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अमेरिका का मिड टर्म फॉर्मूला बेहतर विकल्प है

सरकार पूरी तरह से मन बनाए हुए है कि देश के सारे चुनाव एक साथ कराने हैं। इसके लिए पेश किए गए विधेयक पर पीपी चौधरी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति विचार कर रही है। सरकार परिसीमन के मसले पर भी मन बनाए हुए है कि लोकसभा और विधानसभाओं की सीटें बढ़ानी है। इसके साथ ही महिला आरक्षण का मामला भी जुड़ा हुआ है। अगर ऐसा होता है तो आजादी के बाद का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक और राजनीतिक बदलाव होगा। अगर सरकार अपने उद्देश्य में सफल होती है तो 1971 के बाद पहली बार सीटों की संख्या बढ़ेगी, पहली बार महिलाओं को आरक्षण मिलेगा और एक बार फिर देश के चुनाव एक साथ होने लगेंगे, जैसे आजादी के बाद होते थे। ये सारे बदलाव 2029 में हो जाएंगे या 2034 तक मामला जाएगा, यह देखने की बात होगी।

पिछले कुछ दिनों से ‘एक देश, एक चुनाव’ पर बनी पीपी चौधरी की कमेटी की ओर से मीडिया को कुछ खबरों की जानकारी दी गई है। ऐसी खबर आई है कि पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने की योजना 2034 में लागू होगी। लेकिन उससे पहले 2029 में लोकसभा के साथ कम से कम आधे राज्यों का चुनाव करा लिया जाएगा। यानी पहला चरण 2029 में पूरा करना है और दूसरे चरण के लिए 2031 का साल तय किया गया है। कहा जा रहा है कि बाकी आधे देश में 2031 में चुनाव कराया जाएगा और फिर 2034 में दोनों को मिला दिया जाएगा। पिछले दिनों पीपी चौधरी और उनकी कमेटी ने दिल्ली सरकार से मुलाकात की तो मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि वे ‘एक देश, एक चुनाव’ के लिए विधानसभा का कार्यकाल छोटा करने को तैयार हैं। भाजपा के सारे मुख्यमंत्री तैयार हो जाएंगे। लेकिन मामला सिर्फ भाजपा शासित राज्यों या भाजपा का नहीं है।

बहरहाल, ‘एक देश, एक चुनाव’ के लिए जिस फॉर्मूले की बात हो रही है उसके मुताबिक 2028 में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाला है। उन चुनावों को रोक दिया जाएगा और कानून बना कर विधानसभा का कार्यकाल थोड़े समय के लिए बढ़ाया जाएगा। गौरतलब है कि 2028 में कर्नाटक का चुनाव है। साल के अंत में तेलंगाना, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान का भी चुनाव है। इन चुनावों को टाल दिया जाएगा। ये चुनाव 2029 में लोकसभा के साथ कराए जाएंगे। लोकसभा के साथ ओडिशा, आंध्र प्रदेश, सिक्किम आदि राज्यों के चुनाव होते हैं और 2029 के अंत में महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के चुनाव होते हैं। इन चुनावों को थोड़ा पहले लोकसभा के साथ करा लिया जाएगा। इस तरह 2028 और 2029 के सारे चुनाव एक साथ हो जाएंगे। इस फॉर्मूले के मुताबिक मई 2029 में लोकसभा और 16 राज्यों के चुनाव होंगे। इसके बाद 2030 से 2032 के बीच होने वाले चुनावों को 2031 में कराया जाएगा। इसके लिए 2020 के चुनाव टाले जाएंगे और 2032 के चुनाव पहले कराए जाएंगे। इन चुनावों के बाद बनने वाली विधानसभा का कार्यकाल कम रहेगा और 2034 में पूरे देश के चुनाव एक साथ हो जाएंगे।

इसके पीछे भाजपा की जो राजनीतिक योजना है उसको छोड़ कर तर्कसंगत तरीके से सोचें तो ‘एक देश, एक चुनाव’ की कोई जरुरत नहीं है। अभी जो सिस्टम है वह परफेक्ट काम कर रहा है। पैसे की बचत और आचार संहिता के कारण विकास कार्य ठप्प होने वाला दोनों तर्क बहुत बचकाना और बेसिरपैर का है। इस पर पहले भी बहुत लिखा जा चुका है। अगर पूरे देश में एक साथ चुनाव होंगे तो एक बार आचार संहिता लगेगी और अगर मौजूदा सिस्टम चलता रहा है तब भी देश में एक बार और राज्यों में एक एक बार अतिरिक्त आचार संहिता लगेगी। यानी मौजूदा सिस्टम चलता रहा तो पांच साल में एक की जगह दो बार आचार संहिता लग जाएगी, जिससे सरकार के कामकाज पर रत्ती भऱ भी फर्क नहीं पड़ेगा। फिर भी अगर सरकार मौजूदा सिस्टम को बदलना चाहती है तो वह दो चरण वाला सिस्टम लागू कर सकती है। दुनिया के सबसे मजबूत लोकतंत्र वाला देश अमेरिका है, जहां दो बार चुनाव होते हैं। लोगों को राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बीच एक बार अपनी भावना व्यक्त करने का मौका दिया जाता है।

