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यात्रा से राहुल की छवि बदल रही

नई दिल्ली। अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव (Lok Sabha elections) से पहले इस साल नौ राज्यों में विधानसभा चुनाव होना है। इसके मद्देनजर केंद्र की सत्तारूढ़ भाजपा (BJP) जहां कमजोर सीट पर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए ‘लोकसभा प्रवास’ योजना सहित विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए तैयारियों में जुट गई है, वहीं राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की अगुवाई वाली ‘भारत जोड़ो यात्रा’ (Bharat Jodo Yatra) समापन के कगार पर पहुंच गई है।

कुछ क्षेत्रीय राजनीतिक दल भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) के विजय रथ (Vijay Rath) को रोकने के लिए अपनी-अपनी रणनीति को अंजाम देने में जुट गए हैं। इन्हीं सब मुद्दों पर देश के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक और ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी’ (सीएसडीएस-CSDS) के लोकनीति कार्यक्रम के सह-निदेशक प्रोफेसर सुहास पलशीकर (Suhas Palshikar) की बेबाक राय।

सवाल: अगले लोकसभा चुनाव से पहले नौ राज्यों में विधानसभा चुनाव होना है और पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में तो चुनाव की घोषणा भी हो चुकी है। आप क्या राजनीतिक परिदृश्य देखते हैं?
जवाब: पूर्वोत्तर के तीन चुनावी राज्यों में त्रिपुरा एक ऐसा राज्य है जहां भाजपा सीधी और महत्वपूर्ण लड़ाई में है। यहां उसका मुकाबला वामपंथी दलों और कांग्रेस से है। मेघालय और नगालैंड में विभिन्न स्थानीय दलों की भूमिका अहम है। जहां तक राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की बात है तो यहां मुकाबला सीधे कांग्रेस और भाजपा में है। कर्नाटक में देखना होगा कि क्या कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) गठबंधन करते हैं या सीट को लेकर कोई तालमेल बिठाते हैं। नहीं तो मुकाबला त्रिकोणीय है। इन विधानसभा चुनावों में अलग-अलग मुकाबले हैं। कोई भी एक दल इन सभी राज्यों में लाभ की स्थिति में नहीं है। हां, ये चुनाव अगले लोकसभा चुनाव के बारे में कुछ संकेत जरूर दे सकते हैं। कई शोध में यह बात सामने आई है कि विधानसभा चुनाव में लोगों के मुद्दे अलग होते हैं जबकि लोकसभा चुनाव में अलग। इसलिए यह जरूरी नहीं है कि जो ‘ट्रेंड’ विधानसभा चुनाव में देखने को मिले, वह लोकसभा चुनाव में भी जारी रहेगा।

सवाल: राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ अब पूरी होने वाली है। राष्ट्रीय राजनीति पर क्या यह कोई प्रभाव छोड़ पाएगी?
जवाब: ‘भारत जोड़ो यात्रा’ से दो चीजें हुई हैं। एक तो यह कि निश्चित तौर पर राहुल गांधी की छवि बदली है। इससे कांग्रेस को कुछ फायदा जरूर मिलेगा। कांग्रेस ने पहले भी राहुल गांधी को अपने नेता के रूप में आगे किया है लेकिन उनकी लोकप्रियता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आगे फीकी रही। ऐसा नहीं है कि इस यात्रा के बाद राहुल गांधी की लोकप्रियता प्रधानमंत्री मोदी जैसी हो जाएगी। लेकिन कम से कम कुछ तुलना जरूर होगी। इस यात्रा से एक बात जरूर चर्चा में आई है और वह है महंगाई, बेरोजगारी एवं अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दे जो देश को प्रभावित कर रहे हैं। एक फर्क यह भी आएगा कि जो राजनीतिक दल कांग्रेस को अभी तक हल्के में ले रहे थे, वे उसे और गंभीरता से लेंगे।

