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मतदाताओं को कितना मासूम समझती हैं पार्टियां

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पांच राज्यों के चुनाव चल रहे हैं और जिस तरह के मुद्दे उठाए जा रहे हैं, पार्टियां जिस तरह के बयान दे रही हैं और जिन उपायों के जरिए अपने को मतदाताओं का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की कोशिश कर रही हें उन्हें देख कर यह सवाल दिमाग में आता है कि पार्टियां मतदाताओं को जितना मासूम समझती हैं क्या वे सचमुच इतने मासूम होते हैं? क्या मतदाता अपने हितों और अपने जीवन से जुड़े मुद्दों के प्रति इतने अनजान होते हैं कि पार्टियां उनको जो समझाएंगी वे उसे ही समझेंगे और उसी हिसाब से मतदान करेंगे?

अभी तक के अनुभव से तो ऐसा नहीं लगता है। मतदाताओं ने अनेकों बार पार्टियों और खास कर सत्तारूढ़ पार्टियों के बनाए नैरेटिव को ध्वस्त किया है और उससे अलग हट कर वोट किया है। फिर क्यों पार्टियां वास्तविक मुद्दों पर बात नहीं करती हैं या चीजों को ठीक करने का ईमानदार प्रयास नहीं करती हैं? इस सवाल पर अलग से विचार की जरुरत है।

तात्कालिक मामला यह है कि क्या केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी यह सोच रही है कि वह अपने नैरेटिव से मतदाताओं के व्यवहार को प्रभावित कर लेगी? क्या उसे लग रहा है कि मतदाता इस बात को नहीं समझ रहे हैं कि सरकार जो कर रही है उसका मकसद चुनावी लाभ लेना है और चुनाव के बाद स्थितियां कुछ और होंगी? जैसे घुसपैठ का मुद्दा है। असम में भाजपा की 10 साल से सरकार है लेकिन अब कहा जा रहा है कि 10 साल में घुसपैठियों की पहचान हुई है और अगले पांच साल में उनको निकाला जाएगा। क्या सचमुच भाजपा के नेता मान रहे हैं कि इस पर लोग यकीन कर लेंगे?

बहरहाल, मासूम मतदाताओं को मूर्ख समझने का व्यापक सवाल तीन विशिष्ट मुद्दों की वजह से उठा है। पहला मुद्दा है, महिला आरक्षण और परिसीमन। दूसरा मुद्दा है, एफसीआरए में बदलाव का विधेयक और तीसरा मुद्दा है, पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत। क्या भाजपा और इन तीन मुद्दों पर मतदाताओं को समझा लेने में कामयाब होगी कि वह अभी जो कर रही है वह उसका स्थायी स्टैंड है और जो कर रही है वह आम मतदाताओं के हित में है?

सबसे पहले महिला आरक्षण की बात करते हैं। केंद्र सरकार ने 2023 के सितंबर में नारी शक्ति वंदन कानून बनाया था। संसद की नई इमारत में पास किया गया यह पहला विधेयक था। इसे पास तो कर दिया गया लेकिन इसमें कई शर्तें जोड़ दी गईं। इसे जनगणना और परिसीमन के साथ जोड़ दिया गया। यानी पहले जनगणना होगी, फिर परिसीमन होगा और तब महिला आरक्षण लागू किया जाएगा। उस समय यह सवाल उठा था कि जब इसे लंबे समय तक के लिए टाले रहना है तो अभी क्यों इसका कानून पास किया जा रहा है? इसका जवाब मुश्किल नहीं था।

अगले साल यानी 2024 के लोकसभा चुनाव से सात महीने पहले महिला आरक्षण बिल पास करने का मकसद यह था कि महिलाओं को मैसेज दिया जाए कि मोदीजी की सरकार उनको 33 फीसदी आरक्षण देने जा रही है। जो काम कोई नहीं कर सका वह मोदीजी करेंगे, भले इसमें थोड़ा समय लगेगा। इसका मकसद 2024 के चुनाव में लाभ लेना था। लेकिन भाजपा को वह लाभ नहीं मिल पाया। चुनाव का पूरा नैरेटिव दूसरा हो गया और भाजपा ने अपनी जीती हुई 63 सीटें गंवा दी। उसे बहुमत के लिए दूसरी पार्टियों पर निर्भऱ होना पड़ा।

उस समय भाजपा का दांव विफल हो गया तो क्या अब सफल हो जाएगा? अब सरकार ने संसद के बजट सत्र का विस्तार कर दिया है और कहा जा रहा है 16 से 18 अप्रैल के बीच सत्र बुला कर नारी शक्ति वंदन कानून में बदलाव किया जाएगा। सरकार उसे जनगणना से अलग कर देगी। इसका मकसद यह मैसेज देना है कि अगले ही लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू हो जाएगा। सोचें, 2023 में भाजपा की केंद्र सरकार ने सोचा कि महिलाओं का क्या है उनको 2034 तक की उम्मीद बंधा देंगे और उनका वोट ले लेंगे और अब उसको लग रहा है कि 2029 में आरक्षण लागू करने का भरोसा दिला देंगे और वोट हासिल कर लेंगे।

