यह लाख टके का सवाल है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर जो गतिरोध बना है वह कैसे समाप्त होगा? केंद्र सरकार किसी स्थिति में ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा नहीं करा सकती है और दूसरी कोई भी संस्था उनको हटा नहीं सकती है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का एक ही तरीका है कि उनके खिलाफ संसद में महाभियोग लाया जाए। विपक्ष महाभियोग लाने की तैयारी कर रहा है लेकिन सबको पता है कि विपक्ष दो तिहाई बहुमत नहीं जुटा पाएगा। इस समय तो सरकार के पास भी दो तिहाई बहुमत नहीं है।
इसलिए ज्ञानेश कुमार के हटने का एकमात्र रास्ता है कि वे स्वेच्छा से इस्तीफा दे दें। अगर वे इस्तीफा नहीं देते हैं तो उनको न तो सुप्रीम कोर्ट हटा सकता है और न राष्ट्रपति हटा सकती हैं। सरकार चाहे तो उनको इस्तीफा देने के लिए कह सकती है और अगर इस्तीफा नहीं दें तो महाभियोग लाकर उनको हटवा सकती है। उनके खिलाफ सरकार महाभियोग लाए तो विपक्ष का समर्थन मिलेगा।
परंतु यह भी सबको पता है कि सरकार न तो उनका इस्तीफा कराएगी और न महाभियोग लाएगी। इसका कारण यह है कि इस मामले में ज्ञानेश कुमार अंतिम निशाना नहीं हैं। अगर ‘वोट चोरी’ और मनमाने तरीके से चुनाव आयोग चलाने के आरोपों से घिरे ज्ञानेश कुमार इस्तीफा देते हैं तो उसका सीधा असर भाजपा के ऊपर होगा। उसकी चुनी हुई सरकारों के ऊपर होगा। विपक्ष एसआईआर रद्द करने और चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त करने की मांग करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग होगी। यह समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे जैसा मामला नहीं है। यह सामान्य रूप से अपने कर्तव्यों के निर्वहन में विफलता का मामला नहीं है और न कोई नीतिगत मामला है। यह स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा से जुड़ा मामला है। विपक्ष इसकी संवेदनशीलता को समझ रहा है।
साथ ही विपक्ष इस मामले की जटिलता को भी समझ रहा है। इससे पहले कॉकरोच जनता पार्टी ने प्रदर्शन किया तो धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया। उससे पहले किसानों ने प्रदर्शन किया तो तीन केंद्रीय कृषि कानून वापस हो गए। उससे पहले राहुल गांधी ने प्रदर्शन किया तो भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव के मामले में सरकार पीछे हट गई। संसद में विपक्ष एकजुट हुआ तो महिला आरक्षण कानून में संशोधन और परिसीमन के मामले में सरकार का लाया विधेयक विफल हो गया। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त का मामला इन सबसे भिन्न है। यह नीतिगत या प्रशासनिक विफलता का मामला नहीं है। इसलिए सरकार इस मामले में पीछे नहीं हट सकती है। वह ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा नहीं करा सकती है। तभी यह सवाल है कि यह गतिरोध कैसे समाप्त होगा? सरकार इस्तीफा नहीं कराएगी और विपक्ष आंदोलन समाप्त नहीं करेगा तो क्या यह गतिरोध स्थायी रूप से बना रहेगा?
विपक्ष यही चाह रहा है कि अगले चुनावों तक यह गतिरोध बना रहे। हालांकि उसको भी पता है कि एसआईआऱ का मामला जमीनी कनेक्ट नहीं बनवा रहा है और उस पर आम लोगों का ज्यादा समर्थन नहीं है। लेकिन इस बहाने उसने लोगों के गुस्से को एक दिशा दी है। लोगों का गुस्सा कई दूसरे कारणों से है। पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी से गुस्सा है, नौकरी की कमी और बढ़ती महंगाई से गुस्सा है तो इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल और यूपीआई पर शुल्क लगाने के फैसले से भी गुस्सा है। जन आक्रोश के इन सारे स्रोतों को एक सामान्य रूप देकर उसे बड़ा किया गया है और उसको जन विश्वास में कमी के रूप में स्थापित किया गया है।
विपक्ष यह स्थापित करने का प्रयास कर रहा है कि सरकार में जनता का विश्वास नहीं रह गया है। दूसरी ओर सरकार का रवैया विपक्ष को थकाने वाला है। उसको अगले साल होने वाले चुनावों का इंतजार है। सरकार और सत्तारूढ़ दल को यकीन है कि उसकी चुनावी मशीनरी, उसका चुनावी नैरेटिव और सामाजिक समीकरण उसे चुनाव जीता देगा। एक बार चुनाव जीत गए तो फिर विपक्ष के सारे मुद्दे अपने आप समाप्त हो जाएंगे।
पक्ष और विपक्ष दोनों का लक्ष्य स्पष्ट है। विपक्ष का प्रयास यह स्थापित करने का है कि सरकार की साख नहीं रह गई है और वह जनता का विश्वास खो चुकी है। अभी यह बात उसे धारणा के स्तर पर स्थापित करनी है। दूसरी ओर सरकार का लक्ष्य नैरेटिव की इस लड़ाई के बावजूद चुनाव जीतना है। दोनों की इस लड़ाई में आम आदमी परेशान हो रहा है। राजधानी दिल्ली में पिछले एक हफ्ते से ज्यादा समय से जनजीवन अस्तव्यस्त है। मेट्रो स्टेशन बंद होने से यात्रियों को परेशानी हो रही है तो ट्रेनें रद्द होने से हजारों आम लोगों का कामकाज प्रभावित हुआ। इंटरनेट बंद होने और दुकानों पर ताला लगवाने से लोगों को अलग नुकसान हो रहा है।
त्योहारों का सीजन शुरू हो गया है और दिल्ली में उसकी रौनक नहीं बन पा रही है। विपक्ष को पता है कि इसकी कुछ जिम्मेदारी उसके ऊपर भी आती है लेकिन ज्यादा नाराजगी सरकार से बढ़ रही है। विपक्ष के विरोध प्रदर्शन को हैंडल करने के लिए सरकार जिन तरीकों का इस्तेमाल कर रही है उनसे जनता का गुस्सा और बढ़ रहा है। लंबे समय में इसका चुनावी नुकसान भी सत्तारूढ़ दल को हो सकता है।
सरकार इस बात को समझ रही है लेकिन उसके पास इस गतिरोध को जल्दी समाप्त करने का कोई रास्ता नहीं है। प्रदर्शन की अनुमति देकर भी सरकार ने देख लिया और प्रदर्शन पर पाबंदी लगा कर भी देख लिया। कुछ काम नहीं आ रहा है। तभी ऐसा लग रहा है कि सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बना गतिरोध लगातार चलता रहेगा। विपक्ष हर दिन प्रदर्शन का नया तरीका निकालेगा और नई जगह खोजेगा तो सरकार भी उसे रोकने के नए उपाय करेगी।
यह चक्र चलता रहेगा। बीच में संसद का शीतकालीन सत्र है और उसके बाद पांच राज्यों के चुनाव हैं। संसद सत्र के समय विपक्ष सड़क पर शायद आंदोलन नहीं करे लेकिन देखना होगा कि कॉकरोच जनता पार्टी उस समय क्या करती है। उस समय भी अगर विरोध प्रदर्शन जारी रहा तो फिर उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनाव से पहले यह गतिरोध नहीं समाप्त होगा।
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