प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में चल रही जंग और उसके असर को लेकर संसद के दोनों सदनों में बयान दिया। उन्होंने जंग को लेकर चिंता जताई और कहा कि जंग जारी रही तो गंभीर नतीजे होंगे। प्रधानमंत्री ने दोनों सदनों में मोटे तौर पर एक ही लाइन पर अपनी बात रखी। लेकिन राज्यसभा में उन्होंने कुछ अलग जुमले बोले। जैसे ‘गंभीर नतीजे’ वाला जुमला उन्होंने राज्यसभा में बोला। इसके अलावा उनके दो जुमले और बहुत अहम हैं, जिन पर ध्यान देने की जरुरत है। उन्होंने कहा, ‘आने वाला समय देश की सबसे बड़ी परीक्षा लेने वाला है’। उनका तीसरा जुमला था, ‘इसमें राज्यों का सहयोग जरूरी है और टीम इंडिया की तरह काम करना होगा’।
लेकिन एक बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री, उनकी सरकार और उनकी पार्टी ‘टीम इंडिया’ की तरह काम करती है? राज्यों के साथ और खास कर विपक्षी शासन वाले राज्यों के साथ केंद्र का जो बरताव रहा है, विपक्ष के नेताओं के प्रति जैसा अपमानजनक रवैया रहा है उसे देखते हुए तो कतई नहीं कहा जा सकता है कि केंद्र की सरकार या केंद्र में सत्तारूढ़ दल ने कभी टीम स्पिरिट का प्रदर्शन किया है। सिर्फ संकट के समय राज्यों और विपक्ष का सहयोग खोजना और उस समय टीम इंडिया की तरह काम करने की अपील करना एक किस्म की राजनीति है।
खैर, अभी उस राजनीति का समय नहीं है क्योंकि संकट सचमुच बहुत बड़ा है और इसका कारण यह है कि भारत में आजादी के बाद से कभी भी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के गंभीर प्रयास नहीं हुए। सोचें, आजादी के बाद यानी 1947 से लेकर 2007 देश में एलपीजी स्टोरेज की सिर्फ एक फैसिलिटी मेंगलुरू में तैयार हुई थी और उसके बाद विशाखापत्तनम में एक और हुई है। उधर चीन 37 नई फैसिलिटी तैयार कर रहा है। आजादी के बाद न तो तेल, गैस और वैकल्पिक ईंधन की तलाश का कोई बड़ा अभियान चला और न वैकल्पिक ऊर्जा को लेकर कोई गंभीर प्रयास हुआ। यह सही है कि आजादी के बाद ओएनजीसी की स्थापना हुई और उसने ईंधन की खोज का कुछ काम किया। लेकिन देश की विशाल आबादी को देखते हुए उसके प्रयास ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ की तरह थे।
हालांकि अब तो ओएनजीसी भी भारी कर्ज में डूबा है और ईंधन खोजने का काम ठप्प है। नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर भी भारत के प्रयास बहुत ढीले ढाले रहे। मिसाल के तौर पर थोरियम आधारित परमाणु प्लांट्स की बात ले सकते हैं। भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा थोरियम भंडार है और इसे बिजली में बदलने की तकनीक भी है। 2003 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तब तय हुआ था कि सात साल के अंदर थोरियम से बिजली बनाने का प्रोटो टाइप तैयार हो जाएगा। लेकिन 23 साल बाद भी अभी भारत इस दिशा में कुछ नहीं कर पाया है। अगर सरकार थोरियम आधारित ऊर्जा को प्राथमिकता बनाए तो भारत की ऊर्जा चिंता को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। यह भारत को वास्तविक अर्थों में आत्मनिर्भर बनाने वाली चीज होगी।
परंतु मुश्किल यह है कि जैसे 2003 में थोरियम आधारित ऊर्जा बनाने की तैयारी शुरू करने के बाद 23 साल में कुछ नहीं हो सका वैसे ही 2008 में अमेरिका के साथ परमाणु संधि होने के बाद परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी कोई बड़ी खास तरक्की नहीं हुई। सौर ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों की बड़ी चर्चा होती रही है लेकिन उस मामले में भी भारत की निर्भरता चीन पर बहुत ज्यादा है। बैटरी से लेकर सोलर पैनल तक भारत लगभग पूरी तरह से चीन पर निर्भर है। कच्चे तेल का तो लगभग 90 फीसदी हिस्सा भारत आयात करता है और उसमें भी ज्यादातर आयात खाड़ी देशों से होता है। गैस की जरुरतों का भी 60 फीसदी हिस्सा भारत आयात करता है और जंग छिड़ने से पहले तक उसका 90 फीसदी हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से ही आता था। अब इसमें कमी आई है। भारत ने ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका से खरीद बढ़ाई है और घरेलू उत्पादन भी बढ़ाया गया है। लेकिन यह सब अस्थायी उपाय हैं। हर बार जब कोई संकट आता है तो ऐसे अस्थायी उपाय आजमाए जाते हैं और स्थायी समाधान के संकल्प जताए जाते हैं। लेकिन संकट समाप्त होते ही सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आता है।
