राहुल गांधी को अतिश्योक्ति अलंकार के साथ बोलने की आदत है। वे सामान्य ढंग से कोई बात नहीं कहते हैं। ऐसा लगता है कि उनकी टीम के लोगों ने उनको समझाया है कि हमेशा बड़ी बात कहनी है और अगर कोई बड़ी बात नहीं है तो किसी भी बात को बड़ा बना कर कहना है। अभी पिछले दिनों उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें 55 मिनट का प्रेजेंटेशन दिया और चुनाव आयोग के ऊपर हमला किया। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को वोट चोरी करने वाला और देशद्रोही बताया। चुनाव के समय के नारों को छोड़ दें तो इतनी आसानी से किसी को चोर और किसी को देशद्रोही कहने का चलन हाल के दिनों में ही शुरू हुआ है। पहले देशभक्त और देशद्रोही का सर्टिफिकेट बांटने का काम भाजपा करती थी। लेकिन अब राहुल गांधी भी यह काम करने लगे हैं।
बहरहाल, राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि चुनाव आयोग के कारण भाजपा और नरेंद्र मोदी चुनाव जीत रहे हैं। ऐसा लगा, जैसे ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट उनके लिए यूरेका मोमेंट हो। उसी अंदाज में उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के कारण नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ एंटी इन्कम्बैंसी नहीं होती है। उनका कहना था कि सभी सरकारों के खिलाफ एंटी इन्कम्बैंसी होती है लेकिन मोदी और भाजपा की सरकारों के खिलाफ नहीं होती है और इसका कारण चुनाव आय़ोग है। इसी क्रम में उन्होंने यह भी कहा कि इंदिरा गांधी अपनी लोकप्रियता के चरम पर थीं तब उनके खिलाफ भी एंटी इन्कम्बैंसी हुई थी और वे चुनाव हार गई थीं। यह बहुत नासमझी वाला बयान है। इंदिरा गांधी जब हारी थीं तब वे लोकप्रियता के नहीं, बल्कि अलोकप्रियता के चरम पर थीं। उनकी लोकप्रियता का चरम 1971 का चुनाव था, जिसमें वे ‘गरीबी हटाओ’ के नारे पर जीती थीं और उसी साल के अंत में पाकिस्तान से युद्ध करके बांग्लादेश का निर्माण कराया था। लेकिन उसके बाद से उनकी लोकप्रियता गिरती चली गई। उन्होंने 1975 में इमरजेंसी लगाई, विपक्ष के नेताओं को गिरफ्तार किया, नागरिकों के मौलिक अधिकार स्थगित कर दिए, मीडिया का गला घोंट दिया, संविधान में 42वां संशोधन करके लोकसभा का कार्यकाल छह साल कर दिया, तब जाकर लोगों ने 1977 में उनको हराया। उनके खिलाफ इन सब कारणों से एंटी इन्कम्बैंसी बनी थी।
जहां तक सबके खिलाफ एंटी इन्कम्बैंसी होने और नरेंद्र मोदी व भाजपा के खिलाफ नहीं होने के दावे का सवाल है तो वह भी अधूरा दावा है। हां, यह जरूर है कि नरेंद्र मोदी और भाजपा ने एंटी इन्कम्बैंसी को कम करने और सत्ता विरोधी लहर को सत्ता के समर्थन में बदलने के फॉर्मूले को दूसरी पार्टियों से बेहतर साध लिया है। वैसे सरकारों के प्रति प्रो इन्कम्बैंसी का इन दिनों एक वैश्विक परिघटना के तौर पर अध्ययन किया जा रहा है। हाल कि दिनों में ‘मुफ्त की रेवड़ी’ बांटने की राजनीति से सरकारों को हराना मुश्किल हुआ है। इसके बावजूद सरकारें हारी हैं। भाजपा की सरकारें भी हार कर सत्ता से बाहर हुई हैं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के भाजपा की कमान संभालने के बाद से अनेक राज्यों में भाजपा हार चुकी है। 2018 में वह एंटी इन्कम्बैंसी के कारण राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ तीनों जगह हारी। 2019 में झारखंड में हारी। 2022 में हिमाचल प्रदेश और 2023 में कर्नाटक में हारी। 2024 में लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बहुत खराब हुआ और वह 63 सीटें गंवा कर 240 पर आ गई।
