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बेबाक विचार

भारत और परवेज मुशर्रफ

ByNI Editorial,
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मुशर्रफ के कार्यकाल में ही अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान की तरफ ‘दोस्ती का हाथ’ बढ़ाया, जिससे एक नई परिघटना शुरू हुई, जिससे डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के समय कश्मीर मसला तक हल होने की उम्मीदें जताई जाने लगी थीं।

परवेज मुशर्रफ नहीं रहे। करीब नौ साल तक देश पर राज करने वाले जनरल मुशर्रफ का रविवार को दुबई में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। भारत में उचित ही उनकी याद आक्रोश पैदा करती है। करगिल घुसपैठ के मुख्य षडयंत्रकारी के रूप में उनकी पहचान रही है। इस योजना के नाकाम होने के बाद ही उन्होंने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का तख्ता पलट कर सत्ता अपने हाथ में ले ली थी। करगिल कांड से भारत में लोगों में धोखा खाने का अहसास जगा था। करगिल युद्ध से ठीक पहले फरवरी 1999 में भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस से लाहौर गए थे और ऐतिहासिक शांति समझौता हुआ था। लेकिन मुशर्रफ ने उस शंति समझौते पर पानी फेर दिया। बहरहाल, सत्ता संभालने के बाद 2001 में उन्होंने खुद भारत-पाक संबंध बेहतर करने की बात कहते हुए भारत यात्रा की। तब भी भारत में वाजपेयी ही प्रधानमंत्री थे। दोनों नेताओं के बीच आगरा में शिखर वार्ता हुई। लेकिन यह वार्ता बुरी तरह नाकाम रही। इसका दोष भी उन्होंने भारतीय नेताओं पर ही डाला।

अपनी किताब ‘इन द लाइन ऑफ फायर’ में मुशर्रफ ने लिखा है कि किसी ‘तीसरे शख्स’ ने आगरा सम्मेलन को कामयाब नहीं होने दिया। कहा जाता है कि उनका इशारा लाल कृष्ण आडवाणी की तरफ था। इसके बाद उसी वर्ष भारत की संसद पर हमला हुआ। इसके तार भी पाकिस्तान से जुड़े। तब दोनों देश युद्ध के करीब पहुंच गए थे। इसके बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान की तरफ ‘दोस्ती का हाथ’ बढ़ाया, जिससे एक नई परिघटना शुरू हुई, जिससे डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के समय कश्मीर मसला तक हल होने की उम्मीदें पैदा हो गई थीं। बहुचर्चित लेकिन अघोषित मनमोहन-मुशर्रफ फॉर्मूले को आज भी बहुत से लोग कश्मीर मसले का एकमात्र ऐसा व्यावहारिक समाधान मानते हैं, जिसे भारत और पाकिस्तान दोनों जगहों पर स्वीकार किया जा सकता है। बहरहाल, अब बात बहुत अलग दिशा में जा चुकी है। इसलिए उस फॉर्मूले को याद करने का कोई खास मतलब नहीं बचता। अब उसके एक सूत्रधार यानी मुशर्रफ भी दुनिया के चले गए हैँ।

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