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रायबरेली, अमेठी का बेसिर पैर का फैसला

हर राजनीतिक दल के पास समर्थकों और भक्तों की एक सेना होती है। पहले यह सेना सड़कों पर उतरती थी, जुलूस में जाती थी, नारे लगाती थी और नेता के हर सही, गलत फैसले का बचाव करती थी। अब समर्थकों और भक्तों की सेना सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उतरती है और वहां आभासी लड़ाई लड़ती है। कहने की जरुरत नहीं है कि पार्टी या नेता चाहे अलग अलग हों लेकिन भक्त एक जैसे होते हैं।

तभी जिस तरह से हजारों, लाखों लोगों ने ताली और थाली बजा कर कोरोना भगाने की अपील को जस्टिफाई करने के अनेक धार्मिक व वैज्ञानिक तर्क ढूंढ लिए थे उसी तरह रायबरेली और अमेठी का उम्मीदवार तय करने के कांग्रेस के फैसले को भी जस्टिफाई करने के तर्क ढूंढ लिए गए हैं। जैसे कोविड महामारी के समय लॉकडाउन और ताली थाली बजाने को कोरोना भगाने का मास्टरस्ट्रोक बताया जा रहा था वैसे ही राहुल गांधी के रायबरेली और किशोरी लाल शर्मा के अमेठी से चुनाव लड़ने को मास्टरस्ट्रोक बताया जा रहा है। सोशल मीडिया में पत्रकारों और विश्लेषकों की बड़ी जमात इसे गेमचेंजर बता रही है।

जब कांग्रेस ने राहुल गांधी को रायबरेली और किशोरी लाल शर्मा को अमेठी से चुनाव लड़ाने का फैसला किया तो सबसे मजेदार टिप्पणी कांग्रेस के महासचिव और संचार विभाग के प्रमुख जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर की। उन्होंने लिखा- राहुल गांधी राजनीति और शतरंज के मंजे हुए खिलाड़ी हैं। सोच समझ कर दांव चलते हैं। ऐसा निर्णय पार्टी के नेतृत्व ने बहुत विचार विमर्श करके बड़ी रणनीति के तहत लिया है। उन्होंने आगे लिखा- इस फैसले से भाजपा, उनके समर्थक और चापलूस धराशायी हो गए हैं। उनको समझ नहीं आ रहा अब क्या करें? रायबरेली सिर्फ सोनिया गांधी की नहीं, खुद इंदिरा गांधी की सीट रही है। यह विरासत नहीं जिम्मेदारी है, कर्तव्य है। इस ट्विट के तुरंत बाद भक्त संप्रदाय को मसाला मिल गया और वे इसे मास्टरस्ट्रोक ठहराने के तर्क ढूंढने और गढ़ने लगे। कई लोगों ने तो ऐसे ऐसे तर्क ढूंढ लिए हैं, जिनके बारे में फैसला करने वालों ने भी नहीं सोचा होगा।

बहरहाल, जयराम रमेश के ट्विट से ही बात शुरू करें। उन्होंने कहा कि, ‘रायबरेली सिर्फ सोनिया गांधी की नहीं, खुद इंदिरा गांधी की सीट रही है’। तभी सवाल है कि क्या इंदिरा या सोनिया गांधी ने कभी अपनी सीट छोड़ी? जब एक लोकसभा सीट विरासत और जिम्मेदारी बन जाए तो फिर उसे कोई नेता कैसे छोड़ सकता है? अगर नेता के अपने वश में चीजें नहीं हों तब अलग बात है लेकिन जब नेता को खुद अपनी सीट के बारे में फैसला करना हो तो वह उस सीट को कैसे छोड़ सकता है, जिसके बारे में कहा जाए कि वह विरासत है, जिम्मेदारी है? तभी राहुल गांधी का अमेठी छोड़ना विरासत और जिम्मेदारी दोनों से भागना है।

