पिछले कुछ वर्षों से एक परिघटना के तौर पर ‘अर्बन नक्सल’ की चर्चा हो रही है। बड़े शहरों खास कर महानगरों में रहने वाले कुछ बुद्धिजीवियों को गिरफ्तार भी किया गया। उनके ऊपर नक्सलियों को समर्थन देने के आरोप लगे। भीमा कोरेगांव में हिंसा भड़काने के प्रयास के आरोपों में जांच हुई और कई बौद्धिकों के कंप्यूटर से कथित तौर पर हिंसा को समर्थन देने वाले दस्तावेज व चिट्ठियां बरामद हुईं। इस सिलसिले में गिरफ्तार किए गए फादर स्टेन स्वामी का न्यायिक हिरासत में निधन हो गया। उनके हाथ कांपते थे और उनको पानी पीने के लिए स्ट्रॉ चाहिए था तो उसकी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक गई थी। सरकार उनके प्रति इतनी सख्त थी कि जेल प्रशासन स्ट्रॉ तक नहीं दे रहा था। गौतम नवलखा से लेकर आनंद तेलतुम्बडे और प्रोफेसर जी साईबाबा तक अनेक लोग गिरफ्तार हुए और लंबे समय तक जेल में रहे।
अब प्रधानमंत्री ने ‘दिमागी नक्सल’ का एक नया जुमला ईजाद किया है। उन्होंने लाल किले की प्राचीर से अपने 13वें भाषण में यह जुमला बोला। उन्होंने दावा किया कि जंगल के नक्सलियों, जिनके लिए उन्होंने ‘हथियारी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया, का सफाया हो चुका है। इसके बाद उन्होंने ‘दिमागी नक्सल’ की पहचान करने और उन्हें समाप्त करने का आह्वान किया। यह ‘अर्बन नक्सल’ से आगे की परिघटना है। ऐसा लग रहा है कि ‘अर्बन नक्सल’ का विमर्श वांछित परिणाम नहीं दे सका है। शहरी और ग्रामीण विभाजन में यह मामला कहीं खो गया। मध्य वर्ग के कुछ लोगों को एक अवधारणा के तौर पर यह अच्छा लगा लेकिन जिन लोगों पर कार्रवाई हुई उनमें से ज्यादातर को सामान्य लोग नहीं जानते थे या उनसे कनेक्ट नहीं कर सके। इसलिए उनके लिए ऐसे लोगों को खतरे के तौर पर देखना थोड़ा मुश्किल था। तभी ऐसा लग रहा है कि उससे आगे की परिघटना के तौर पर ‘दिमागी नक्सल’ का विचार प्रस्तुत किया गया है।
प्रधानमंत्री ने इसे अलग से परिभाषित नहीं किया लेकिन जिस तरह उन्होंने ‘हथियारी नक्सल’ के बरक्स ‘दिमागी नक्सल’ को रखा उससे परिभाषा बहुत स्पष्ट है। इसका पहला उद्देश्य तो यह दिख रहा है कि ‘अर्बन नक्सल’ से जो बात ज्यादा लोगों तक नहीं पहुंची उसे ‘दिमागी नक्सल’ के नाम पर पहुंचाया जाए। दूसरा मकसद यह दिख रहा है कि इसे एक खास भौगोलिक क्षेत्र की बजाय अखिल भारतीय परिघटना बनाया जाए। तीसरा उद्देश्य जंगल की लड़ाई को घर घर में और गली गली में पहुंचाना है। ध्यान रहे लोग नक्सल का एक ही मतलब समझते हैं। जिनको इसका इतिहास, भूगोल भी नहीं पता है वे भी मानते हैं कि नक्सली वो लोग होते हैं, जो सरकार से लड़ते हैं और सुरक्षाकर्मियों पर हमला करते हैं।
यह बहुत सरलीकृत धारणा है लेकिन आम भारतीय के मन में नक्सली की यही छवि है। यह बात खासतौर से उन इलाकों के लिए कही जा सकती है, जहां नक्सलवाद का असर नहीं रहा है। बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश जैसे राज्य, जहां माओवाद या नक्सलवाद का असर रहा उन राज्यों के बाहर इसके बारे में कोई स्पष्ट धारणा लोगों के मन में नहीं है। असर वाले राज्यों में भी शहरी इलाकों में लोग इससे अप्रभावित रहे हैं। तो दूसरी ओर ग्रामीण इलाकों में इनके प्रति सहानुभूति रखने और इन्हें समर्थन देने वाला भी एक बड़ा तबका हमेशा मौजूद रहा है।
