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पहचान या विचार पर आधारित दल नहीं टूटते

यह बड़ा वाजिब सवाल है कि कुछ पार्टियां सत्ता से बाहर होते ही क्यों टूट जाती हैं, जबकि कुछ पार्टियां लंबे समय तक सत्ता के बगैर रहने के बावजूद नहीं टूटती हैं और अगर टूटती भी हैं तो उससे अलग होने वाला समूह कामयाब नहीं हो पाता है? चार साल के अंदर उद्धव ठाकरे की शिव सेना के दो बार टूटने और सत्ता से बाहर होते ही ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के टूट जाने के बाद यह सवाल उठ रहा है।

इसका जवाब बहुत मुश्किल नहीं है। लेकिन जवाब या निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले पार्टियों को अलग अलग खांचे में फिट करना होगा। उसके बाद अपने आप जवाब मिल जाएगा कि किस तरह की पार्टियों के टूटने की ज्यादा संभावना रहती है, किस तरह की पार्टी के टूटने पर अलग हुए समूह के सफल होने की संभावना ज्यादा रहती है और किसके विफल होने की संभावना ज्यादा रहती है। नहीं टूटने वाली पार्टी कोई भी नहीं है। सारी पार्टियां टूटती हैं, जिनमें से कुछ फिर जुड़ जा ती हैं।

सबसे पहले उन पार्टियों पर विचार करें, जो टूट जाती हैं। आमतौर पर ऐसी पार्टियां, जिनके पास कोई विचारधारा नहीं होती है या कोई जातीय पहचान नहीं होती है या संगठन का कोई लौह ढांचा नहीं होता है, उनके टूटने की संभावना सबसे ज्यादा रहती है। ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की पार्टी शिव सेना को इस श्रेणी में रखा जा सकता है। हालांकि शिव सेना का मामला तृणमूल से थोड़ा अलग है। शिव सेना की मराठी मानुष की पहचान थी और हिंदुत्व की विचारधारा भी थी। फिर भी वह टूटी क्योंकि अंदर के विरोध के साथ साथ बाहर से बहुत बड़ी ताकत काम कर रही थी।

दुत्व की राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी को अपने जैसी राजनीति करने वाली किसी पार्टी का अस्तित्व स्वीकार्य नहीं था। शिव सेना के पतन के बाद हिंदुत्व की राजनीति करने वाली एकमात्र पार्टी भाजपा है। विचारधारा और पहचान दोनों के बावजूद शिव सेना इस वजह से भी टूटी क्योंकि उसका संगठन पूरी तरह से लाभ के सिद्धांत पर आधारित था। उसके कार्यकर्ता पार्टी के विचार से नहीं जुड़े थे, बल्कि वे पार्टी के लाभार्थी थे।

बिल्कुल यही लाभार्थी वाली थ्योरी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पर भी लागू होती है। उनकी पार्टी से जो भी कार्यकर्ता या नेता जुड़ा था वह किसी राजनीतिक या वैचारिक आधार पर नहीं जुड़ा था। वह लाभार्थी था, जो सत्ता के चुंबक की वजह से तृणमूल कांग्रेस की ओर आकर्षित हुआ था। तृणमूल कांग्रेस की दूसरी कमी यह थी कि उसकी कोई जातीय पहचान नहीं थी। बांग्ला अस्मिता चुनावी राजनीति में एक अस्पष्ट सी अवधारणा है, जिसका कोई एक दावेदार नहीं हो सकता है। ममता बनर्जी खुद ब्राह्मण जाति से आती हैं, जिसकी आबादी बंगाल में बहुत कम है। दूसरी ओर भाजपा ने एक व्यापक सोशल इंजीनियरिंग की है। ममता के पास उसके काफी छोटा जातीय आधार है। तीसरी बात यह है कि लेफ्ट या भाजपा की तरह तृणमूल कांग्रेस के पास कोई विचारधारा नहीं है। लेफ्ट को हराने के लिए लोग तृणमूल कांग्रेस के साथ जुड़े और सत्ता का लाभ लेने के लिए 15 साल जुड़े रहे। वे किसी बड़े लक्ष्य के लिए ममता बनर्जी के साथ नहीं जुड़े थे। तभी जैसे ही सत्ता गई वैसे ही तमाम लोग उनको छोड़ गए।

