राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

संक्रमण काले, विपरीत बुद्धि?

अब यूजीसी की उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम‘ (“प्रोमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इन्सटीच्यूशंस रेगुलेशंस, 2026”) के नाम पर नया जुल्म आया है। अच्छा होता, संघ-भाजपा के जीर्ण नेता नया नेतृत्व लाने पर बुद्धि लगाते। पार्टियों में ही नहीं, सरकारों के लिए भी। ताकि देश में कुशल, संयमी और बेहतर नेतृत्व विकसित हो। कुर्सी से चिपके रहने की लज्जाजनक परंपरा खत्म हो। उस लालसा में देश के संसाधन, समय, और सामाजिक ऊर्जा की अकूत बर्बादी बन्द हो। पर यह करने के बदले वे काल से लड़ना चाह रहे हैं!

संघ-भाजपा एक संक्रमण के मोड़ पर हैं। उन के नेताओं का समय हो गया है। न केवल एक ही चेहरा, बल्कि एक सी बातें, दावे, भंगिमा, और गलतियाँ, दुर्बलताएं, तिकड़में भी वही देखते-देखते लोग ऊब जाते हैं। अभिनेताओं की तरह नेताओं का भी चढ़ाव या उतार काल होता ही है। कितने भी मँहगे प्रसाधन अभिनेत्रियों की ढलान नहीं छिपा पाते, उसी तरह कैसी भी दलीलें फीके पड़ चुके नेता की रंगत नहीं लौटा सकती। पर नेता इस प्रवंचना के शिकार रहे हैं कि उन के बिना देश या दल डूब जाएगा। यह कितनी मँहगी व बचकानी प्रवंचना रही है, यह अलग अध्याय है।

अभी सोशल मीडिया पर छल-बल से नियंत्रण की कोशिश ध्यातव्य है। वैसे यह संघ-भाजपा मानसिकता के अनुरूप है। एक तो वे कथनी-करनी विसंगति से बेपरवाह रहे हैं। दूसरे, विचारों को भौतिक बल से हराना चाहा है। पर आलोचकों का मुँह जबरन बाँधने की कोशिश विपरीत फल दे सकती है। उन के समर्थक भी समझेंगे कि संपूर्ण राजकीय प्रचार तंत्र, तथा बड़े अखबारों, टीवी चैनलों पर विज्ञापनों के जरिए प्रभाव के बावजूद उन के नेताओं के पास अपने गड़बड़ काम के बचाव में कहने को कुछ नहीं! वरना बेचारे इक्के-दुक्के यू-ट्यूबरों का मुँह बाँधने की क्या जरूरत?

यदि किसी यू-ट्यूबर या ट्विटर हैंडल ने कोई झूठी आलोचना की तो मौजूदा मानहानि कानून पर्याप्त हैं। कितने ही बड़े-बड़े अखबारों को गलत प्रस्तुति में माफी माँगनी पड़ी है। तब अकेले पत्रकारों की क्या बिसात जो सोशल मीडिया पर मुफ्त तकनीक के जरिए ही कुछ लोगों तक पहुँच पाते हैं। वरना उन के पास है क्या! तब एकछत्र सत्ता, बेतहाशा संसाधन, और करोड़ों वोट रखने वाला ‘दुनिया का सब से बड़ा संगठन’ अकेले-दुकेले पत्रकारों को रोकने लगे — तो निश्चय ही उस की नैतिक-मानसिक हालत पतली है। उस के पास अपनी ही करनी के पक्ष में कोई बात नहीं। तभी वह बल-प्रयोग पर आमादा है।

किन्हीं जाति के व्यक्तियों को हर मामले में पहले से दोषी मान कर दंडित करना — यह यूजीसी नियमों द्वारा आधिकारिक रूप से भेदभाव करना है। अब ऐसे जुल्म की पीठ पर खड़े नेताओं का पर्दाफाश भी न हो, और‌ वे लोगों को बरगलाते रहें — यह चाह इतनी अनैतिक है कि उन के कई कार्यकर्ताओं तक को बुरी लगेगी। चाहे वे चुप रहें, परन्तु उनका नैतिक बल क्षीण होगा। वे उसी तेवर से काम करने लायक ही नहीं रहेंगे।