बहरहाल, जो बिल्कुल ही अप्रभावित रहे या नक्सलवाद की परिघटना के भौगोलिक दायरे से बाहर रहे उनके मन में नक्सलियों को लेकर जो धारणा है वह सरकार विरोधी और सुरक्षा बलों पर हमला करने वालों के रूप में है। वे ‘दिमागी नक्सल’ को भी इसी रूप में देखेंगे। उनके लिए ‘दिमागी नक्सल’ वह है, जो सरकार का विरोध कर रहा है। भले विरोध लोकतांत्रिक हो। विरोध के तरीकों के आधार पर फर्क नहीं किया जाएगा। सशस्त्र विरोध और लोकतांत्रिक विरोध एक माने जाएंगे। तभी यह संभव है कि एक बरसात में धंस जाने वाले एक्सप्रेसवे का मुद्दा उठाने वाला ‘दिमागी नक्सल’ मान लिया जाए। पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने का विरोध वाले से लेकर छात्र आंदोलन का समर्थन करने वालों को भी ‘दिमागी नक्सल’ ठहराया जा सकता है। सरकार की आर्थिक व विदेश नीति पर सवाल उठाने वाला या सुरक्षा बलों की कार्रवाई का विरोध करने वाला तो निश्चित रूप से ‘दिमागी नक्सल’ माना जाएगा।
भारत या किसी भी देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सशस्त्र संघर्ष का समर्थन करने वालों का बचाव नहीं किया जा सकता है। लेकिन क्या अगर कोई व्यक्ति मौजूदा व्यवस्था का विरोध करता है, नागरिक सुविधाओं की अनुपस्थिति की ओर ध्यान दिलाता है, सरकार से लेकर देश की अन्य संस्थाओं की साख पर सवाल उठाता है औऱ उन्हें विश्वसनीय नहीं मानता है, उन्हें बदलने की बात करता है तो उसे ‘दिमागी नक्सल’ कहा जा सकता है? ध्यान रहे ऐसे ही लोगों को ‘अर्बन नक्सल’ कहा गया था। देश के बौद्धिकों को ‘अर्बन नक्सल’ कहा गया। किसान आंदोलन करने वालों को खालिस्तानी और उस आंदोलन का समर्थन करने वालों को ‘अर्बन नक्सल’ कहा गया।
कोरोना के समय सरकार की हैंडलिंग पर सवाल उठाने वालों को ‘अर्बन नक्सल’ कहा गया। गरीब, आदिवासी और कश्मीरियों की लड़ाई लड़ने वाले ज्यादा निशाने पर रहे। मेधा पाटकर से लेकर अरुंधति रॉय तक सब ‘अर्बन नक्सल’ हैं। सामाजिक संगठनों पर पिछले कुछ वर्षों में जो कार्रवाई हुई है और विदेशी चंदे के लिए बने कानून, एफसीआरए के नियम सख्त करके गैर सरकारी संगठनों की फंडिंग रोकने का जो अभियान चला है उसके पीछे एक मुख्य कारण कथित ‘अर्बन नक्सल’ को कमजोर करना है। देश की कई प्रतिष्ठित रिसर्च संस्थाओं को ‘अर्बन नक्सल’ से जोड़ा गया। अब इसे अमूर्त अवधारणा से निकाल कर व्यापक रूप से जनता के बीच ले जाने के लिए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का प्रयोग हुआ है। कह सकते हैं कि एक चरण पूरा हो गया है और इस बार लाल किले से अगले चरण की घोषणा हुई है।
असल में पिछले 12 साल से सरकार और भाजपा का विरोध करने वाले लोगों के लिए अलग अलग विशेषण गढ़े जा रहे हैं और उन्हें एक खांचे में फिट करने का प्रयास किया जा रहा है। कभी उनको ‘खान मार्केट गैंग’ कहा जाता है, ‘कभी टुकड़े टुकड़े गैंग’ कहा जाता है, कभी ‘अर्बन नक्सल’ कहा जाता है तो अब ‘दिमागी नक्सल’ कहा जाएगा। यहां एक पैटर्न साफ साफ दिखता है। देश के सम्भ्रांत वर्ग के साथ साथ ऐसे बौद्धिकों को निशाना बनाना है, जो सरकार की क्रोनी कैपिटलिज्म की नीति पर सवाल उठाते हैं और उसकी विभाजनकारी नीतियों का विरोध करते हैं। ये दोनों सरकार की दुखती रग हैं। इनका विरोध करने वाले के लिए प्रयोग होने वाले विशेषण में नक्सली शब्द जोड़ दिया जाए तो यकीन दिलाना आसान हो जाएगा।
ध्यान रहे ‘हथियारी नक्सल’ खत्म होने के बाद जल, जंगल, जमीन बड़े उद्योगपतियों को सौंपना आसान हो जाएगा और ‘दिमागी नक्सल’ के कमजोर होने या समाप्त होने से सत्ता हर तरह के खतरे से सुरक्षित होगी। अब दिलचस्पी यह देखने में होगी कि पहचान का अभियान कैसे चलता है और खत्म करने की लड़ाई कैसे होती है? विचार के स्तर पर लड़ना मुश्किल होगा। तभी सवाल है कि क्या जो लरीका ‘हथियारी नक्सल’ से लड़ने में इस्तेमाल हुआ वही ‘दिमागी नक्सल’ के खिलाफ भी आजमाया जाएगा?
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