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नदियों की देवी पूजा जैसे यमुना जयंती

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यमुना एक देवी के रूप में पूजित हैं। ऋग्वेद में गंगा, यमुना, सरस्वती, सिंधु, सरयू, गोमती आदि कुल 99 नदियों का उल्लेख है। गंगा, यमुना का उल्लेख ऋग्वेद के दशम मंडल 1028 सूक्त में हुआ है। ऋग्वेद में जहाँ गंगा नदी का वर्णन सिर्फ एक बार हुआ है, वहीं इसमें यमुना का उल्लेख तीन बार हुआ है। इन्हें महिमामयी एवं महत्वशालिनी माना गया है। वेदों में सात नदियों का विशेष वर्णन है।

वैदिक मत इस संसार को एक सतत अभिनव सृजन मानती है। इस निरंतर सृष्टि प्रक्रिया को ब्रह्मयज्ञ कहा गया है। इस सृष्टि प्रक्रिया में यह सृष्टि एक विराट चेतना समुद्र है, और नदियाँ इस चेतना की विविध प्रणालियों के समान हैं। इसलिए वे ब्रह्मद्रव हैं। गंगा-यमुना का विशेष महत्व होने के कारण उन्हें बारम्बार ब्रह्मद्रव कहते हुए उनकी महिमागान की गई है। भारतीय संस्कृति में गंगा, यमुना आदि नदियों को देवी माना और दैवीय रूप में पूजा जाता है। उत्तर भारत में गंगा नदी के साथ -साथ अत्यंत प्राचीन काल से उसकी सहायक नदी के रूप में बहने वाली यमुना नदी को भारतीय संस्कृति में पवित्र नदी माना गया है। यमुना नदी का नाम यमुनोत्री से उद्गम होने व यम की बहन होने के कारण यमुना पड़ा। यमुना को जमुना यमी नाम से भी जाना जाता है। हिमालय के हिमाच्छादित श्रृंग बंदरपुच्छ में स्थित कालिंदी पर्वत से निकलने के कारण और इसके जल का रंग श्यामल होने के कारण इसे कालिंदजा अथवा कालिंदी नाम से भी जाना जाता है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार विश्वकर्मा की पुत्री संजना (संज्ञा) से उत्पन्न सूर्यदेव की पुत्री यमुना कहलाई। मृत्यु के देवता यमराज इनके अग्रज भ्राता व शनिदेव इनके अनुज हैं। वैष्णव मतानुसार यमुना भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी हैं। पौराणिक मान्यतानुसार चैत्र मास में शुक्ल पक्ष षष्ठी को देवी यमुना पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। इसलिए इस दिन को यमुना जयंती के रूप में जाना जाता है। और यमुना का जन्मोत्सव मनाया जाता है। यह उत्सव नववर्ष प्रतिपदा के नाम से प्रचलित चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होने वाली वासन्तीय नवरात्रि के दौरान छठ पर्व नाम से प्रचलित चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी को स्थानीय तौर पर भी श्रद्धालु भक्तों द्वारा धूमधाम व हर्षोल्लास पूर्वक मनाया जाता है। नदियों को पूजा जाता है। उनकी महिमागान की जाती है। इस दिन नदियों व जलाशयों में माता षष्ठी की पूजा -अर्चना का विधान होने के कारण इसे यमुना षष्ठी अथवा यमुना छठ भी कहा जाता है। इस वर्ष 2023 में चैत्र शुक्ल षष्ठी 27 मार्च, सोमवार को यमुना जयंती मनाई जा रही है।

भारतीय संस्कृति में यमुना का महत्व अत्यंत प्राचीन काल से ही रहा है। और यमुना एक देवी के रूप में पूजित हैं। ऋग्वेद में गंगा, यमुना, सरस्वती, सिंधु, सरयू, गोमती आदि कुल 99 नदियों का उल्लेख है। गंगा, यमुना का उल्लेख ऋग्वेद के दशम मंडल 1028 सूक्त में हुआ है। ऋग्वेद में जहाँ गंगा नदी का वर्णन सिर्फ एक बार हुआ है, वहीं इसमें यमुना का उल्लेख तीन बार हुआ है। इन्हें महिमामयी एवं महत्वशालिनी माना गया है। वेदों में सात नदियों का विशेष वर्णन है। यह सात चेतना प्रवाह रूप हैं। उन्हें ही उषा की गौएँ, सूर्य के सात  घोड़े तथा सात अग्नि रूप कहा है। स्वामी दयानन्द सरस्वती के अनुसार गंग, यमुना नाम दो नाडि़यों का है, और यह स्थान योगाभ्यास का है।