हां, यह जरूर है कि भाजपा की सरकारों के हारने का अनुपात दूसरी पार्टियों खास कर कांग्रेस के मुकाबले कम है। कांग्रेस पार्टी हाल के दिनों में अपनी एक भी सरकार नहीं बचा पाई है और यह कांग्रेस की कमजोरी है। इसी को राहुल ने जाहिर किया है। इसका दोष भाजपा या चुनाव आयोग पर नहीं डाला जा सकता है। यह बहुत बेसिक बात है कि जन समर्थन साथ नहीं हो तो कोई एजेंसी चुनाव नहीं जिता सकती है और अगर जन समर्थन हो तो कोई भी एजेंसी हरा नहीं सकती है। आखिर कांग्रेस की सहयोगी ममता बनर्जी ने लगातार तीन चुनाव जीते। उनकी दो सरकारों ने सत्ता विरोधी लहर को समाप्त कर चुनाव जीता। नवीन पटनायक तो लगातार पांच चुनाव जीते। नीतीश कुमार भी लगातार पांच चुनाव जीते। हेमंत सोरेन लगातार दूसरा चुनाव जीते हैं। पांच साल सरकार चलाने के बाद 2024 में सीटों की संख्या बढ़ा कर जीत हासिल की।
खुद कांग्रेस 1999 से 2014 तक महाराष्ट्र में, 2004 से 2014 तक आंध्र प्रदेश और हरियाणा में जीती थी। पांच साल केंद्र में सरकार चलाने के बाद कांग्रेस 2009 में 145 से 207 पहुंच गई और दोबारा सरकार बनाई। सोचें, जब कांग्रेस लगातार जीत रही थी या नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी आदि जीत रहे थे तो वह जन भावना का प्रकटीकरण था और भाजपा जीत रही है तो वह चुनाव आयोग के कारण जीत रही है! 2001 से 2016 तक कांग्रेस लगातार तीन बार असम में जीती तो वह कांग्रेस की काबिलियत थी लेकिन भाजपा लगातार तीन बार जीत गई तो वह बेईमानी है! दिल्ली में कांग्रेस 1998 से 2013 तक और आम आदमी पार्टी 2013 से 2025 तक जीती तो उन्हें जनता ने जिताया लेकिन अगर भाजपा दो बार जीत जाए तो वह बेईमानी होगी!
राहुल गांधी यह स्वीकार नहीं करेंगे कि असम में लगातार 15 साल तरूण गोगोई को और दिल्ली में शीला दीक्षित को रख कर कांग्रेस ने जो गलती की उसका खामियाजा भुगतना पड़ा। आंध्र प्रदेश में वाईएसआर रेड्डी के असमय निधन के बाद उनके बेटे जगन मोहन को सीएम नहीं बनाया और फिर राज्य का विभाजन कर दिया इसलिए वहां से कांग्रेस साफ हुई। केंद्र में भी 2011 के आरोपों और आंदोलनों के बाद मनमोहन सिंह को बदल देते तो ऐसी दुर्दशा नहीं होती, जैसी हुई। लेकिन इन सबके लिए चुनाव आय़ोग को जिम्मेदार ठहरा देना बहुत आसान उपाय है। इसे राजनीतिक समझदारी नहीं, बल्कि पलायनवाद कहा जाता है।
सोचें, जिस तरह कर्नाटक में कांग्रेस ने बीच में सीएम बदला और डीके शिवकुमार को बनाया। उससे अगर कांग्रेस का सामाजिक समीकरण ठीक होता है और सरकार चुनाव के समय ‘मुफ्त की रेवड़ी’ बांट कर जीत जाती है तो राहुल क्या कहेंगे? किसी तरह से अगर रेवंत रेड्डी तेलंगाना में कांग्रेस को फिर से जिता दें तो राहुल क्या कहेंगे? इसलिए भाजपा की लगातार जीत को चुनाव आयोग का चमत्कार बता कर राहुल असल में अपनी और पार्टी संगठन की कमियों को छिपा रहे हैं। वे अगर अपने प्रतिद्वंद्वी की शक्तियों और अपनी कमजोरियों को समझेंगे नहीं तब तक प्रभावी तरीके से मुकाबला नहीं कर पाएंगे। यह सही है कि भाजपा को राजनीतिक फायदे के लिए अपनी सरकार की शक्तियों के दुरुपयोग में हिचक नहीं है। लेकिन कम या ज्यादा सभी सरकारें ऐसा करती हैं। इसलिए राहुल को यह वास्तविकता स्वीकार करनी चाहिए कि भाजपा चुनाव आयोग या केंद्रीय जांच एजेंसियों के कारण नहीं जीत रही है। चुनावी जीत में इन सबकी भूमिका दाल में नमक के बराबर है। जिस दिन जनभावना राहुल और कांग्रेस की ओर मुड़ेगी उस दिन इन सबका कोई मतलब नहीं रह जाएगा।
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