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बेबाक विचार

पाकिस्तान उबल पड़ा है

ByNI Editorial,
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विश्लेषक खुलेआम कहते सुने जा रहे हैं कि पाकिस्तान के शासक वर्ग ने तत्कालीन ईस्ट पाकिस्तान में 1970 के बाद उभरे घटनाक्रम से कुछ नहीं सीखा है, जिसका परिणाम देश के बंटवारे के रूप में सामने आया था। 

पाकिस्तान की राजनीति के किसी पर्यवेक्षक के मन इस बात को लेकर संभवतः कोई संदेह नहीं होगा कि इमरान खान की लोकप्रियता उनकी अपनी पार्टी के दायरे से काफी आगे तक है। पिछले अप्रैल में जब से उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाया गया, उनके समर्थक यह चेतावनी लगातार दे रहे थे कि इमरान खान उनकी रेडलाइन हैं। अगर ऐस्टैबलिशमेंट (सेना+खुफिया तंत्र) इसे पार किया, तो उसे वे बर्दाश्त नहीं करेंगे। मंगलवार शाम से पाकिस्तान के विभिन्न शहरों की सड़कों पर जो नजारा दिशा, उससे इस बात की ही पुष्टि हुई है कि खान के समर्थकों की चेतावनी खोखली नहीं थी। रावलपिंडी में सेना मुख्यालय में भीड़ ने अगर घुस कर तोड़फोड़ की, लाहौल में सेना के कोर कमांडर के आवास में तोड़फोड़ के साथ आगजनी भी गई और सरगोधा में सेना के प्रतीक चिह्न पर हमले किया गया, तो यह साफ है कि इमरान खान के समर्थकों ने सीधे ऐस्टैबलिशमेंट को निशाने पर लिया है। यह पाकिस्तान के इतिहास में अभूतपूर्व और अनोखी घटना है। वैसे इसके पहले यह भी अभूतपूर्व था कि इमरान खान लगातार ऐस्टैबलिशमेंट से टकराव ले रहे थे।

मंगलवार शाम को उन्हें इसकी ही कीमत चुकानी पड़ी। लेकिन इमरान खान को अपहरण के अंदाज में गिरफ्तार करवाते समय सेना नेतृत्व को इस बात का अंदाजा नहीं रहा होगा, पाकिस्तान के आवाम की निगाह में उसकी साख किस हद तक खत्म हो चुकी है। देश भर की सड़कों पर हजारों लोग मंगलवार देर रात यह नारा लगाते सुने गए कि पाकिस्तान उनका है, किसी एक या दो जनरल का नहीं। इस तरह जन-संप्रभुता को जताने की घटना अपने-आप में बेहद खास और दूरगामी परिणाम वाली है। उधर इस बात का कोई संकेत नही है कि ऐस्टैबलिशमेंट और उसके समर्थन से चल रही मौजूदा सरकार देश में बनी जन-भावना को समझने को तैयार है। इस स्थिति में जनता और सत्ता का टकराव किस मुकाम तक जाएगा, इसका अनुमान लगाना फिलहाल मुश्किल है। लेकिन विश्लेषक यह बात खुलेआम कहते सुने जा रहे हैं कि पाकिस्तान के सत्ता तंत्र ने तत्कालीन ईस्ट पाकिस्तान में 1970 के बाद उभरे घटनाक्रम से कुछ नहीं सीखा है, जिसका परिणाम देश के बंटवारे के रूप में सामने आया था।

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