ध्यान रहे उनकी दादी और उनकी मां ने कभी रायबरेली नहीं छोड़ा। इंदिरा गांधी 1977 में रायबरेली सीट से चुनाव हार गई थीं और चिकमंगलूर से उपचुनाव जीत कर सांसद बनी थीं। लेकिन 1980 में जब मध्यावधि चुनाव हुए तो आंध्र प्रदेश की मेडक सीट के साथ साथ वे रायबरेली सीट से भी लड़ी थीं। जीतने के बाद उन्होंने रायबरेली सीट खाली की, जहां से परिवार के सदस्य अरुण नेहरू चुनाव लड़ कर जीते। इसी तरह संजय गांधी 1977 में अमेठी सीट से चुनाव हार गए थे। लेकिन 1980 में वे फिर उसी सीट से लड़े और जीते। 1981 में उनके निधन से अमेठी सीट खाली हुई तो वहां से राजीव गांधी चुनाव लड़े और जीते। ऑफिस ऑफ प्रोफिट के मामले में 2006 में सोनिया गांधी ने रायबरेली सीट से इस्तीफा दिया तो फिर वहीं से चुनाव लड़ कर जीतीं। यहां उलटी गंगा बह रही है। तीन बार जीतने के बाद राहुल गांधी 2019 में अमेठी से हार गए तो वे अब वहां से चुनाव नहीं लड़ेंगे!

अगर अमेठी से नहीं लड़ेंगे तो फिर रायबरेली क्यों लड़ेंगे? कहा जा रहा है कि गांधी परिवार उत्तर प्रदेश को नहीं छोड़ सकता है। यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में अपने पैरों पर खड़ा करना है और अमेठी व रायबरेली ही गेटवे हैं इसलिए राहुल गांधी चुनाव लड़ रहे हैं। अगर सचमुच ऐसा है तो राहुल अमेठी से ही क्यों नहीं लड़े? क्या हार जाने का डर सता रहा था? हारने के डर से अगर कोई विरासत और जिम्मेदारी वाली सीट छोड़ दे तो फिर वह कैसा नेता होगा? कहने वाले कह रहे हैं कि कांग्रेस के विभीषणों से मिल कर भाजपा ने चक्रव्यूह रचा था, जिसे राहुल ने पहचान लिया और इसलिए अमेठी नहीं गए।

कमाल है! खुद नहीं गए और ‘मास्टरस्ट्रोक’ के तौर पर किशोरी लाल शर्मा को खड़ा कर दिया! अगर महाभारत के अभिमन्यू ने भी चक्रव्यूह में घुसने की हिम्मत नहीं की होती तो क्या महाभारत की कहानी वैसी ही होती, जैसी है? यह भी सवाल है कि इस बात की क्या गारंटी है कि ऐसा कोई चक्रव्यूह रायबरेली में नहीं रचा गया है? ऐसे ही अगर यूपी में पार्टी की मजबूती के लिए लड़ना ही था तो फैसला पहले ही क्यों नहीं किया गया? इतने लंबे समय तक फैसला लटका कर रखने का क्या मतलब निकला? ध्यान रहे राजनीति में मतदाता बहुत जटिल नैरेटिव को नहीं समझते हैं। मोटे तौर पर उनकी समझ में यह बात आ रही है कि राहुल पिछली बार अमेठी हारे थे और उसके बाद पांच साल में वे सिर्फ दो बार अमेठी आए और इस बार नहीं जीत पाएंगे इसलिए उन्होंने सीट छोड़ दी। इतने ही सरल तरीके से उनको यह बात समझ में आ रही है कि रायबरेली से सोनिया गांधी एक लाख 70 हजार वोट से जीती थीं तो राहुल को लग रहा है कि उस सीट से वे भी आसानी से जीत जाएंगे।