अभी इस साल नवंबर में अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव का दो साल पूरा हो रहा है तो मिड टर्म इलेक्शन होंगे। अमेरिका में कांग्रेस के निचले सदन यानी प्रतिनिधि सभा के कुल 435 सदस्य होते हैं, जिनका कार्यकाल दो साल का होता है। उनका चुनाव हर बार राष्ट्रपति चुनाव के साथ होता है और फिर राष्ट्रपति के कार्यकाल के मध्य में होता है। ऊपरी सदन यानी सीनेट के एक सौ सदस्य होते हैं, जिनका कार्यकाल छह साल का होता है। इनमें से 33 सदस्य हर दो साल पर चुने जाते हैं। यानी राष्ट्रपति के चुनाव के साथ और फिर मिड टर्म में एक तिहाई सदस्य चुने जाते हैं। ऐसे ही अमेरिका के 50 राज्यों के गवर्नरों का कार्यकाल राष्ट्रपति की तरह चार साल का होता है। इनमें से 34 का चुनाव हमेशा राष्ट्रपति के मिड टर्म में होता है।

दो राज्य, न्यू हैम्पशायर और वर्मोंट ऐसे हैं, जिनके गवर्नर का कार्यकाल दो साल का होता है, इसलिए इनका चुनाव राष्ट्रपति के साथ भी होता है और मिड टर्म में भी होता है। इस तरह 36 राज्यों के गवर्नर का चुनाव राष्ट्रपति के मिड टर्म में होता है। बाकी 14 में से नौ राज्यों के गवर्नर का चुनाव राष्ट्रपति चुनाव के साथ होता है। न्यू जर्सी और वर्जीनिया में गवर्नर का चुनाव राष्ट्रपति चुनाव के ठीक एक साल बाद होता है, जबकि केंटकी, लुइसियाना और मिसिसिपी के गवर्नर का चुनाव राष्ट्रपति चुनाव से ठीक एक साल पहले होता है। इसे ‘ऑफ ईयर इलेक्शन’ कहा जाता है। इस तरह राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल में चारों साल कहीं न कहीं चुनाव होता है।

यह भी ध्यान रखने की बात है कि अमेरिका में चुनाव भारत की तरह नहीं होते हैं, जहां पार्टी आलाकमान ने जिसे चाहा उसे उम्मीदवार बना दिया और वह चुनाव लड़ने चला गया। वहां पूरे साल पार्टियों के उम्मीदवार तय करने के लिए प्राइमरी चलती है। नवंबर के मिड टर्म चुनाव के लिए पिछले कई महीने से प्राइमरी चल रही है। भारत के विद्वान इसे देख कर कहेंगे कि अरे, अमेरिका में तो हर समय चुनाव ही चलता रहता है या पार्टियों के नेता आपस में ही उम्मीदवारी के लिए लड़ते रहते हैं। लेकिन अमेरिका के लोग इसे लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी मानते हैं।

सो, भारत के सामने यह मॉडल भी है, जिसे आजमाया जा सकता है। पूरे देश के सारे चुनाव एक साथ कराने की बजाय भारत को अमेरिका के मिड टर्म चुनाव का मॉडल अपनाना चाहिए। पांच साल पर लोकसभा के साथ आधे राज्यों के चुनाव हो जाएं और बचे हुए राज्यों के चुनाव लोकसभा के कार्यकाल का आधा समय बीतने के बाद कराया जाएं। इससे लोगों को सरकार के कामकाज के प्रति अपनी राय व्यक्त करने का मौका मिलेगा। अगर वे सरकार की नीतियों से नाराज हैं तो उसका भी इजहार कर सकेंगे। इससे केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री के साथ साथ मुख्यमंत्रियों और राज्यों के सरकारों पर भी जनहित के फैसले करने का दबाव रहेगा।

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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