क्या महिलाएं इस बात को नहीं समझेंगी कि इसके पीछे सरकार की क्या मंशा है? यह सवाल अपनी जगह है कि सरकार कैसे महिला आरक्षण लागू करेगी? अगर 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन करना है तब भी क्या वह काम पूरा हो जाएगा, क्या उस आधार पर सीटों की संख्या 50 फीसदी तक बढ़ा दी जाएगी और उस आधार पर महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण सुनिश्चित हो जाएगा? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे लेकिन उससे पहले केरल से लेकर पश्चिम बंगाल तक महिला आरक्षण के नाम पर वोट मांगे जाने लगे हैं।

ऐसे ही पश्चिम एशिया में चल रही जंग के बावजूद भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें नहीं बढ़ रही हैं। सरकार की ओर से कहा गया कि पेट्रोलियम कंपनियां भारी घाटा उठा रही हैं और उनकी भरपाई के लिए केंद्र ने पेट्रोल और डीजल दोनों पर उत्पाद शुल्क में 10 फीसदी की कटौती कर दी। इस तरह सरकार ने अपने राजस्व का नुकसान उठाया और जनता पर बोझ नहीं पड़ने दिया। सोचें, दुनिया के दूसरे देश कैसे इस संकट से निपट रहे हैं और भारत कैसे निपट रहा है। नेपाल में पेट्रोलियम उत्पादों की कमी के कारण सप्ताहांत की छुट्टी दो दिन की कर दी गई।

पाकिस्तान में तेल की कीमतें भी बढ़ी हैं और मंत्रियों सहित सरकारी कर्मचारियों के वेतन, भत्ते में भी कटौती की गई है। अमेरिका में तेल की कीमत प्रति गैलन चार डॉलर तक बढ़ गई है। ऑस्ट्रेलिया में सार्वजनिक परिवहन फ्री किया गया है। हर देश अपने स्ट्रेटेजिक भंडार को बनाए रखते हुए इस संकट से निपटने का प्रयास कर रहा है। भारत में भी कॉमर्शियल गैस की आपूर्ति में कमी की गई है और इसकी कीमतें भी बढ़ी हैं। जेट फ्यूल की कीमत भी बढ़ी है। लेकिन सरकार हर प्रयास करके आम लोगों पर दाम का बोझ नहीं आने दे रही है।

सवाल है कि क्या 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में दूसरे और आखिरी चरण के मतदान के बाद भी सरकार का रवैया ऐसा ही रहेगा? आम जनता के बीच चर्चा है कि उसके बाद सरकार दाम बढ़ा देगी। कितनी हैरानी की बात है कि हर व्यक्ति मान रहा है कि चुनाव के बाद दाम बढ़ जाएंगे। लेकिन अभी दाम नहीं बढ़े हैं इसलिए क्या वे भाजपा को वोट कर देंगे कि उसने चुनाव से पहले दाम नहीं बढ़ाया? इसी सवाल का दूसरा पहलू यह है कि हिंदुत्व के सिद्धांत, 2047 तक विकसित भारत बनाने के लक्ष्य, मोदी का चमत्कारिक नेतृत्व, अमित शाह की रणनीति और दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा की सरकार यह सोच रही है कि अभी पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ा देंगे तो वोट खिसक जाएगा? यह मतदाताओं और पार्टियों के व्यवहार को समझने के लिए एक जरूरी बिंदु है।

तीसरा मामला है विदेशी चंदे के नियमन के कानून एफसीआरए का। सरकार ने एफसीआरए कानून में बदलाव का विधेयक पेश किया। लेकिन इस पर चर्चा टाल दिया। क्यों टाल दिया? क्या सरकार यानी भाजपा को लग रहा है कि एफसीआरए कानून में बदलाव के बिल पर चर्चा होती और इसे पास कर दिया जाता तो केरल में ईसाई समुदाय उसे वोट नहीं करता और अब चर्चा टाल दी है तो केरल का ईसाई समुदाय उसे वोट कर देगा?

जिस तरह से देश की जनता को पता है कि चुनाव के बाद पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत बढ़ेगी वैसे ही केरल या देश के दूसरे राज्यों के ईसाई समुदाय को पता है कि चुनाव के बाद एफसीआरए में बदलाव का बिल आएगा। इसके बावजूद थोड़े दिन के लिए इसे टाल कर भाजपा समझ रही है कि ईसाई समुदाय तक पहुंच बनाने का उसका प्रयास कुछ न कुछ तो जरूर कामयाब हो जाएगा। इससे भी पता चलता है कि सरकारें और पार्टियां आम मतदाताओं या मतदाता समूहों को किस तरह से देखती है और उन्हें हैंडल करना कितना आसान समझती हैं। लेकिन सचमुच ऐसा है क्या?

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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