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फॉर्म छह, सात और आठ की अकथ कहानी

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से जुड़ी गड़बड़ियों की कथा समाप्त ही नहीं हो रही है। हर दिन एक नया अध्याय खुल जा रहा है और इसे ठीक करने की बजाय चुनाव आयोग के अधिकारी हंसी ठिठोली कर रहे हैं। पिछले दिनों एक मतदाता के पहचान पत्र का अनोखा मामला सामने आया। मतदाता का नाम रामहित यादव था, जिसे पहचान पत्र पर ‘राम ने यादव को मारा’ कर दिया गया था। माना जा रहा है कि रामहित को सॉफ्टवेयर ने राम हिट पढ़ लिया और उसका हिंदी अनुवाद ‘राम ने यादव को मारा’ कर दिया। जब यह विवाद सामने आया और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने सवाल उठाया कि ‘राम ने यादव को ही क्यों मारा’ तब कुछ और पहचान पत्र सामने आए, जिसमें एक में रामहित शर्मा को ‘राम ने शर्मा’ को मारा कर दिया गया था।

जब यह विवाद बढ़ा तो राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी यानी सीईओ के हैंडल से एक सोशल मीडिया पोस्ट लिखी गई, जिसमें हंसी ठिठोली करने के अंदाज में कहा गया कि अनजाने में सॉफ्टवेयर से हुई गलती में भी ‘राम ने शर्मा’ को मारा अगर राम ने किसी अल्पसंख्यक को मारा होता तो राम पर जातिवादी होने के आरोप लगाने वाले उन पर सांप्रदायिक होने का आरोप भी लगा देते। सोचें, इस तरह के बेहूदा मजाक पर क्या कहा जा सकता है? राजनीतिक दलों के कुछ कुंठित नेता इस तरह की बातें करते रहते हैं। लेकिन क्या किसी सरकारी पद पर बैठे व्यक्ति को एक संवैधानिक प्रक्रिया को लेकर इस तरह की बातें करनी चाहिए?

असल में पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में हुए 11 सीटों के एमएलसी चुनाव में 14.81 लाख में से 158 नामों में इस तरह की गड़बड़ी मिली है। राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी नवदीप रिण्वा ने कहा कि यह सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी है और साथ साथ मानवीय लापरवाही का मामला भी है। सवाल है कि कोई सॉफ्टवेयर ऐसे चुनिंदा तरीके से कैसे काम कर सकता है? क्या यह संभव है कि कोई सॉफ्टवेयर बाकी सारे नाम हिंदी में लिखे और कुछ नामों का हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद कर दे? अगर सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी है तो सिर्फ रामहित या कुछ मुस्लिम नामों के साथ ही क्यों हो रहा है? सॉफ्टवेयर रामबदन को रॉम बॉडी क्यों नहीं कर रहा है या गुलाब सिंह को रोज लॉयन या आकाश को स्काई क्यों नहीं कर रहा है?

इस विवाद के बारे में विस्तार से बताने का मकसद यह स्पष्ट करना है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के नाम पर किस तरह की गड़बड़ियां हो रही हैं। सवाल है कि क्या यह सिर्फ सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी और मानवीय लापरवाही है या इसके पीछे कोई राजनीति भी है? क्योंकि अगर सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी या मानवीय लापरवाही का मामला होता तो यह बहुत सारे नामों के साथ होना चाहिए था। जाहिर है कि कुछ सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी है और कुछ मानवीय लापरवाही भी है लेकिन साथ साथ कुछ मंशा की भी गड़बड़ी है। ऐसा मानने का आधार यह है कि उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में इस तरह की गड़बड़ी 10 हजार से ज्यादा नामों के साथ हुई है, जिनमें बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं के नाम हैं। इस मामले में कई लोग निलंबित हुए हैं या ड्यूटी से हटाए गए हैं। पीलीभीत की गड़बड़ी का ठीकरा भी सॉफ्टवेयर, अल्गोरिदम या चंद लोगों की मानवीय लापरवाही पर फोड़ा जा रहा है। लेकिन अगर ऐसा है तो गड़बड़ी प्रदेश के अन्य हिस्सों में या पूरे देश में ऐसा होनी चाहिए थी।

बहरहाल, यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि हर स्तर पर किसी न किसी तरह की गड़बड़ी सामने आ रही है। मतदाताओं से जुड़े तीन मुख्य फॉर्म हैं। फॉर्म नंबर छह, सात और आठ। फॉर्म छह से नए और पहली बार वोट डालने वाले मतदाताओं का नाम जोड़ा जाता है। फॉर्म सात से नाम कटवाया जाता है और फॉर्म आठ से नाम, पता, उम्र आदि से संबंधित त्रुटियों को ठीक कराया जाता है। आम मतदाता के लिहाज से ये तीन ही काम महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इन तीनों फॉर्म में व्यापक रूप से गड़बड़ी की खबरें देश के अलग अलग हिस्सों से आ रही हैं। ये गड़बड़ियां इतनी बड़ी हैं कि इन्हें सामान्य चूक मान कर अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

