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ममता को कितने मोर्चे पर लड़ना है?

सचमुच भारतीय जनता पार्टी की विरोधी पार्टियों के लिए चुनाव लड़ना, चुनाव जीतना और जीतने के बाद सरकार चलाना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। हर पार्टी को एक से ज्यादा मोर्चे पर लड़ना होता है और एक मोर्चे पर कमजोर लड़ाई का असर बाकी सब पर भी पड़ता है। पहले चुनाव होते तो सिर्फ चुनाव होता था। पार्टियां चुनावी सभा करती थीं, मतदाताओं को मोबिलाइज करती थीं, बूथ प्रबंधन का काम करती थीं, लेकिन अब इन पारंपरिक तरीकों से चुनाव नहीं लड़ा जाता है। खास कर अगर भाजपा की प्रतिद्वंद्वी ममता बनर्जी हों तो उनकी मुश्किलें और ज्यादा होती हैं। ममता को एक साथ भारतीय जनता पार्टी, चुनाव आयोग, केंद्रीय एजेंसियों, राज्यपाल और मीडिया सबसे लड़ना है। यह तो नहीं कहा जा सकता है कि न्यायपालिका से भी लड़ना है लेकिन चुनावी राजनीति में एक पक्ष न्यायपालिका का भी है और वह भी अनुकूल नहीं है।

सबसे पहले चुनाव आयोग की बात करें, जिसने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के नाम पर राज्य में 91 लाख नाम काट दिए। पहले और दूसरे चरण में मिला कर जो 63 लाख नाम कटे उनसे किसी को शिकायत नहीं रही। लेकिन उसके बाद तार्किक विसंगति के नाम पर 27 लाख नाम काटे गए। इन लोगों को अपना पक्ष रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधिकरण के जरिए अंतिम मौका दिया था लेकिन समय कम होने की वजह से न्यायाधिकरण में सुनवाई नहीं हो सकी। इसका अर्थ है कि प्रशासनिक अक्षमता और तकनीकी कारणों से 27 लाख लोगों के नाम कट गए। वह भी तब हुआ, जब स्वंय सुप्रीम कोर्ट इस मामले की निगरानी कर रहा था। कदम कदम पर सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग की मदद की। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सात सौ से ज्यादा न्यायिक अधिकारियों को एसआईआर के काम में लगाया गया। यह पहला मौका था, जब न्यायिक अधिकारियों को प्रशासनिक काम में लगाया गया। इसके बावजूद 27 लाख लोग मतदान के अधिकार से वंचित हो गए।

अकेले ममता बनर्जी के चुनाव क्षेत्र में 51 हजार मतदाताओं के नाम कटे हैं। पिछली बार वे 58 हजार वोट से जीती थीं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 44 विधानसभा सीटों पर पिछली बार के जीत हार के अंतर से ज्यादा मतदाताओं के नाम कटे हैं। ऊपर से जब चुनाव आयोग के पास तृणमूल कांग्रेस के लोग अपनी शिकायत लेकर गए तो चुनाव आयोग ने उनको ‘गेट लॉस्ट’ कह कर बाहर निकाला और बाद में सोशल मीडिया में एक पोस्ट में सीधे तृणमूल कांग्रेस का नाम लिख कर पार्टी को निशाना बनाया।

आयोग ने ऐसा मैसेज दिया जैसे चुनाव से हर किस्म की गड़बड़ी सिर्फ ममता बनर्जी की पार्टी ही कर सकती है। ऐसे ही मालदा में नाम कटने से नाराज लोगों ने न्यायिक अधिकारियों का घेराव किया तो चुनाव आयोग ने बिना सोचे समझे उसकी जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए से कर दी। एनआईए ने जांच शुरू भी कर दी है। ऐसा लगा जैसे मालदा की घटना आतंकवाद की घटना हो। सो, पश्चिम बंगाल में एक प्लेयर चुनाव आयोग भी है। उसने आचार संहिता लागू होते ही जितनी बड़ी संख्या में अधिकारियों के तबादले किए उससे भी आयोग की मंशा जाहिर हुई।

इसके बाद यह देख कर हैरानी हुई कि विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन समाप्त होने और मतदान में दो हफ्ते से भी कम रह जाने के बीच तृणमूल कांग्रेस के नेता और पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी के यहां प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने छापा मारा। पार्थ चटर्जी के अलावा उनके कई सहयोगियों के यहां छापे मारे गए। सोचें, पार्थ चटर्जी के यहां पहली बार कई साल पहले में छापा मारा गया था। उनकी एक महिला सहयोगी के यहां से 20 करोड़ रुपए पकड़े गए। उसके बाद उनको गिरफ्तार कर लिया गया। ममता बनर्जी ने सरकार से हटा दिया। पार्थ चटर्जी लगभग दो साल जेल में रहे।

