच समस्याग्रस्त है। ऐसे फैसलों से अक्सर पक्षपात या भेदभाव की धारणाएं बनती हैं, जो व्यापक अर्थ भ्रष्ट आचरण समझी जाती हैं। यह तर्क बेबुनियाद है कि बाजार में प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए करदाताओं का पैसा कंपनियों को दिया जाता है। यह मकसद सिर्फ स्पष्ट विनियमन और उस पर सख्त अमल से हासिल किया जा सकता है। स्वस्थ स्थिति यह होगी कि फेल होती कंपनी को आसान शर्तों पर दिवालिया होने दिया जाए। मगर आज के भारत के कथा ही उलटी है।
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