इसलिए भी, क्योंकि यूजीसी नियमावली का जुल्म कोई अकेला या अपवाद नहीं। ‘अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार) कानून’ के कुछ प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को तत्परता से संविधान-संशोधन कर यही नेता सात बरस पहले पलट चुके हैं। अर्थात, निर्दोष लोग प्रताड़ित होते रहें, केवल इसलिए कि वे उन जातियों से हैं जिन का वोट कम है! ताकि अधिसंख्यक जाति-जनजाति मुट्ठी में आएं — यह मंशा संघ-परिवार पहले भी बेशर्मी से दिखा चुका है। उस कानून के अनुचित प्रावधानों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई मामूली राहत भी उसे नामंजूर रही। फलत: उस कानून के बल पर सामान्य जातियों, विशेषत: ब्राह्मणों को निशाना बनाया जाता है।

अभी-अभी बंबई हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने यह पाया। चार वर्ष पहले भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के अमरावती केंद्र के निदेशक डॉ. अनिल सौमित्र पर वहाँ के एक कर्मचारी ने जातिसूचक अपमान का आरोप लगा कर केस कर दिया। जबकि निदेशक ने उस कर्मचारी की लापरवाही पर अपना प्रशासनिक कर्तव्य किया था। किन्तु चूँकि उस कानून की धाराएं ऐसी हैं कि झूठे आरोप पर भी आरोपित का कुछ न कुछ परेशान होना तय है, सो आए-दिन धूर्त लोग सामान्य जाति के किसी व्यक्ति पर प्रताड़ना का आरोप लगाकर ब्लैकमेल करते रहते हैं।

डॉ. सौमित्र उसी के शिकार हुए और चार वर्ष तक मुकदमा तथा तत्संबंधित विभागीय कष्ट भी झेलते रहे। जबकि अंततः कोर्ट ने पाया कि मामला झूठा था।

अब यूजीसी की ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम’ (“प्रोमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इन्सटीच्यूशंस रेगुलेशंस, 2026”) के नाम पर नया जुल्म आया है। इस के अनुसार, शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़ी जातियों के छात्र, कर्मचारी, शिक्षक, आदि की हर शिकायत पर कार्रवाई होगी। चाहे वह झूठी हो या सच्ची। जबकि अन्य जातियों के व्यक्ति को यह सुरक्षा नहीं मिलेगी।

ऐसे विषैले नियम पर संघ-भाजपा के नेता मौन हैं। जबकि बात ‘समरसता’ की करते थे! पर अब विपरीत भेदभाव का विष समाज में घोल रहे हैं। अधिसंख्यक वोटरों की लालसा में शिक्षा संस्थानों में द्वेष फैलाना। ऐसे घातक कदम की जितनी भर्त्सना की जाए, वह कम होगी! संघ-भाजपा सत्ता जिस तरह चल रही है — उस से सर्वविदित है कि सब राजकीय निर्देश उन के नेता के अनुरूप होते हैं। विशेषकर जिस का संबंध सामाजिक भेदभाव करने से हो।

सो, इस यूजीसी नियम के नए जुल्म ने सोशल मीडिया में सामान्य जाति वाले पत्रकारों को आहत किया। वे अपने को दोहरा ठगा व अपमानित मान रहे हैं। उन में अधिकांश लंबे अरसे से संघ-परिवार समर्थक थे। इस आस में कि उस की सत्ता शिक्षा व राजनीति में गाँधीवादी इस्लामपरस्ती दूर करेगी। अब हाल यह कि संघ-भाजपा उन्हीं नीतियों को नए जीवट से बढ़ा रहे हैं! वे ‘तुष्टिकरण’ दूर करने के बदले ‘तृप्तिकरण’ में लग पड़े। यह ‘तृप्तिकरण’ शब्द अपनी नीति के लिए खुद भाजपा नेता ने गर्व से दिया  है।

पर जातिगत भेदभाव के जरिए अधिसंख्यक जातियों को मुट्ठी में करने की मंशा ने सामान्य जाति वाले हिन्दू पत्रकारों को मूर्ख साबित किया। सांप्रदायिक समानता की उन की चाह का संघ-परिवार ने केवल दोहन किया। सत्ता हाथ में लेकर अपना पुराना चोला उतार फेंका, और समर्थक पत्रकारों को ‘यूज एंड थ्रो’ की तरह बेकार मान लिया। जिन की अब जरूरत नहीं, क्योंकि राजकीय संसाधनों के उपयोग से वे अपनी सत्ता स्थाई बनाने के मंसूबे में डूब चुके हैं।

