आज के सिने–सोहबत में हम बात करेंगे हाल ही में आई फ़िल्म ‘एक्यूज्ड’ की, एक ऐसी फ़िल्म जो केवल मनोरंजन नहीं करती, बल्कि दर्शक को असहज प्रश्नों के बीच खड़ा कर देती है। अनुभूति कश्यप द्वारा निर्देशित यह फ़िल्म मनोवैज्ञानिक और सामाजिक परतों से बनी एक जटिल कथा रचने की कोशिश करती है, जहां आरोप, सत्य, लैंगिक राजनीति और रिश्तों की महीन दरारें एक साथ सामने आती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह फ़िल्म अपनी महत्वाकांक्षा को साध पाती है, या अपने ही विचारों के बोझ तले दब जाती है?
करण जौहर की धर्मा प्रोडक्शंस द्वारा निर्मित इस फ़िल्म की कहानी डॉ. गीतिका सेन (कोंकणा सेन शर्मा) के ईर्द-गिर्द घूमती है, जो लंदन में एक प्रतिष्ठित स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं। उनका व्यवस्थित और सफल जीवन तब दरकने लगता है जब उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगता है। एक सम्मानित सर्जन अचानक ‘आरोपी’ में बदल दी जाती है और यहीं से शुरू होता है सोशल मीडिया ट्रायल, सार्वजनिक अपमान और निजी विघटन का सिलसिला।
फ़िल्म की पटकथा (सीमा अग्रवाल और यश केसवानी) कई ज्वलंत मुद्दों मी टू मूवमेंट, उसके संभावित दुरुपयोग, लैंगिक असमानता, और समलैंगिक रिश्तों, को एक साथ पिरोने की कोशिश करती है। यह प्रयास महत्वाकांक्षी है, और कई जगहों पर प्रभावी भी। खासतौर पर यह बात उभरकर आती है कि विकसित समाजों में भी स्त्री की सफलता पुरुष अहं के लिए चुनौती बन सकती है।
लेकिन फ़िल्म की सबसे दिलचस्प परत ‘दृष्टि’ की राजनीति है कि किसकी नज़र से हम सच को देखते हैं? क्या समाज किसी महिला के ‘आरोपी’ बनते ही उसके शरीर और चरित्र को एक ही फ्रेम में रखकर जज करने लगता है? फ़िल्म इन सवालों को छूती है, मगर उन्हें पूरी गहराई तक खंगालने से पहले ही आगे बढ़ जाती है।
गीतिका (कोंकणा सेन शर्मा) और उनकी पार्टनर (प्रतिभा रांटा) के बीच का रिश्ता फ़िल्म का भावनात्मक केंद्र हो सकता था, लेकिन उसे सीमित स्क्रीन टाइम मिलता है। यह रिश्ता केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकृति और अस्वीकृति के द्वंद्व को भी दर्शा सकता था जो कि आंशिक रूप से ही सामने आता है।
निर्देशन के स्तर पर अनुभूति कश्यप की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह जल्दी निष्कर्ष नहीं देतीं। फ़िल्म लगातार दर्शक को ‘ग्रे ज़ोन’ में रखती है, जहां न पूरी तरह दोष सिद्ध होता है, न निर्दोषता। यह अनिश्चितता ही फ़िल्म की ऊर्जा है, लेकिन यही उसकी कमज़ोरी भी बन जाती है, जब यह ‘नैरेटिव कन्फ्यूजन’ में बदल जाती है।
दरअसल, फ़िल्म एक साथ बहुत कुछ कहना चाहती है, कानूनी प्रक्रिया, सोशल मीडिया ट्रायल, निजी रिश्तों का विघटन, और लैंगिक सत्ता संरचना लेकिन इन सभी को बराबर स्पेस नहीं दे पाती। परिणामस्वरूप, फ़िल्म की कहानी कई बार बिखरी हुई महसूस होती है।
अगर इस फ़िल्म को किसी एक चीज़ के लिए याद रखा जाएगा, तो वह है कोंकणा सेन शर्मा का अद्भुत अभिनय। वह एक ऐसे किरदार को जीती हैं जो बाहर से सशक्त और नियंत्रित दिखता है, लेकिन भीतर से धीरे-धीरे विघटित हो रहा है। उनके चेहरे की सूक्ष्म अभिव्यक्तियां और संवादों की नियंत्रित लय इस किरदार को गहराई देती हैं।
प्रतिभा रांटा भी अपनी सीमित उपस्थिति में प्रभाव छोड़ती हैं, उनकी सहजता और भावनात्मक ईमानदारी स्क्रीन पर टिकती है।
फ़िल्म का इन्वेस्टिगेशन ट्रैक थोड़ा ढीला पड़ता है, और यही वह जगह है जहां कथा की पकड़ कमजोर होती है। क्लाइमैक्स, जो इस तरह की फ़िल्मों में निर्णायक होता है, अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाता। ऐसा लगता है कि फ़िल्म एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष से ठीक पहले रुक जाती है जैसे कोई अधूरी बहस।