सबसे पहले फॉर्म छह की बात करें तो पिछले साल बिहार में एसआईआऱ शुरू होने के समय चुनाव आयोग ने इसमें एक बड़ा बदलाव कर दिया। हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट में आयोग ने कहा है कि उसने कोई बदलाव नहीं किया है, बल्कि नए मतदाताओं की मैपिंग के लिए उनसे अलग से कुछ सवाल पूछे जा रहे हैं। हालांकि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी रिपोर्ट में साफ था कि आयोग ने फॉर्म छह को बदला और दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि इस तरह के बदलाव करने का अधिकार संसद को है। असल में आयोग ने फॉर्म छह के साथ तीन स्टेटमेंट्स जोड़ दिए हैं, जिनके जरिए पहली बार के मतदाताओं की जिनियोलॉजी यानी उसके माता, पिता या अन्य पूर्वजों की जानकारी मांगी जा रही है। उन्हें बताना है कि उनके माता, पिता या दादा, दादी पहले की एसआईआर में मतदाता थे या नहीं। इसके जरिए उनके जन्मस्थान आदि की जानकारी तलाशी जा रही है। इससे 18 से 20 साल के युवाओं को मतदाता बनने में परेशानी हो रही है। फॉर्म छह में बदलाव के मामले में चुनाव आयोग की सफाई पर्याप्त नहीं प्रतीत हो रही है। हालांकि अखबार की खोजी रिपोर्ट के बाद कहा गया कि जिन राज्यों में एसआईआर समाप्त हो गई है वहां फॉर्म छह के साथ जुड़े तीनों स्टेटमेंट्स हटा दिए गए हैं।

बहरहाल, फॉर्म छह की तरह ही फॉर्म सात के साथ भी बड़ा विवाद जुड़ा है। फॉर्म सात के जरिए नाम कटवाया जाता है। इसमें यह प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति फॉर्म सात भर कर किसी भी दूसरे व्यक्ति का नाम कटवा सकता है। इस प्रावधान का बहुत भारी दुरुपयोग हुआ है। उत्तर प्रदेश और कर्नाटक सहित कई राज्यों से यह शिकायत मिली है कि एक एक व्यक्ति ने कई सौ नाम कटवाने के लिए फॉर्म सात भर कर जमा करा दिए। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने पिछले दिनों प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताया कि नंदलाल नाम के एक व्यक्ति के फर्जी दस्तखत करके 35 लोगों के नाम काटने का आवेदन दिया गया। चुनाव आयोग इसकी जांच कर रहा है। ऐसे ही कर्नाटक में ढाई लाख लोगों के नाम काटने के लिए थोक में फॉर्म जमा कराए गए। कांग्रेस की राज्य सरकार ने इसकी जांच के लिए एक कमेटी बनाई है। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग के डेटा का इस्तेमाल करके विपक्षी पार्टियों के समर्थक मतदाताओं के नाम केंद्रीकृत तरीके से काटने का प्रयास किया जा रहा है। यह बहुत गंभीर आरोप है। चुनाव आयोग भी इस मामले की जांच कराने की बात कह रहा है।

फॉर्म आठ की बात करें तो उसका मामला और दिलचस्प है। इसके जरिए मतदाता के नाम, पते, उम्र आदि से जुड़ी गड़बड़ियों को ठीक कराया जाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में बिना फॉर्म आठ का इस्तेमाल किए ही हजारों नामों को बदल दिया गया। किसी ने अपना नाम बदलने के लिए फॉर्म आठ नहीं भरा। लेकिन हजारों लोगों की पहचान बदल गई। हजारों नामों के साथ ऐसा हुआ कि इपिक नंबर किसी और का लेकिन उस पर नाम कोई दूसरा आ रहा है। कई पहचान पत्र में अजीबोगरीब नाम भी लिखे दिखाई दे रहे हैं। इसी तरह फॉर्म आठ को लेकर एक दूसरी कहानी यह है कि कई राज्यों में चुनाव अधिकारियों ने पुराने मतदाताओं से कहा कि फॉर्म आठ की बजाय फॉर्म छह भरें। जिनके नाम पहले मतदाता सूची में थे, लेकिन एसआईआर में किसी कारण से नाम हट गए तो मतदाता सूची के काम से जुड़े लोग सुधार करने की बजाय उनसे फॉर्म छह भर कर गलत डिक्लेरेशन देने की बात कर रहे हैं।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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