चुनावी राजनीति का विमर्श बदल रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी भले राजनीतिक दल नहीं बनी है और बने तो हो सकता है कि कामयाब नहीं हो पाए। लेकिन उसने देश के राजनीतिक विमर्श को बदल दिया है। जंतर मंतर पर सीजेपी के आंदोलन ने एक नए विमर्श को जन्म दिया है, जिसमें एजुकेशन, एम्प्लायमेंट और एनर्जी यानी ‘ट्रिपल ई’ केंद्र में हैं। इससे पहले राजनीति का विमर्श जाति, धर्म और क्षेत्रवाद के इर्द गिर्द घूमता था। उसमें भ्रष्टाचार और विकास का मुद्दा भी जरुरत के हिसाब से शामिल होता था। लेकिन मुख्य रूप से सामाजिक समीकरण, धार्मिक ध्रुवीकरण और क्षेत्रीय भावनाओं या उप राष्ट्रीयता की भावना के इर्द गिर्द चुनाव का ताना बाना बुना जाता था। इसी आधार पर मुद्दे तय किए जाते थे, उम्मीदवारों का चयन होता था और नेताओं के भाषण होते थे। अब इसमें बदलाव आ रहा है। विमर्श के नए मुद्दे आ रहे हैं और नेताओं के भाषण बदल रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपवाद हैं, जिनका भाषण अब भी बाबर, औरंगजेब, सालार गाजी या व्यापक रूप से मुस्लिम विरोध के इर्द गिर्द होता है।
बहरहाल, देश के बदलते राजनीतिक विमर्श को दो हिस्सों में बांट कर देखने की जरुरत है। पहला हिस्सा तो वह है, जो जंतर मंतर पर आंदोलन के दौरान युवाओं के आक्रोश में अभिव्यक्त हुआ। युवा जिस अंदाज में अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे थे और बिना किसी शर्मिंदगी के प्रधानमंत्री तक को निशाना बना रहे थे वह एक पहलू है। उससे नेताओं और पार्टियों को लगा और यह सही भी है कि एक नई पीढ़ी अपनी खास पहचान के साथ राजनीतिक क्षितिज पर उभरी है। उसने जाति, धर्म, क्षेत्र और यहां तक कि लिंग की पहचान छोड़ दी है। उसे ‘जेन जी’ की पहचान दी गई और उसे एड्रेस करने की कोशिश शुरू हुई। मुश्किल यह है कि ज्यादातर नेता उनके आचार, व्यवहार, भाषा और सरोकार को नहीं समझते हैं। इसलिए उन्होंने ‘जेन जी’ को समझने का अपना एक स्टीरियोटाइप विकसित किया और उन्हें उसी से देखना शुरू किया।
अगर नेता अपने परिवार में देखते और अपने बच्चों के व्यवहार से ‘जेन जी’ को समझने का प्रयास करते तो उनको पता चलता कि वे ‘जेन जी’ को लुभाने के लिए वे जो कर रहे हैं वह कितना पैथेटिक और ऑफ द मार्क है। ‘जेन जी’ को लुभाने के लिए नेता जो प्रयास कर रहे हैं उससे वे एक पूरी पीढ़ी को शर्मिंदा कर रहे हैं और खुद एक मूर्ख के रूप में उनके सामने प्रस्तुत हो रहे हैं। इसलिए उनको यह प्रयास बंद करना चाहिए और इस पीढ़ी की ओर से उठाए जा रहे मुद्दे या उनके सरोकारों को समझना चाहिए।
यही बदलते राजनीतिक विमर्श का दूसरा पहलू है। वह मुद्दों औऱ सरोकारों से जुड़ा है। वह सरोकार ‘ट्रिपल ई’ का है। तभी एजुकेशन, एम्प्लायमेंट और एनर्जी पर युवाओं व देश के लोगों के सरोकारों को समझने की जरुरत है। दिल्ली से लेकर झारखंड और उत्तर प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र व बिहार तक ये ही मुद्दे अभी विमर्श का मुख्य विषय हैं। इसमें ‘जेन जी’ और ‘जेन अल्फा’ दोनों शामिल हैं। उनको अच्छी शिक्षा चाहिए, जिसके लिए वे दबाव डाल रहे हैं। इससे पहले बच्चों ने यानी छात्रों ने यह मुद्दा हाथ में नहीं लिया था। शिक्षा को वे अभिभावकों और शिक्षकों पर छोड़े हुए थे। स्कूल में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, शिक्षक की कमी है, समय पर शिक्षक नहीं आते हैं, स्कूलों व कॉलेजों में पढ़ाई का कैलेंडर फॉलो नहीं किया जाता है, समय पर परीक्षा नहीं होती है, परीक्षा होती है तो उसमें गड़बड़ी हो जाती है, इन तमाम मुद्दों पर छात्र आंदोलित नहीं होते थे। ले
