राज्य-शहर ई पेपर व्यूज़- विचार

हिंसा, अव्यवस्था के भंवर में बंगाल

अगर एक बार समय की कमी या किसी अन्य आधार पर लाखों लोगों का नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं होता है और उसके बगैर चुनाव हो जाता है तो इसकी एक मिसाल बन जाएगी। इस बार भले स्वाभाविक कारणों से ऐसा हो लेकिन भविष्य में ऐसा भी हो सकता है कि इस घटनाक्रम की मिसाल बना कर राजनीतिक कारणों से लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित किया जाए।

पश्चिम बंगाल में पहले चरण की 152 सीटों के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने का काम पूरा हो गया है। पहले चरण के मतदान में सिर्फ 18 दिन बचे हैं और लाखों लोग अब भी मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए इधऱ उधर भटक रहे हैं। यह किसी पार्टी के लाभ या हानि का मामला नहीं है। इस बात का भी कोई अर्थ नहीं है कि लगभग 25 लाख लोगों के जो नाम कटे हैं वे किस जाति या किस समुदाय के हैं। असली प्रश्न संविधान से मिले मतदान के अधिकार का है। क्या लाखों लोगों को अधर में छोड़ कर यानी उनके मतदान करने के अधिकार के बारे में अंतिम निर्णय किए बगैर चुनाव कराया जा सकता है? यह बहुत बड़ा सवाल है, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय को विचार करना है। चुनाव आयोग, राज्य सरकार, राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी और अन्य पार्टियों को भी इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

यह प्रश्न इसलिए उठ रहा है क्योंकि देश के दूसरे राज्यों से बिल्कुल अलग पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का मामला अधिक जटिल हो गया है। बंगाल में एसआईआर के दूसरे चरण के बाद जो अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित हुई थी उसमें 60 लाख मतदाताओं के नाम विचाराधीन श्रेणी में डाल दिए गए थे। इन मतदाताओं के दस्तावेजों की नए सिरे से जांच करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर 705 न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया गया। इन न्यायिक अधिकारियों का काम भी छह अप्रैल को पूरा हो जाएगा। ये सभी अधिकारी विचाराधीन श्रेणी के मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच कर रहे हैं और उनकी रिपोर्ट के आधार पर पूरक मतदाता सूची जारी हो रही है। अभी तक प्रकाशित पूरक मतदाता सूचियों के मुताबिक अनुमान है कि 24 से 25 लाख लोगों के दस्तावेज अपूर्ण पाए गए हैं और उनके नाम मतदाता सूची में नहीं शामिल किए गए हैं। यह भी अभूतपूर्व बात है कि ऐसे लोगों को सुनवाई का एक और मौका देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने 19 ट्रिब्यूनल बनाए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा इसलिए किया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके के किसी भी पात्र मतदाता का नाम मतदाता सूची से बाहर नहीं हो पाए।

