महाराष्ट्र का नगर निकाय का चुनाव असदुद्दीन ओवैसी के लिए बड़े मायने वाला साबित हुआ है। उनकी पार्टी के 90 से ज्यादा पार्षद जीते हैं। संभाजीनगर में उनकी पार्टी दूसरे स्थान पर आई है तो मालेगांव में हो सकता है कि उनकी पार्टी का मेयर बने। मुंबई सहित कई और शहरों में ओवैसी की पार्टी एमआईएम को अच्छी कामयाबी मिली है। गौरतलब है कि हैदराबाद से बाहर महाराष्ट्र पहला राज्य था, जहां ओवैसी की पार्टी लोकसभा चुनाव जीती थी। औरंगाबाद में उसके इम्तियाज जलील सांसद हुए थे। औरंगाबाद का नाम अब संभाजी नगर है, जहां ओवैसी की पार्टी का प्रदर्शन बहुत अच्छा हुआ है। अहिल्यानगर में भी पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया है।
सवाल है कि कांग्रेस, उद्धव ठाकरे की शिव सेना और शरद व अजित पवार दोनों की एनसीपी के होने के बावजूद ओवैसी की पार्टी के प्रति इतना मुस्लिम रूझान क्यों देखने को मिला? यह मुस्लिम समुदाय में और खास कर उसके युवाओं में आ रहे बदलाव का संकेत है। मुस्लिम युवा अब अपनी लीडरशिप के लिए वोट कर रहे हैं। वे सेकुलर राजनीति करने वाली दूसरी पार्टियों को वोट देने की बजाय मुस्लिम लीडर वाली पार्टी चुन रहे हैं।
तभी बिहार के सीमांचल में भी मुस्लिमों ने राजद, कांग्रेस और लेफ्ट सबको छोड़ कर ओवैसी की पार्टी को वोट किया और उनके पांच विधायक जीते। यह मुस्लिम बहुलता वाले राज्यों में मुस्लिम वोट की राजनीति करने वाले सभी नेताओं, जिनमें अखिलेश यादव से लेकर तेजस्वी यादव और ममता बनर्जी तक सब शामिल हैं, उनके लिए अच्छा संकेत नहीं है। कांग्रेस के लिए भी यह एक मैसेज है। वह मुस्लिम वोट को फॉर गारंटीड नहीं ले सकती है। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में खासतौर से कांग्रेस और ममता बनर्जी को इस बारे में सोचने की जरुरत है।