किन अब तस्वीर बदल गई है। अब स्कूली बच्चे भी ये मुद्दे उठा रहे हैं। अच्छी बात यह है कि वे अपने अभिभावकों के सामने नहीं, बल्कि सड़क पर उतर कर ये मुद्दे उठा रहे हैं। मजबूरी में नेताओं और राजनीतिक दलों को इस मुद्दे पर बात करनी पड़ रही है। अभी तो सिर्फ बात हो रही है और आश्वासन दिए जा रहे हैं। लेकिन आने वाले दिनों में आश्वासनों को पूरा भी करना होगा।
दूसरा सरोकार एम्प्लायमेंट यानी नौकरी और रोजगार का है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि बेहतर जीवन स्तर के लिए या कमजोर आर्थिक तबके के लोगों के सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था में ऊपर आने के लिए सम्मानजक नौकरी से बेहतर कोई और तरीका नहीं है। परंतु पिछले कुछ समय से अलग अलग कारणों से नौकरी और रोजगार दोनों में लगातार कमी होती जा रही है। इसका नतीजा नीति आयोग की रिपोर्ट में दिखाई दिया, जिसमें कहा गया है कि 15 से 29 साल की उम्र के 8.7 करोड़ युवा ऐसे हैं, जो न तो पढ़ाई कर रहे हैं, न किसी कौशल का प्रशिक्षण ले रहे हैं और न कोई नौकरी कर रहे हैं। यानी कुछ भी नहीं कर रहे हैं। इन 8.7 करोड़ युवाओं के अलावा इसी उम्र वर्ग के इससे कम से कम दोगुने युवा पढ़ाई कर रहे हैं और नौकरी व रोजगार हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं। वे भी अब तक नौकरी आने का इंतजार करते थे और पेपर लीक या परीक्षा में गड़बड़ी या परीक्षा में धांधली या परीक्षा रद्द होने को नियति मान कर चुप बैठे रहते थे।
लेकिन अब उनकी चुप्पी टूटी है। जंतर मंतर के प्रदर्शन ने उनको रास्ता दिखाया है। वे नौकरी के हर विज्ञापन को बारीकी से देख रहे हैं। उसकी कमियां सामने ला रहे हैं। सरकारों पर दबाव बना रहे हैं कि वह नौकरी या दाखिले के लिए होने वाली प्रतियोगिता परीक्षाओं का कैलेंडर जारी करें और उसका पूरी तरह से पालन करें। वैकेंसी बढ़ाने से लेकर परीक्षा कराने के तरीके पर छात्र सरकारों से बात कर रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक पिछले एक दशक में केंद्र सरकार में खाली पदों की संख्या सवा चार लाख से दोगुनी होकर साढ़े आठ लाख हो गई है। ऐसी ही स्थिति राज्य सरकारों की भी है। युवा अब इसको मुद्दा बना रहे हैं।
तीसरा सरोकार एनर्जी का है। शिक्षा और नौकरी तो आपस में जुड़े हुए हैं लेकिन एनर्जी उससे बिल्कुल अलग है। लेकिन यह भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा इसलिए बना है क्योंकि हाल की कई घटनाओं ने ऊर्जा सुरक्षा के मामले में भारत की कमजोरियों को जाहिर किया है। ईरान और अमेरिका की जंग ने आपूर्ति के संकट को उजागर किया तो इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से गाड़ियों को होने वाले नुकसान की जानकारी भी लोगों को मिली और इथेनॉल मिश्रण से खाद्यान्न संकट का जो दौर आएगा, उसकी भी एक झलक लोगों को मिली।
अगर शिक्षा व नौकरी ने युवाओं को आंदोलित किया तो ऊर्जा की बढ़ती कीमत, आपूर्ति के संकट, गाड़ियों के इंजन की परेशानी, खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमत और संभावित खाद्यान्न संकट ने युवाओं के साथ साथ देश की बाकी आबादी को भी सोचने पर मजबूर किया। इसका असर यह हुआ है कि सरकारें भी स्वच्छ ऊर्जा को लेकर गंभीर हुई हैं तो इथेनॉल मिश्रण को कम करने पर भी विचार हो रहा है। अगर ये सरोकार लंबे समय तक राजनीतिक विमर्श में टिकते हैं और चुनाव के नतीजों को प्रभावित करते हैं तो देश में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
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