वैदिक विद्वान वेद में इतिहास अथवा ऐतिहासिक वर्णन का होना नहीं मानते, फिर भी कतिपय विद्वान ऋग्वेद में सिन्धु और सरस्वती के साथ ही गंगा, यमुना आदि नदियों का वर्णन मानते है। ऋग्वेद के अनुसार यमुना और शतुद्रि (सतलज) के मध्य सरस्वती की अवस्थिति (यमुने सरस्वति शतुद्रि- ऋग्वेद 10/75/5) थी। ब्राह्मण ग्रन्थों, श्रौतसूत्रों एवं पुराणादि ग्रन्थों में जिस प्रकार सरस्वती के उद्गम स्थान को प्लक्ष प्राश्रवण (प्लाक्ष प्रस्त्रवन) कहा गया है, उसी प्रकार यमुना नदी के उद्गम स्थल को प्लाक्षावतरण कहा गया है। जैमिनीय ब्राह्मण 4/26/12 के अनुसार सरस्वती का उद्गम स्थान प्लक्ष प्रास्त्रवन, एवं आश्वलायन श्रौतसूत्र 12/6/1 के अनुसर प्लाक्ष प्रस्त्रवन के निकट ही यमुना का उद्गम स्थल प्लाक्षावतरण भी था।

महाभारत वनपर्व 129/13-14, 21-23 के अनुसार भी यमुना के उद्गम स्थल प्लाक्षातरण के निकट ही सरस्वती भी प्रवाहित थी, और उसी स्थान पर सरस्वती भूमि के गर्त्त में अन्तर्निहित हुई। वह ताण्डय ब्राह्मण 25/10/6 के अनुसार विनशन कहा जाता था। और यह विनशन सम्प्रति कोलायत, बीकानेर के दक्षिण-पश्चिम-दक्षिण हुआ था। सरस्वती-प्रवाह के लुप्त होने को विनशन तथा कई बार इसकी धारा पुनः प्रकट हो जाती थी, जिसे उद्भेद कहा जाता था। कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार सरस्वती प्रवाह के लुप्त हो जाने की स्थिति में सरस्वती के सूखे तट पर विनशन में शुक्ल पक्ष की सप्तमी को होने वाली धार्मिक अनुष्ठान अथवा यज्ञादि के दीक्षा की समाप्ति तो प्लक्ष प्रास्त्रवन पहुँच कर ही लोग करते थे, लेकिन कारपचव देश में प्रवाहित यमुना में (सरस्वती में जल होने पर भी उसमें नहीं) अवभृथ स्नान करने का विधान था।

यमुना का वर्णन महाभारत वनपर्व एवं शल्य पर्व तथा वामन पुराण सरोवर महात्म्य, ब्रह्म पुराण,कूर्म पुराण, पद्म पुराण, वृह्न्नारदीय पुराण, स्कन्द पुराण, वृह्द्धर्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृति खण्ड) आदि ग्रन्थों में अंकित हैं। महाभारत में पाण्डव तीर्थयात्रा के क्रम में कहा गया है कि यमुना के उद्गम स्थल प्लाक्षवतरण से पुण्यसलिला सरस्वती दिखलाई पडती है। इससे स्पष्ट पत्ता चलता है कि सरस्वती का उद्गम स्थल प्लक्ष प्रास्त्रवण यमुना के उद्गम स्थल प्लाक्षावतरण के नजदीक ही थी। वामन पुराण सरोवर महात्म्य 11/3 एवं महाभारत वनपर्व 84/7एवं शल्य पर्व 54/11 के अनुसार सरस्वती की उत्पति के सम्बन्ध सौगन्धिक वन के आगे प्लक्ष (पांकड़) वृक्ष की जड़ की बांबी प्लक्ष प्रास्त्रवण से कही गई है। उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद, ब्राह्मण ग्रन्थों, श्रौतसूत्रों एवं पुराणादि ग्रन्थों में सरस्वती तट पर वैदिकों के निवास की प्राचीनता का संकेत मिलता है। विद्वानों के अनुसार भरतों की आदिम वासभूमि सरस्वती तटवर्त्ती भूमि (सारस्वत प्रदेश) ही थी।