यह समझने की जरुरत है कि पश्चिम एशिया की जंग ने न सिर्फ भू राजनीतिक तनाव बढ़ाया है, बल्कि तेल और गैस की पूरी आपूर्ति शृंखला को ही खतरे में डाल दिया है। अमेरिका को कहना पड़ा है कि उसने नहीं सोचा था कि ईरान पर हमला होगा तो वह दूसरे खाड़ी देशों के तेल व गैस संयंत्रों पर हमला शुरू कर देगा या सबसे महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग यानी होरमुज की खाड़ी को बंद कर देगा। लेकिन अब इसकी सचाई सबके सामने है। सो, भारत को अपनी ऊर्जा जरुरतों को स्थायी रूप से सुरक्षित करने के लिए भू राजनीतिक हालात पर तो नजर रखना ही होगा साथ ही ऊर्जा के मामले में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की ठोस योजना बना कर उस पर अमल करना होगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत पहले अब 41 देशों से तेल व गैस खरीदने लगा है। यह विविधता ठीक है लेकिन दूसरे देशों पर अति निर्भरता किसी भी समय भी देश को संकट में डाल सकती है। जैसे अभी हुआ है। तेल व गैस की आपूर्ति से भारत में ईंधन के लिए हाहाकार मचा तो साथ ही उर्वरक और सेमीकंडक्टर उद्योग के सामने भी संकट खड़ा हो गया। सेमीकंडक्टर का संकट तो वैश्विक है। हीलियम गैस की आपूर्ति प्रभावित होने से ताइवान सहित दुनिया के दूसरे सभी देशों में सेमीकंडक्टर उद्योग के सामने समस्या है।
बहरहाल, पश्चिम एशिया का संकट पूरी दुनिया में आर्थिक विकास की दर को दो फीसदी तक धीमा कर सकता है। भारत की विकास दर को लेकर भी युदध के बाद का जो पहला अनुमान आया है वह गोल्डमैन सॉक्स का है, जिसने एक फीसदी से ज्यादा कमी का अनुमान लगाया है। पहले उसने कहा था कि वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की विकास दर सात फीसदी रहेगी, जिसे घटा कर बैंक ने 5.9 फीसदी कर दिया है। देश में महंगाई की दर बढ़ रही है और कई महीनों के बाद पहली बार कहा जा रहा है कि रिजर्व बैंक नीतिगत ब्याज दरों में आधा फीसदी की बढ़ोतरी कर सकता है। अगर ब्याज दरें बढ़ती हैं तो उससे भी विकास दर पर ब्रेक लगेगी।
सो, ईंधन आपूर्ति प्रभावित होने का चौतरफा असर हो रहा है। उद्योग धंधे बंद हो रहे हैं। रुपए की कीमत गिर रही है। आयात बिल बढ़ रहा है, जिससे व्यापार घाटा बढ़ेगा। महंगाई की दर बढ़ रही है। विकास दर नीचे आएगी। खाद की आपूर्ति प्रभावित होने से खरीफ की फसल के समय किसानों को समस्या आएगी, जिसका असर खाद्यान्न सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। सरकार 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज दे रही है और उज्ज्वला योजना के तहत करोड़ों कनेक्शन मुफ्त बांटे गए। करोड़ों कनेक्शन बांटने से पहले इसके लिए पर्याप्त एलपीजी का इंतजाम करने की जरुरत नहीं समझी गई!
अब भी समय है कि भारत इस संकट से सबक ले और गंभीरता से आगे की तैयारी करे। ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक बहुआयामी रणनीति अपनाए। इसके लिए सबसे पहले, ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने का प्रयास जरूरी है। यह काम शुरू हो गया है। पश्चिम एशिया के साथ साथ अफ्रीका, अमेरिका और रूस जैसे अन्य क्षेत्रों से भी ऊर्जा आयात बढ़ाया जा रहा है। इसके साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा को तेजी से बढ़ावा देना होगा। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, पनबिजली, और बायोएनर्जी जैसे स्रोतों पर फोकस करना होगा। थोरियम आधारित ऊर्जा के बारे में गंभीरता से विचार करना होगा। आयात के साथ साथ तेल व गैस की खोज और उत्पादन में निवेश बढ़ाने की जरुरत को प्राथमिकता देनी होगी। भारत में तेजी से हो रहे शहरीकरण की वजह से मांग बढ़ रही है। इसलिए ऊर्जा संसाधनों के कुशल इस्तेमाल और नियंत्रण पर भी ध्यान देने की जरुरत है ताकि कम संसाधन में अधिक काम हो सके। इस संकट का एक सबक यह भी है कि भारत को ऊर्जा के रणनीतिक भंडार को और बड़ा करने की जरुरत है और यह काम जितनी जल्दी हो उतना अच्छा होगा।