इसके इतर अगर नहीं टूटने वाली पार्टियों को देखें तो साफ दिखेगा कि वो पार्टियां स्पष्ट जातीय पहचान पर आधारित हैं और अस्पष्ट रूप से ही सही लेकिन कोई विचारधारा उनके साथ जुड़ी है। जैसे बिहार की 243 सदस्यों की विधानसभा में सिर्फ 22 सीट पर सिमट जाने के बावजूद 2010 में लालू प्रसाद की राजद नहीं टूटी थी। अब भी उनकी पार्टी के 25 विधायक हैं लेकिन पार्टी वैसे नहीं बिखरेगी, जैसे ममता बनर्जी की पार्टी बिखरी है। इसी तरह 403 की विधानसभा और 80 की लोकसभा में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी एक समय 47 विधानसभा और पांच लोकसभा सीट पर सिमट गई थी। तब भी पार्टी नहीं टूटी।

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि राजद और सपा के पास एक स्पष्ट जातीय पहचान है और समाजवाद की विचारधारा है। आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी का नारा देकर इन पार्टियों ने सदियों से शोषित और वंचित रहे समूहों को राजनीति की मुख्यधारा में जगह देने की राजनीति की है। वैसे समाजवादी पार्टियों का इतिहास टूटने, बिखरने का रहा है। लेकिन यह तब की बात है, जब उनका गठन जाति के आधार पर नहीं होता था और नेता जातीय पहचान लिए हुए नहीं होते थे या समाज में जाति की पहचान राजनीतिक रूप से इतनी अहम नहीं हुई थी। नीतीश कुमार और एचडी देवगौड़ा की पार्टी के पास भी स्पष्ट जातीय पहचान और विचारधारा का एडवांटेज है इसलिए इनके साथ हमेशा इनका वोट आधार जुड़ा रहेगा।

भारतीय जनता पार्टी की स्पष्ट जातीय पहचान पहले बहुत कमजोर थी। इसे वैश्य और ब्राह्मण की पार्टी माना जाता था। हालांकि तब उसके पास विचारधारा का बहुत बड़ा आधार था और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के रूप में संगठन का एक ऐसा लौह ढांचा था, जिससे बाहर निकल कर किसी के लिए कामयाब होने नामुमकिन था। तभी कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा, मध्य प्रदेश में उमा भारती, उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और झारखंड में बाबूलाल मरांडी पार्टी से अलग होकर कामयाब नहीं हो सके। सब अपनी जातीय पहचान के दम पर भाजपा से अलग हुए थे और राजनीति करने का प्रयास किया था। लेकिन उनको पता नहीं था कि भाजपा के अंदर उनकी राजनीति जातीय पहचान के साथ विचारधारा और संघ के संगठन से कामयाब हुई थी। बाद में ये सभी नेता भाजपा में वापस लौटे और सहज रूप से स्वीकार किए गए।

कांग्रेस का मामला इन सभी पार्टियों से अलग है। समाजवादी पार्टियों से भी ज्यादा कांग्रेस टूटी है। आजादी के तुरंत बाद कांग्रेस का टूटना शुरू हो गया था, जब कांग्रेस के अंदर के समाजवादी नेताओं का समूह जयप्रकाश नारायण और अन्य के नेतृत्व में अलग हुआ था। लगभग उसी समय चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने स्वतंत्र पार्टी बनाई। उसके बाद 1967 में कांग्रेस ओ और कांग्रेस आर के रूप में विभाजन हुआ। यह क्रम लगातार जारी रहा। शरद पवार, ममता बनर्जी, जगन मोहन रेड्डी, पेमा खांडू, पीए संगमा आदि नेता कांग्रेस से निकले, अपनी अलग पार्टी बनाई और कामयाब हुए।

कई नेताओं ने अलग होकर पार्टी नहीं बनाई जैसे हिमंत बिस्वा सरमा, ज्योतिरादित्य सिंधिया आदि। ये लोग दूसरी पार्टी में जाकर कामयाब हो गए। इतनी टूट, अलग हुए इतने नेताओं की कामयाबी और बाहर से लगने वाले भारी बल के बाद भी कांग्रेस खत्म नहीं हुई, सिर्फ कमजोर हुई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कांग्रेस के पास सब कुछ था। उसके पास आजादी की लड़ाई की विरासत थी, नेहरू के बनाए आइडिया ऑफ इंडिया की विचारधारा थी, एक बेहद मजबूत राष्ट्रव्यापी संगठन था, पहचान के नाम पर दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण का समर्थन था और साथ जोड़े रहने के लिए सत्ता का चुंबक भी था यानी जो लोग जुड़े थे वे लाभार्थी भी थे।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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