ब्रिक्स सम्मेलन का समापन हुआ तो जितनी चर्चा साझा घोषणापत्र, विश्व नेताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दोपक्षीय वार्ताओं और दुनिया भर के नेताओं के भाषण की हुई उतनी ही चर्चा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के एक सोशल मीडिया पोस्ट की हुई, जिसमें उन्होंने दिल्ली की मशहूर डिश ‘छोले-भटूरे’ की फोटो डाली थी और लिखा था कि देश की 80 फीसदी आबादी मांसाहारी है। हालांकि साथ ही उन्होंने यह भी लिखा था कि नॉन वेज खाना उतना ही स्वादिष्ट होता है, जितना उनकी बहन के हाथ के बने ‘छोले भटूरे’।
जाहिर है राहुल गांधी का मकसद किसी की भावना को आहत करना नहीं है। वे चाहते तो किसी नॉन वेज डिश की तस्वीर डाल सकते थे। वे चाहते तो नॉन वेज और वेज खाने को एक समान स्वादिष्ट नहीं भी बताते। उन्होंने अपनी पोस्ट में ब्रिक्स का जिक्र भी नहीं किया। लेकिन सबको पता है कि उनका निशाना कहां था तो उसी लिहाज से उनकी पोस्ट की मीडिया और सोशल मीडिया में चर्चा हुई। सरकार की ओर से केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने एक पोस्ट लिखी, जिसमें उन्होंने शाकाहारी भोजन और भारत की परंपराओं का जिक्र किया और इस पर हैरानी जताई कि कांग्रेस पार्टी भोज के मेन्यू पर चर्चा कर रही है।
बहरहाल, सबको पता है कि ब्रिक्स सम्मेलन के पहले दिन यानी शनिवार, 12 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से विश्व नेताओं के लिए रात्रिभोज का आयोजन किया गया था, जिसका मेन्यू वेजिटेरियन था। राहुल गांधी ने उसी की तरफ इशारा करके बताया कि 80 फीसदी आबादी नॉन वेजिटेरियन है। हालांकि यह प्रामाणिक आंकड़ा नहीं है लेकिन भारत के लोगों के खान पान को लेकर हुए आखिरी सर्वे की एक रिपोर्ट उपलब्ध है, जिसके मुताबिक देश के करीब 84 फीसदी पुरुष और 73 फीसदी महिलाएं अक्सर या कभी कभी नॉन वेजिटेरियन खाना खाते हैं। राहुल गांधी के बताने की जरुरत नहीं है कि देश के लगभग सभी हिस्सों में जिस तरह पारंपरिक शाकाहारी भोजन हैं वैसे ही पारंपरिक मांसाहारी भोजन भी हैं। सबसे कम मांसाहार जिन राज्यों में होता है, जैसे राजस्थान, हरियाणा या हिमाचल प्रदेश वहां के भी पारंपरिक नॉन वेजिटेरियन डिश हैं, जो बहुत लोकप्रिय हैं।
सो, अगर सरकार चाहती तो ब्रिक्स नेताओं के सम्मान में दिए गए रात्रिभोज में वेजिटेरियन और नॉन वेजिटेरियन दोनों तरह के पारंपरिक भारतीय भोजन परोस सकती थी। लेकिन सरकार ने सिर्फ वेजिटेरियन खाना चुना। यह पहली बार नहीं है, जब वैश्विक आयोजनों में विश्व नेताओं के सामने या दोपक्षीय वार्ताओं के समय किसी नेता के सम्मान में आय़ोजित भोज में इस तरह का भोजन परोसा गया हो। क्या भारत सरकार और विदेश मंत्रालय के अधिकारी आदि नहीं जानते हैं कि भोजन अपने मन लायक नहीं, बल्कि मेहमान के मन लायक बनाया जाता है?
भारत के विदेश सेवा के अधिकारी दुनिया भर में जाते हैं क्या वहां उनको इसी तरह का मेन्यू मिलता है? क्या वे मेहमानों के हिसाब से मेन्यू तय नहीं करा सकते हैं? दुनिया के देश जानते होंगे कि नरेंद्र मोदी शाकाहारी हैं। इसलिए उनके सम्मान में आयोजित होने वाले भोज में वे शाकाहारी खाना रखते होंगे। क्या इसी परंपरा का पालन भारत को नहीं करना चाहिए कि अगर मेहमान नॉन वेजिटेरियन खाने वाला है तो उसके लिए उसी तरह के व्यंजन मेन्यू में शामिल किए जाएं?