सवाल: तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) भाजपा के खिलाफ एक राष्ट्रीय गठबंधन खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। आप इस कोशिश का कैसे आकलन करेंगे?
जवाब: जब एक राजनीतिक दल का दबदबा होता है और अन्य दल अकेले उससे मुकाबले में खुद को कमजोर पाते हैं तो वे गठबंधन की ओर जाते हैं। कांग्रेस यही कर रही है। भारत राष्ट्र समिति और तृणमूल कांग्रेस भी यही कर रहे हैं। लेकिन इस प्रकार के गठबंधन को बनाने की प्रक्रिया में सबसे बड़ा प्रश्न यही आता है कि कौन इसका चेहरा होगा। स्वाभाविक है कि कांग्रेस इसका चेहरा बनना चाहती है। मुझे नहीं लगता कि केसीआर का वह राष्ट्रीय कद है जो वह सभी विपक्षी दलों को एकजुट कर सकें। ऐसा प्रयास यदि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी करें तो कुछ हद तक सफल हो सकती हैं क्योंकि वह राष्ट्रीय राजनीति के एक प्रमुख चेहरे के रूप में उभरी हैं। कई कारणों से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन भी ऐसे प्रयासों में एक अहम भूमिका निभा सकते हैं। द्रविड़ मुनेत्र कषगम ने पहले भी ऐसी भूमिका निभाई है। राष्ट्रीय राजनीति में उत्तर भारत का प्रभुत्व दक्षिण में एक बड़ा मुद्दा होता है। फिलहाल, मेरा मानना है कि इस प्रकार के प्रयास अभी जारी रहेंगे, और यह स्वाभाविक भी है। सबके अपने-अपने हित भी हैं। इसलिए गठबंधन बनाना बड़ा जटिल दिख रहा है।

सवाल: फिर विपक्षी दलों की क्या रणनीति होनी चाहिए और क्या आप भाजपा के खिलाफ कोई ऐसा गठबंधन बनने की संभावना देख रहे हैं जिसमें कांग्रेस न हो?
जवाब: कांग्रेस के बगैर मैं किसी ऐसे गठबंधन की संभावना नहीं देखता क्योंकि कई राज्यों में भाजपा के खिलाफ कांग्रेस एक प्रमुख ताकत है। कांग्रेस भले ही लगातार हार रही हो लेकिन कई अन्य राज्यों में आज भी उसकी अच्छी-खासी मौजूदगी है। रही बात विपक्ष की रणनीति की तो यह बहुत भी उलझा हुआ सवाल है। लोकसभा चुनाव में अभी समय है। अभी इतना ही कहा जा सकता है कि विपक्षी एकता सिर्फ कागजों पर है। अभी कोई ठोस शुरुआत भी नहीं दिख रही है। स्थानीय स्तर पर भी विपक्षी दलों में गठबंधन होता है तो कुछ हो सकता है जैसे महाराष्ट्र में महा विास आघाड़ी बना। इसी प्रकार कर्नाटक में कांग्रेस और जद (एस) के बीच कुछ बात बने। इसी प्रकार गठबंधन बनाना होगा और भाजपा के उम्मीदवारों की हार सुनिश्चित करने के लिए प्रयास करने होंगे। बिहार और उत्तर प्रदेश में स्थितियां भिन्न हैं। दोनों राज्यों में मजबूत विपक्षी ताकतें हैं लेकिन इसके बावजूद भाजपा अच्छी स्थिति में है।

सवाल: भारत को मिली जी-20 की अध्यक्षता को भाजपा भुनाने की कोशिशों में दिख रही है। क्या आप इसका भी चुनावों पर कुछ असर देख रहे हैं?
जवाब: इससे एक संकेत मिलता है कि भाजपा चुनावों में क्या करने जा रही है। स्पष्ट है कि भाजपा प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तित्व और उनकी उपलब्धियों पर अपना ध्यान केंद्रित करेगी। पहले भी चुनावों में वह ऐसा करती रही है। ऐसा करने का उसे फायदा यह मिलता है कि राज्य सरकारें हों या मंत्री या सांसद उनकी कमियां पीछे छूट जाती हैं और जनता के मुद्दे गौण हो जाते हैं। अगले साल चुनाव आते-आते उन्हें और कुछ इस प्रकार के कार्यक्रम मिल जाएंगे ताकि प्रधानमंत्री को और प्रचारित किया जा सके। (भाषा)

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