अगर हकीकत यह नहीं होती कि मोदी प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते, या प्रश्न पहले से तय किए बिना इंटरव्यू नहीं देते, तो नॉर्वे की घटना को कोई तव्वजो नहीं देता। ना ही स्वेंडसन भारत में इतनी बहुचर्चित हो जातीं।
साधारण-सा सवाल था और वो भी यह कि आप कुछ सवालों के जवाब क्यों नहीं देते? नरेंद्र मोदी चाहते तो उसी समय नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग स्वेंडसन के प्रश्नों का उत्तर दे सकते थे। संभवतः इस तर्क पर कि सवाल- जवाब का कार्यक्रम पूर्व निर्धारित नहीं था, मोदी पत्रकार को नजरअंदाज कर आगे बढ़ गए। सामान्य स्थिति में यह कोई ऐसी बात नहीं होती, जो भारतीय में जनमत में तीखे ध्रुवीकरण का मुद्दा बन जाती। मगर तीन दिन से इस मुद्दे पर शोर मचा हुआ है, तो यह भारत के राजनीतिक माहौल के किसी गंभीर रोग से ग्रस्त हो जाने का संकेत है।
मोदी समर्थक खेमे ने स्वेंडसन के इतिहास- भूगोल की तलाश में पूरी ऊर्जा लगा रखी है। ज्यादा कुछ नहीं मिला, तो शायद किसी पर्यटन स्थल पर की बिकनी में उसकी तस्वीर ही ढूंढ लाए- यह बताने के लिए इसी पत्रकार के सवाल को भाजपा विरोधी खेमे ने मुद्दा बना रखा है! मगर मुद्दा स्वेंडसन नहीं हैं। मसला यह है कि “दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र” के प्रधानमंत्री उत्तरदायित्व की अपेक्षाओं को ठेंगे पर रखते हैं। अगर हकीकत यह नहीं होती कि मोदी प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते, या बिना पहले से तय प्रश्नों और सहमना पत्रकार के इंटरव्यू नहीं देते, तो नॉर्वे की घटना को कोई तव्वजो नहीं देता। ना ही स्वेंडसन भारत में एक सनसनीखेज व्यक्तित्व के रूप में बहुचर्चित हो जातीं।
पश्चिम में पत्रकार नेताओं पर सवाल-दर- सवाल दागते हैं। इसे वहां नेताओं की लोकतांत्रिक जवाबदेही तय करने का तरीका समझा जाता है। सवाल पूछने की आजादी को वहां लोकतंत्र का अनिवार्य पहलू माना जाता है। दरअसल, कुछ वर्ष पहले तक भारत में भी ऐसी ही मान्यता थी। चूंकि मोदी इस अपेक्षा के विपरीत आचरण करते हैं, इसलिए ये धारणा अपने-आप में एक मुद्दा बन गई है कि भारतीय प्रधानमंत्री खुद को सवालों से ऊपर मानते हैं! भारत के मेनस्ट्रीम मीडिया ने प्रधानमंत्री की इच्छा के मुताबिक खुद को ढाल लिया है। नतीजतन, अंतरराष्ट्रीय प्रेस फ्रीडम सूचकांकों में उसका दर्जा गिरता गया है। नॉर्वे की घटना से ये दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गई है।