ब्रिक्स सम्मेलन के औपचारिक रात्रिभोज के मेन्यू में दो समस्याएं हैं। पहली तो यह कि रात्रिभोज में सिर्फ शाकाहारी व्यंजन शामिल किए गए और दूसरा यह कि बहुत छोटा मेन्यू था। सोचें, ब्रिक्स के रात्रिभोज के मेन्यू में सिर्फ दो स्टार्टर थे। एक गुजरात की खांडवी और एक मशरूम गलावटी। अगर किसी को मशरूम पसंद नहीं हो या मशरूम से एलर्जी हो तो उसके पास सिर्फ एक विकल्प था। ऐसा क्यों? भारत के हजारों पारंपरिक व्यंजन हैं, जो स्टार्टर के तौर पर खाए जाते हैं। उनमें से दो, चार और रखे जा सकते थे।
इसी तरह मेन कोर्स में छह और मीठे में दो डिश थी। इस मेन्यू को बड़ा करना चाहिए। उसमें भी भारत की विविधता दिखनी चाहिए। गौरतलब है कि कुछ समय पहले भारतीय मीडिया में ऐसी खबरें आई थीं कि भारत आने वाले विदेशी मेहमान सरकारी भोज के खाने से संतुष्ट नहीं होते हैं और होटल लौट कर खाना खाते हैं। यह सही है कि नेताओं के सम्मान में आयोजित होने वाला डिनर या कोई भी भोज औपचारिक होता है लेकिन उसमें अगर मेहमानों के मन लायक भोजन हो तो वे भरपेट खा भी सकते हैं। क्या पता मनपसंद भोजन भरपेट खाने के बाद वे बेहतर समझौता करें? कहते भी हैं कि दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है।
इस तरह के मेन्यू से भारत सरकार का एजेंडा तो समझ में आता है कि उसे राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों के हिसाब से देश में प्रोजेक्ट हिंदुत्व को आगे बढ़ाना है, जिसमें धर्म की वैष्णव परंपराओं को अपनाने के लिए देश के लोगों को बाध्य करना अनिवार्य है। लेकिन विदेश सेवा के अधिकारियों को तो समझना चाहिए कि कूटनीति में खान पान का कितना महत्व होता है। किसी भी देश की सॉफ्ट पावर को खान खान, पहनावे, फिल्म, संगीत आदि के जरिए बढ़ाया जाता है। अमेरिका जिस समय दुनिया की महाशक्ति बना उस समय उसकी आर्थिक व सैन्य ताकत के साथ साथ उसके खान पान यानी बर्गर, फ्राइज, कोक, पेप्सी आदि का प्रसार हुआ तो पहनावे और फिल्म व संगीत का भी प्रसार हुआ।
भारत की फिल्में और संगीत किस तरह से भारत की सॉफ्ट पावर को स्थापित कर रही हैं यह ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान डिनर में ही दिखा, जहां मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने किशोर कुमार का गाना गुनगुनाया। दशकों से रूस में राजकपूर के गाने गाए जाते हैं तो समूचे पूर्वी व दक्षिण पूर्वी एशिया में साउथ की फिल्मों के सुपर स्टार रजनीकांत से लेकर विजय तक की फिल्मों का जलवा है।
इसी तरह खान पान के मामले में भी भारत का खाना पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो रहा है। लंदन और ब्रिटेन के दूसरे शहरों में जिस पैमाने पर चिकन टिक्का मसाला बिकता है उसे देख कर लोग चिकन टिक्का मसाला को ब्रिटेन का राष्ट्रीय डिश कहने लगे हैं।
भारत का मखाना पूरी दुनिया में जा रहा है तो बीफ के निर्यात में भी भारत दुनिया के टॉप तीन देशों में शामिल है। हालांकि यह बताने का मकसद यह नहीं है कि विदेश मेहमान को चिकन टिक्का मसाला या बीफ का बना कोई व्यंजन परोसा जाए। लेकिन अगर उनको भारत के पारंपरिक व्यंजन ही खिलाने हैं तो ढेर सारे नॉन वेज व्यंजन भी हैं, जिनको मेन्यू में शामिल किया जा सकता है। इससे भारत की विविधता जाहिर होगी।
लेकिन ऐसा लग रहा है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपने शीर्ष नेताओं की भोजन की पसंद और संघ की हिंदू धर्म की संकीर्ण व्याख्या से प्रभावित होकर विदेशी मेहमानों के लिए मेन्यू तैयार करती है। इस प्रवृत्ति को देश की राजनीति में भी देख जा सकता है। पिछले दिनों पश्चिम बंगाल में इस बात को लेकर विवाद हुआ कि दुर्गापूजा के दौरान मांसाहार का सेवन नहीं होना चाहिए। सरकार और भाजपा संरक्षित एक कथावाचक ने जाकर यह बात कह दी थी। बाद में विवाद को खत्म करने के लिए भाजपा के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को मंदिर में बैठ कर मछली खानी पड़ी।
इसी तरह उत्तर प्रदेश की सरकार ने ‘वन डिस्ट्रिक्ट, वन कुजीन’ तय किया है। हर जिले की एक खास डिश चुनी गई है। आश्चर्य की बात है कि इसमें एक भी नॉन वेज डिश नहीं है। उत्तर प्रदेश के काकोरी के नाम पर बना काकोरी कबाब पूरी दुनिया में बिकता है और लखनऊ के टुंडे कबाब को भी देश भऱ में लोग जानते हैं लेकिन सरकार की सूची में इनमें से किसी के लिए जगह नहीं है। जाहिर है यह सिर्फ एक वैश्विक इवेंट के मेन्यू का मामला नहीं है, बल्कि भाजपा की वैचारिकी का मामला है। वह देश के लोगों की खान पान की पसंद को नियंत्रित करना चाहती है और साथ ही हिंदू धर्म की अन्य परंपराओं को एक परंपरा में समाहित करना चाहती है।
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