समस्या यही पर आती है। अगर सर्वोच्च न्यायालय हर पात्र मतदाता का नाम मतदाता सूची में शामिल करना चाहता है तो वह कैसे हो पाएगा? अभी तक किसी भी ट्रिब्यूनल ने काम शुरू नहीं किया है और इस बीच एक ट्रिब्यूनल के जज के अपने को इस प्रक्रिया से अलग कर लेने की खबर है। ध्यान रहे ट्रिब्यूनल का प्रमुख हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को बनाया गया है। वे अपने प्रोटोकॉल और ट्रिब्यूनल के अधिकारों के हिसाब से काम करना चाहते हैं। परंतु कई जगह से ऐसी खबरें हैं कि न तो उनके बैठने यानी अपनी अदालत लगाने के लिए पर्याप्त जगह मुहैया कराई गई और न पर्याप्त कर्मचारी मुहैया कराए गए। यहां तक तय नहीं हुआ कि ट्रिब्यूनल आमतौर पर जिस तरह एक अपीलीय अदालत के तौर पर काम करता है उसी तरह से काम करेगा या कोई अपवाद बनाया जाएगा। 19 ट्रिब्यूनल में करीब 25 लाख मतदाताओं की आपत्तियां सुनी जानी हैं। इसका अर्थ है कि हर ट्रिब्यूनल को औसतन सवा लाख के आसपास मामले निपटाने होंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कह दिया है कि मतदाता ट्रिब्यूनल के सामने नए दस्तावेज भी प्रस्तुत कर सकते हैं। इसका अर्थ है कि जांच में अतिरिक्त समय लगेगा। तभी सवाल है कि किस तरह से इतने कम समय में इतने लोगों के दस्तावेजों की जांच हो पाएगी? ध्यान रहे पहले चरण के मतदान में अब सिर्फ 18 दिन बचे हैं और चुनाव आयोग को मतदाता सूची फ्रीज करनी होगी। तभी यह काम नामुमकिन की हद तक मुश्किल लग रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय में इस मुद्दे पर लगातार सुनवाई हो रही है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने जिस दिन बताया कि 60 लाख विचाराधीन मामलों में 47 लाख लोगों के नाम का निस्तारण हो गया है उस दिन बेंच ने इस पर खुशी भी जताई थी और उम्मीद जताई थी कि बचे हुए मतदाताओं के मामले का भी निस्तारण समय से हो जाएगा। लेकिन सवाल है कि उसके बाद क्या? उसके बाद भी अगर 24 से 25 लाख लोगों के नाम कट रहे हैं। अगर सर्वोच्च न्यायालय ने स्वंय उनको अपना नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए एक मौका और देने का फैसला किया है तो निश्चित रूप से उनको वह मौका मिलना चाहिए और वह मौका इस बार ही मिलना चाहिए। इस ओर ध्यान दिलाना इसलिए आवश्यक है क्योंकि बेंच में शामिल एक माननीय न्याय़ाधीश ने कहा कि इस बार किसी का नाम कट गया तो इसका यह अर्थ नहीं है कि उसका नाम हमेशा के लिए कट जाएगा। इस टिप्पणी के बाद इसकी कई तरह से व्याख्या की जाने लगी। यह कहा जाने लगा कि लाखों लोगों के नाम कट जाते हैं तब उनको छोड़ कर भी चुनाव कराया जा सकता है। हालांकि इस मामले की सुनवाई कर रही बेंच ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी व्यक्ति को उसके संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा।

यह इसलिए आवश्यक है कि क्योंकि अगर एक बार समय की कमी या किसी अन्य आधार पर लाखों लोगों का नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं होता है और उसके बगैर चुनाव हो जाता है तो इसकी एक मिसाल बन जाएगी। इस बार भले स्वाभाविक कारणों से ऐसा हो लेकिन भविष्य में ऐसा भी हो सकता है कि इस घटनाक्रम की मिसाल बना कर राजनीतिक कारणों से लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित किया जाए। चूंकि पश्चिम बंगाल में एसआईआर की पूरी प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय की देख रेख में चल रही है इसलिए बंगाल में जो भी होगा वह पूरे देश के लिए एक मिसाल बनेगा। तभी आवश्यक है कि विचाराधीन श्रेणी के जिन मतदाताओं के नाम अपूर्ण दस्तावेजों के आधार पर पूरक मतदाता सूची में नहीं शामिल हो पाते हैं उनको अंतिम अवसर दिए बगैर यानी ट्रिब्यूनल में सुनवाई के बगैर मतदान करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाए। मुश्किल यह है कि चुनाव आयोग मतदान की तारीखों का ऐलान कर चुका है और उससे पहले मतदाता सूची फ्रीज करने की तारीख भी नजदीक आ गई है। यह यक्ष प्रश्न है कि उससे पहले अगर सभी मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच नहीं हो पाती है तो क्या होगा? उनको छोड़ कर मतदान होगा या मतदान का समय आगे बढ़ेगा? यह निर्णय पूरी तरह से सर्वोच्च न्यायालय के हाथ में है। चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों की अपनी राय होगी परंतु अंतिम निर्णय सर्वोच्च न्यायालय को करना है, जिसके ऊपर संविधान के संरक्षण की जिम्मेदारी है।