राहुल गांधी रायबरेली लड़ेंगे और परिवार के सहयोगी रहे किशोरी लाल शर्मा अमेठी लड़ेंगे, इस फैसले से ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है कि इस पर बहुत विचार विमर्श किया गया है या इसके पीछे कोई दूरगामी रणनीति है या यह किसी तरीके का मास्टरस्ट्रोक है। यह बहुत खराब फैसला है, जिसके पीछे कोई राजनीतिक तर्क नहीं है। जयराम रमेश ने कहा कि, ‘इस फैसले से भाजपा, उनके समर्थक और चापलूस धराशायी हो गए। उनको समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें’। सवाल है कि इसमें किसी के धराशायी होने वाली क्या बात है? जैसा पहले कहा जा रहा था कि प्रियंका गांधी वाड्रा रायबरेली और राहुल अमेठी लड़ेंगे, वैसा होता तो भाजपा को दोनों सीटों पर बड़ी ताकत लगानी होती। अब किशोरी लाल शर्मा को उतार कर अमेठी में कांग्रेस ने स्मृति ईरानी को वॉकओवर दे दिया है और लड़ाई सिर्फ रायबरेली की रह गई।

स्मृति ईरानी को सिर्फ इसलिए वॉकओवर नहीं मिल गया है कि किशोरी लाल शर्मा परिवार के पीए थे या कमजोर उम्मीदवार हैं, बल्कि इस वजह से मिली है कि राहुल उनसे फिर लड़ने की हिम्मत नहीं कर पाए। ध्यान रहे स्मृति ईरानी ने 2014 में राहुल से हारने के बाद भी हिम्मत की और 2019 में उनसे लड़ कर उनको हराया। सो, जब राहुल लड़ने की हिम्मत नहीं कर पाए तो किशोरी लाल क्या करेंगे? जहां तक रायबरेली की बात है तो सोनिया गांधी ने 2014 में भाजपा के अशोक अग्रवाल को तीन लाख 53 हजार वोट से हराया था, लेकिन 2019 में जब दिनेश प्रताप सिंह लड़े तो सोनिया की जीत का अंतर आधा हो गया। वे एक लाख 70 हजार के करीब वोट से जीतीं। इस बार भी दिनेश प्रताप ही भाजपा की टिकट से लड़ रहे हैं और लड़ाई आसान नहीं होने वाली है। हो सकता है कि राहुल गांधी जीत जाएं लेकिन इससे कोई राजनीतिक मकसद पूरा नहीं होना है।

इस बार के चुनाव को जब खुद राहुल गांधी असामान्य चुनाव मान रहे हैं और कह रहे हैं कि यह लोकतंत्र और संविधान बचाने का चुनाव है तो ऐसे चुनाव में इस तरह के फैसलों की जगह नहीं होती है। यह चुनाव सारी ताकत और सारे संसाधन झोंकने का है। राहुल गांधी आमने सामने की लड़ाई में अमेठी रिक्लेम करते तो न सिर्फ उनका कद बढ़ता, बल्कि कांग्रेस के पैर भी मजबूती से जमते। अगर वे अमेठी और प्रियंका गांधी वाड्रा रायबरेली लड़तीं तो इसका असर आसपास की अनेक सीटों पर पड़ता और देश के सबसे बड़े प्रदेश का राजनीतिक नैरेटिव प्रभावित होता।

यह सिर्फ कहने की बात नहीं होनी चाहिए कि चुनाव संविधान और लोकतंत्र बचाने का है, आचरण में भी इसे लेकर प्रतिबद्धता दिखनी चाहिए। इन दोनों सीटों को लेकर कांग्रेस ने जो सस्पेंस बनाया था, जो हाइप क्रिएट की थी, उसका एंटी क्लाइमेक्स कर दिया। खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली कहावत चरितार्थ हो गई। अब ‘डरो मत, भागो मत’ का नारा राहुल गांधी पर ही चिपक गया। भले यह कहा जाए कि राहुल जीत कर सीट खाली कर देंगे और तब प्रियंका लड़ेंगी लेकिन अभी यह मैसेज गया है कि कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में राहुल की टीम ने प्रियंका को किनारे लगा दिया।

 

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