उसी क्रम में उन के विरुद्ध उठती आवाजों को दबाने हेतु नया कानून भी प्रस्तावित है। यह ‘इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी गाइडलाइंस एंड मीडिया एथिक्स’ संशोधन नियम, 2026 आलोचकों का मुँह बाँधना ही है। इस के अनुसार सरकार सोशल मीडिया पर किसी भी कंटेंट को तीन घंटे में हटाने का हुक्म दे सकेगी। वह गलत है या सही, यह बाद में देखा जाएगा। अब कौन बेचारा सोशल मीडिया पत्रकार, बार-बार कोर्ट जाकर गुहार लगायेगा कि उस का कंटेंट गलत हटवाया गया? वह भी अपने खर्चे से कोर्ट जाना, जबकि सत्ताधीशों के पास बेतहाशा संसाधन हैं।

इसलिए, सारी पृष्ठभूमि में यह घटनाक्रम संघ-भाजपा कर्णधारों की मानसिक हालत भी पतली दिखा रहा है। वे बार-बार ऐसे खुले अन्याय करते अपने को चतुर समझ रहे हैं। पर छब्बे बनने की चाह में दूबे बनने की राह पर‌ हैं। बहुमत से संतुष्ट न रहकर, सारे मत पर कब्जे की उन की मंशा बार-बार झलक रही है। वे सामान्य जातियों के हिन्दू को लाचार लघुसंख्यक, तथा उन के नेताओं-कार्यकर्ताओं को जेब में समझकर, मुसलमानों, अनुसूचित जातियों व पिछड़ी जातियों — सब पर अधिकार की लालसा में मनमानी कर रहे हैं।

निश्चय ही, संघ-भाजपा नेता अतीत के अनुभव भूल रहे हैं। एक ओर वे इन्दिरा गाँधी की इमरजेंसी को ‘संविधान हत्या’ कहकर जनता पर प्रोपेगंडा थोपते हैं,‌ दूसरी ओर छद्म रूप से वही इमरजेंसी लगा रहे हैं। जबकि उस इमरजेंसी में लोगों को सब से नागवार अभिव्यक्ति स्वतंत्रता पर प्रतिबंध ही लगा था। बाकी बातों से लोगों पर खास फर्क नहीं पड़ा था। बल्कि तब भ्रष्टाचार में कमी, सरकारी कार्यालयों में चुस्ती, आदि अनेक काम लोगों ने पसंद किये थे। तभी इमरजेंसी हटने पर बनी जनता पार्टी सरकार, जिस में संघ-परिवार शामिल था, की हरकतों से क्षुब्ध होकर लोगों ने दो साल में ही फिर इंदिरा गाँधी को बहुमत से सत्ता वापस दे दी। फिर इन्दिरा या उन के उत्तराधिकारियों ने कभी अभिव्यक्ति स्वतंत्रता को नहीं छुआ।

वह इतिहास भुलाकर संघ-भाजपा द्वारा वैसी ही जबरदस्ती फिर वही परिणाम ला सकती है! विशेषकर इसलिए क्योंकि अब नये मीडिया युग में बातों का फैलना रोकना असंभव-सा हो गया है। उलटे सब का मुँह जबरन बाँधने की बात ही सब से अधिक फैलेगी। यह उन्हें और अलोकप्रिय बनाएगा।

अच्छा होता, संघ-भाजपा के जीर्ण नेता नया नेतृत्व लाने पर बुद्धि लगाते। पार्टियों में ही नहीं, सरकारों के लिए भी। ताकि देश में कुशल, संयमी और बेहतर नेतृत्व विकसित हो। कुर्सी से चिपके रहने की लज्जाजनक परंपरा खत्म हो। उस लालसा में देश के संसाधन, समय, और सामाजिक ऊर्जा की अकूत बर्बादी बन्द हो। पर यह करने के बदले वे काल से लड़ना चाह रहे हैं!

By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और स्तंभकार। राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। कई पुस्तकें प्रकाशित, जिन में कुछ महत्वपूर्ण हैं: 'भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहासलेखन', 'गाँधी अहिंसा और राजनीति', 'इस्लाम और कम्युनिज्म: तीन चेतावनियाँ', और 'संघ परिवार की राजनीति: एक हिन्दू आलोचना'।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

18 − 9 =