इस पूरे मामले को ज्यादा संवेदनशील तरीके से और गंभीरता से सुलझाने की आवश्यकता इस कारण से भी है कि पश्चिम बंगाल राजनीतिक रूप से बहुत सजग प्रदेश है। वहां 80 फीसदी से ज्यादा लोग मताधिकार का इस्तेमाल करते हैं। दूसरी बात यह है कि जनसंख्या संरचना के कारण मतदाता सूची से नाम कटने को नागरिकता पर संकट की तरह प्रस्तुत किया जाता है। यही कारण है कि मालदा में इतना बड़ा विवाद खड़ा हुआ। यह बहुत भयावह था कि लोगों की भीड़ ने न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया। आधी रात को सर्वोच्च न्यायालय को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने राज्य के पुलिस महानिदेशक से बात की और तब भारी सुरक्षा के बीच न्यायिक अधिकारियों को बीडीओ के कार्यालय से बाहर निकाला गया। तब भी उनकी गाड़ियों पर हमला हुआ और पथराव किया गया, जिसमें गाड़िया क्षतिग्रस्त हुईं। बंधक बनाई गई न्यायिक अधिकारियों में महिलाएं भी थी और एक बच्चा भी था। एक महिला अधिकारी की ओर से कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भेजा गया ऑडियो संदेश दिल दहला देने वाला है। वह महिला रोते हुए विनती कर रही है कि उन पर हमला हुआ है और उन्हें बचाया जाए। महिला यह भी कह रही है कि अगर उसे कुछ हो जाए तो उसके बच्चों का ख्याल रखा जाए। इस प्रकरण में स्थानीय प्रशासन की भूमिका सवालों के घेरे में है। तभी राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए इस मामले की जांच कर रही है।

यह सिर्फ एक क्षेत्र की बात है। अगर अंतिम रूप से मतदाता सूची फ्रीज हो जाती है और 24 से 25 लाख लोगों के नाम छूट जाते हैं तो क्या हो सकता है कि इसका अऩुमान लगाना भी कठिन है। राज्य के कई हिस्से जनसंख्या संरचना की वजह से स्थायी रूप से तनावपूर्ण होते हैं। उन सभी क्षेत्रों में अभी शांति इस वजह से है क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया चल रही है। एक बार न्यायिक प्रक्रिया समाप्त हुई और लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से बाहर हुए तो परिस्थिति बहुत भयावह हो सकती है। अगर इस परिस्थिति में चुनाव हुआ तो बंगाल भयंकर हिंसा के भंवर में फंस सकता है। यह सिर्फ प्रदेश नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बन जाएगा। वोट बैंक की राजनीति के कारण एक खास समुदाय के तुष्टिकरण की नीति प्रदेश को इस मुकाम तक ले आई है। यह एक बड़ा मौका है, जब तुष्टिकरण की राजनीति से ऊपर उठ कर मतदाता सूची को शुद्ध किया जाए और तभी चुनाव हो।

इस प्रकरण का एक दूसरा पहलू यह भी है कि बिहार में एसआईआर के बाद जब यह स्पष्ट हो गया कि पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले एसआईआर होगी तो दिन रात एक कर के लोगों को जन्म प्रमाण पत्र, आधार आदि दस्तावेज उपलब्ध कराए गए। एक राजनीतिक दल के समर्थक अधिकारियों द्वारा जितने संभव हों, संदेहास्पद लोगों के नाम सूची में डाल दिए गए। यह सब एक चुनाव सलाहकार कंपनी के निर्देशानुसार और निगरानी में हुआ है। दबी जुबान से कई न्यायिक अधिकारियों के विषय में भी ऐसा ही कहा जा रहा है। जानकार लोगों का कहना है कि अगर पूरी मतदाता सूची की निष्पक्ष जांच हो तो अब भी कई लाख नाम फ़र्ज़ी मिलेंगे, जिन्हें कुछ अधिकारियों द्वारा अपने राजनीतिक प्रेम और रिश्तों के कारण ग़लत तरीक़े से येन केन प्रकारेण मतदाता सूची में डाल दिया गया है। इससे पूरी प्रक्रिया प्रदूषित हो गई है। इससे पूरे राज्य और सरकार की कार्य संस्कृति का भी पता चलता है। इस कारण भी आवश्यक है कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित की जाए और सख्त सुरक्षा में स्वतंत्र व निष्पक्ष मतदान संपन्न कराने के उपाय किए जाएं। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

15 − eight =