वहीं उन्होंने सर्वप्रथम यज्ञाग्नि जलाई थी, किन्तु सरस्वती के उद्गम स्थान पर हिमराशि का गलकर समाप्त हो जाने, जलग्रहण क्षेत्र से ही यमुना व अन्य नदियों के द्वारा सरस्वती के जल का कर्षण कर लिये जाने आदि भौगोलिक कारणों से खय्याति प्राप्त सरस्वती का प्रवाह बहुधा परिवर्तित होता रहता था। भौगोलिक कारणों से सरस्वती वैदिक काल में ही क्षीण होते-होते सूखने भी लगी थी। मान्यता है कि उद्गम स्थल से सरस्वती का जल यमुना ने ही सबसे अधिक कर्षित किया। इसी कारण यह मान्यता बनी कि यमुना नदी उत्तराखंड के यमुनोत्री से निकलकर ब्रजमंडल से होते हुए प्रयागराज में संगम पर गुप्त रूप से बह रही सरस्वती और गंगा के साथ मिलती है।

पौराणिक व संहिता ग्रन्थों में भी यमुनादि नदियों के धार्मिक- आध्यात्मिक व अन्य महत्व के सम्बन्ध में विशद वर्णन अंकित हैं। शिव के कारण यमुना का जल श्यामवर्ण होने के सम्बन्ध में वामन पुराण में एक कथा अंकित है। कथा क अनुसार अपने पिता दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में अपने पति शिव की उपेक्षा एवं तिरस्कार से आहत सती के योगाग्नि द्वारा भस्मीभूत हो जाने पर व्यग्र शिव यमुना-जल में कूद पड़े। इससे यमुना कृष्णवर्णा (कृष्णा) हो गईं। श्रीकृष्ण अवतार में श्रीकृष्ण ने अपने जन्म दिन भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की रात्रि को ही यमुना नदी पार की थी। और श्रीकृष्ण के भाई ने यमुना नदी को अपने हल से दो भागों में बांट दिया था। इसलिए बलराम का नाम यमुना भेद पड़ा। एक अन्य मान्यतानुसार  श्रीराधा-माधव के जलविहार से श्रीराधा के तन में लिप्त कस्तूरी घुलकर यमुना जल को श्यामल कर रही है। यह भी मान्यता है कि श्यामसुंदर के यमुना में अवगाहन करने से उनका श्यामवर्ण हो गया। भारत में श्रीकृष्ण ब्रज संस्कृति का जनक कहे जाते हैं, तो यमुना को ब्रज संस्कृति की जननी मानी जाती है।

यमुना सत्यरूप में ब्रजवासियों की माता है। यही कारण है कि सम्पूर्ण ब्रज क्षेत्र में इन्हें यमुना मैया कहा जाता है। गर्ग संहिता के अनुसार गोलोक में श्रीकृष्ण ने राधा से भूतल पर अवतरित होने का आग्रह किया था। इस पर राधा ने प्रत्युत्तर में कहा कि जहाँ वृंदावन, यमुना व गोवर्धन न हो, वहाँ जाकर सुखानुभूति कैसे सकती है? तब श्रीकृष्ण ने सबको ब्रजमंडल में अवतरित कराया। गर्ग संहिता में यमुना पंचांग के साथ ही पटल, पद्धति, कवच, स्तोत्र और सहस्त्र नाम आदि यमुना से सम्बन्धित विषय अंकित हैं। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने कालिय नाग का उद्धार कर विषाक्त यमुना को विषहीन किया था। यमुना के पटल, पद्धति, कवच, स्तोत्र और सहस्त्र नाम आदि का यमुना के परम भक्त दैनिक रूप से प्रति दिन पाठ करते हैं। ब्रह्म पुराण में देवी यमुना के आध्यात्मिक स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है कि – जो जगत का आधारभूत है और जिसे लक्षणों से परमब्रह्म कहा गया है, उपनिषदों ने जिसे सच्चिदानंद स्वरूप कहकर संबोधित किया है, वही परमतत्व साक्षात यमुना हैं। ऐसी मान्यता है कि यमुना नदी में गोता लगाने से आत्मा शुद्ध हो सकती है और शाश्वत आनंद और प्रेम भी प्राप्त हो सकता है। यमुना के उद्गम स्थल यमुनोत्री में देवी यमुना को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है, जो भारतीय संस्कृति में यमुना के महत्त्वपूर्ण व पवित्र स्थल होने का द्योतक है। यमुनोत्री उत्तराखंड के चार धाम तीर्थ यात्रा स्थलों में से एक है।

By अशोक 'प्रवृद्ध'

सनातन धर्मं और वैद-पुराण ग्रंथों के गंभीर अध्ययनकर्ता और लेखक। धर्मं-कर्म, तीज-त्यौहार, लोकपरंपराओं पर लिखने की धुन में नया इंडिया में लगातार बहुत लेखन।

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