तकनीकी स्तर पर सिनेमैटोग्राफी और बैकग्राउंड स्कोर फ़िल्म के मूड को प्रभावी ढंग से स्थापित करते हैं। लंदन का ठंडा, क्लीनिकल स्पेस, अस्पताल, कोर्टरूम और निजी अपार्टमेंट, सब मिलकर एक भावनात्मक दूरी रचते हैं। यह दूरी केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि मानसिक भी है। हालांकि, साउंड डिज़ाइन और एडिटिंग में असमानता कभी-कभी इस इमर्सन को तोड़ देती है।
थोड़ा और गहराई से देखें तो ‘एक्यूज्ड’ दरअसल ‘पोस्ट मी टू’ समाज की एक आलोचना भी है। यह दिखाती है कि कैसे ‘आरोप’ एक सामाजिक घटना बन जाता है जहां न्यायिक प्रक्रिया से पहले ही सामाजिक निर्णय सुनाया जा चुका होता है। लेकिन फ़िल्म इस बहस को पूरी वैचारिक दृढ़ता के साथ स्थापित नहीं कर पाती; यह अधिकतर संकेतों में बात करती है, निष्कर्षों में नहीं। ‘एक्यूज्ड’ एक ईमानदार फ़िल्म है जिसकी महत्वाकांक्षा उसकी उपलब्धि से बड़ी है। यह दर्शकों को असहज करती है, सोचने पर मजबूर करती है, लेकिन अंततः एक अधूरेपन का अहसास भी छोड़ जाती है।
इस फ़िल्म के स्पेस में अगर हम दूसरी फ़िल्मों को याद करें तो ‘पिंक’ (निर्देशक: अनिरुद्ध रॉय चौधरी) एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जहां “नो मीन्स नो” का संदेश केवल संवाद नहीं, बल्कि सामाजिक घोषणा बन जाता है। यह फ़िल्म सहमति (कंसेंट) के मुद्दे को मुख्यधारा में लाती है और बताती है कि स्त्री की स्वतंत्रता को ‘चरित्र’ के पैमाने पर नहीं आंका जा सकता।
इसी तरह ‘आर्टिकल 15’ (निर्देशक: अनुभव सिन्हा) सामाजिक अन्याय, जातिगत भेदभाव और संस्थागत असमानताओं को उजागर करती है। यह फ़िल्म दिखाती है कि कैसे कानून और व्यवस्था के बावजूद समाज में गहरी जड़ें जमाए भेदभाव आज भी मौजूद हैं।
‘थप्पड़’ (निर्देशक: अनुभव सिन्हा) एक ‘साधारण’ घरेलू हिंसा की घटना को केंद्र में रखकर यह सवाल उठाती है कि क्या एक थप्पड़ भी अस्वीकार्य नहीं होना चाहिए? यह फ़िल्म स्त्री की आत्म सम्मान को केंद्र में लाती है।
वहीं ‘एन एच 10’ (निर्देशक: नवदीप सिंह) ‘ऑनर किलिंग” और ग्रामीण पितृसत्ता’ की भयावह सच्चाई को सामने लाती है, जहां कानून से अधिक ‘परंपरा’ का शासन चलता है।
इन सभी फ़िल्मों की एक साझा विशेषता है कि वे दर्शक को असुविधा में डालती हैं। यह असुविधा ही उनका सबसे बड़ा सामाजिक योगदान है, क्योंकि यहीं से संवाद शुरू होता है। ये फ़िल्में हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि हम किस तरह के समाज में जी रहे हैं और किस तरह के समाज की कल्पना करना चाहते हैं।
फ़िल्में केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होतीं; वे समाज के अंत:करण की आवाज़ भी बनती हैं। ‘एक्यूज्ड हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारा न्याय तंत्र और सामाजिक दृष्टि वास्तव में निष्पक्ष है, या वह पितृसत्तात्मक मान्यताओं से संचालित होता है। यह फ़िल्म केवल एक घटना नहीं दिखाती, बल्कि उस मानसिकता को उजागर करती है जो पीड़िता को ही कठघरे में खड़ा कर देती है।
मिलाजुला कर देखें तो ‘एक्यूज्ड’ जैसी फ़िल्में केवल कहानियां नहीं सुनातीं, बल्कि सामाजिक चेतना को जगाने का कार्य करती हैं। वे दर्शक को ‘दर्शक’ भर नहीं रहने देतीं, बल्कि उसे एक जागरूक नागरिक में बदलने की कोशिश करती हैं।
यह फ़िल्म एक बार देखी जानी चाहिए, न केवल कहानी के लिए, बल्कि उन सवालों के लिए जो यह हमारे भीतर छोड़ जाती है।
नेटफ़्लिक्स पर है, देख लीजिएगा।
(पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़’ के होस्ट हैं।)