इस दौरान ईडी की जांच चलती रही और आरोपपत्र दायर होते रहे। लंबे समय तक जेल में रहने के बाद पार्थ चटर्जी जमानत पर छूटे हैं। सोचें, दो साल से ज्यादा जांच करने और आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखने के बाद चुनाव के समय उसके यहां फिर से छापा मारा जा रहा है। क्या यह सामान्य जांच प्रक्रिया है? मतदान से दो हफ्ते पहले इस किस्म की छापेमारी का मकसद परेशान करने के अलावा भ्रष्टाचार का मैसेज बनवाने का भी है। जो लोग शिक्षक भर्ती घोटाले को हो सकता है भूल गए हों उनको ईडी ने याद दिलाया है कि इस मामले में शिक्षा मंत्री रहे पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी हुई थी।

ईडी ने इससे पहले तृणमूल कांग्रेस के चुनाव प्रबंधन का काम संभालने वाली एजेंसी आईपैक के कार्यालय और उसके निदेशक प्रतीक जैन के यहां छापा मारा था। आठ जनवरी को यह छापेमारी हुई थी। कहा गया कि कोयला घोटाले और धनशोधन के मामले में यह कार्रवाई हुई है। लेकिन आईपैक के खिलाफ कार्रवाई उसी समय खत्म नहीं हुई। चुनाव के लिए नामांकन की प्रक्रिया समाप्त होने या छह अप्रैल की डेडलाइन बीतने के बाद भी आईपैक के कार्यालयों पर छापा मारा गया। आठ जनवरी के छापे के बाद ममता बनर्जी आईपैक कार्यालय पहुंची थीं, जिसे ईडी की कार्रवाई में बाधा डालने बताया गया और उसका मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है।

यह दिलचस्प है कि चुनाव के बीच आम जनता उन्नयन पार्टी के नेता हुमायूं कबीर का एक स्टिंग वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वे कह रहे हैं कि भाजपा के साथ उनकी एक हजार करोड़ रुपए की डील हुई है। दो सौ करोड़ रुपए वे एडवांस मांगते दिख रहे हैं। पता नहीं वीडियो सही है या नहीं लेकिन इतनी बड़ी रकम का जिक्र हो रहा है तो निश्चित रूप से ईडी को इसमें दखल देना चाहिए था। लेकिन ईडी कहीं नहीं दिखी है।

ममता बनर्जी की राजनीतिक चुनौती अलग है। प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बंगाल में धुआंधार प्रचार कर रहे हैं। कई केंद्रीय मंत्री और कई राज्यों के मुख्यमंत्री प्रचार में लगे हैं। भारतीय जनता पार्टी दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है, जिसकी पूरी ताकत पश्चिम बंगाल में लगी है। पार्टी के साथ साथ साथ पूरी केंद्र सरकार और कई राज्यों की सरकार बंगाल चुनाव लड़ रही है। एक दिन में प्रधानमंत्री की तीन तीन सभाएं हो रही हैं और बंगाल से लेकर दिल्ली तक देश का मीडिया उसे ऐसे प्रस्तुत कर रहा है, जैसे देश और दुनिया की सारी गड़बड़ियों, कमियों, भ्रष्टाचार, महंगाई, पिछड़ापन, घुसपैठ आदि के लिए ममता बनर्जी जिम्मेदार हैं।

सोचें, असम में 10 साल से भाजपा की सरकार है यानी 10 साल से डबल इंजन सरकार है लेकिन वहां भी भाजपा घुसपैठ के मुद्दे पर चुनाव लड़ी और पश्चिम बंगाल में भी उसी मुद्दे पर लड़ रही है। फिर भी इस विरोधाभास को लेकर कहीं कोई चर्चा नहीं है कि अगर बंगाल में घुसपैठ ममता बनर्जी की सरकार के कारण है तो असम में किसके कारण है? बहरहाल, एक अकेली ममता बनर्जी और उनके मुकाबले दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी, दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता, केंद्र व कई राज्यों की सरकारों के मुखिया और अनेकानेक केंद्रीय एजेंसियों के साथ साथ मीडिया भी है। फिर भी अगर ममता जीतती हैं तो क्या होगा? कुछ नहीं होगा। सब भूल कर भाजपा अगले चुनाव की तैयारी में जुटेगी।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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