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लोकभवन बना देने से क्या बदला?

प्रदेशों की राजधानियों में अंग्रेजों के जमाने में बने और कई कई एकड़ में फैले विशाल भवनों को, जहां राज्यपाल रहते हैं, राजभवन कहा जाए या लोकभवन क्या फर्क पड़ता है? लोकभवन नाम रख देने से न तो उसमें रहने वालों की उपयोगिता बढ़ जाएगी और न उनका एटीट्यूड बदल जाएगा। वे अंग्रेज के जमाने में भी लाट साहेब थे और अब भी लाट साहेब ही रहेंगे। सजावटी और बिना मतलब का पद होने के बावजूद उनको वह प्रोटोकॉल मिलेगा, जो राज्य के चुने हुए मुख्यमंत्री को मिलता है। वे कई एकड़ में फैले भवनों में रहेंगे, सैकड़ों कर्मचारी उनकी सेवा करेंगे, उनको भारी भरकम सुरक्षा मिलेगी और वे बड़ी गाड़ियों में ढेर सारी गाड़ियों के काफिले के साथ सड़क पर निकलेंगे। इतना ही नहीं केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं के अलावा उनके लौह द्वार पर न तो कोई और दस्तक दे सकता है और न उनके दस्तक से आम लोगों के लिए लौह द्वार खुलता है।

पहले अपवाद के तौर पर होता था लेकिन अब यह नियम हो गया है कि लोकभवन में रहने वाला केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी की आंख से चीजों को देखेगा और उसकी कान से ही चीजों को सुनेगा। साथ ही यह भी अब मेनस्ट्रीम हो गया है कि वह संविधान से ज्यादा राजनीति को महत्व देगा। अगर राज्य में भाजपा विरोधी पार्टी की सरकार है तो लोकभवन में रहने वाले माननीय उसका जीना दूभर किए रहेंगे। उस राज्य में होने वाली हर छोटी बड़ी घटना कानून व्यवस्था के लिए खतरा दिखाई पड़ेगी और उसमें दखल देकर उसका मुद्दा बनाया जाएगा। उन राज्यों की विधानसभाओं से पास किए गए विधेयक अनावश्यक तरीके से रोके जाएंगे। पहले जो एक झीना सा परदा होता था अब उसे भी उतार दिया गया है। ऐसा लग रहा है कि राजभवन को लोकभवन बनाने का यह अनिवार्य नतीजा है कि उसमें रहने वाले लोग लोकनेता की तरह व्यवहार करेंगे और केंद्र में सत्तारूढ़ दल की आलोचना नहीं बरदाश्त करेंगे। इसलिए वे राज्य सरकारों की ओर से तैयार किए गए अभिभाषण नहीं पढ़ेंगे। इससे पहले कभी भी राज्यपालों की ऐसी राजनीति देखने को नहीं मिली थी।

एक के बाद एक तीन राज्यों में यह राजनीति देखने को मिली है। तमिलनाडु का नाम बदलने तक का प्रयास कर चुके राज्यपाल आरएन रवि वहां की विधानसभा की कार्यवाही का नियम बदलना चाहते हैं। तमिलनाडु विधानसभा के सत्र की कार्यवाही तमिल के प्रदेश गान से शुरू होती है और समापन राष्ट्रगान से होता है। पिछले चार साल से साल के पहले सत्र में राज्यपाल अभिभाषण नहीं पढ़ रहे हैं क्योंकि वे चाहते हैं कि कार्यवाही की शुरुआत राष्ट्रगान से हो। इस साल भी इसी नाम पर वे अभिभाषण पढ़े बगैर वापस चले गए। लेकिन अभिभाषण नहीं पढ़ने का एक कारण यह भी है कि तमिलनाडु सरकार के तैयार किए गए अभिभाषण में केंद्र सरकार के खिलाफ बहुत सारी बातें थीं। सो, केंद्र सरकार के खिलाफ कोई बात है तो वह कैसे राज्यपाल पढ़ सकते हैं!

केरल में राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने यही काम किया है। उन्होंने अभिभाषण पढ़ा लेकिन पैराग्राफ नंबर 12 का शुरुआती हिस्सा छोड़ दिया, जिसमें केंद्र सरकार के ऊपर संघवाद के सिद्धांत का उल्लंघन करने और राज्य को आर्थिक व अन्य रूप से परेशान करने की बात थी। उन्होंने पैराग्राफ 15 का अंतिम हिस्सा भी नहीं पढ़ा क्योंकि उसमें राज्य विधानसभा से पास विधेयक बेवजह रोके जाने का जिक्र था।

ध्यान रहे पिछले और मौजूदा राज्यपाल दोनों ने कई विधेयक महीनों तक रोके रखा। तीसरे राज्यपाल थावरचंद गहलोत हैं। उन्होंने कर्नाटक विधानमंडल के इस साल के पहले सत्र की साझा कार्यवाही में अभिभाषण पढ़ने से इनकार कर दिया। राज्य के कानून व संसदीय कार्यमंत्री का कहना है कि 11 पैराग्राफ्स को लेकर राज्यपाल को आपत्ति थी। उन्होंने इन्हें हटाने के लिए कह दिया। सोचें, इससे पहले कब अभिभाषण को लेकर इस तरह की आपत्ति राज्यपाल जताते थे? यह न्यू इंडिया की पिछले 12 साल की परिघटना है कि राज्यपाल राज्य सरकार की ओर से तैयार अभिभाषण में नुक्स निकालेंगे, उसे पढ़ने से मना कर कर देंगे या मनमाने तरीके से कुछ हिस्सा पढ़ेंगे और कुछ छोड़ देंगे।

अब तक यह परंपरा रही है कि राज्यपाल राज्य सरकार की ओर से तैयार किए गए अभिभाषण को शब्दशः पढ़ेंगे। लेकिन इन दिनों राज्यपालों को भाजपा विरोधी पार्टियों की सरकारों की ओर से तैयार किए गए अभिभाषण पढ़ने में बहुत कष्ट हो रहा है क्योंकि उसमें खुद राज्यपालों की भूमिका की आलोचना होती है और केंद्र सरकार के कामकाज पर सवाल उठाए जाते हैं। तमिलनाडु के राज्यपाल कार्यालय ने उनके अभिभाषण नहीं पढ़ने का एक कारण यह भी बताया है कि उसमें ‘आधे अधूरे दावे और गुमराह करने वाली बातें’ थीं। ध्यान रहे अभिभाषण चाहे राष्ट्रपति का हो या राज्यपालों का उसमें सरकारें अपनी उपलब्धियां ही बताती हैं वो सही हैं या गलत यह जांच करना राष्ट्रपति या राज्यपाल का काम नहीं होता है। पहले कोई भी इनकी जांच नहीं करता था। लंबे समय तक देश में कांग्रेस की सरकार रही लेकिन यह अपवाद के लिए ही कहीं देखने को मिला होगा कि राज्यों में कांग्रेस विरोधी सरकारों की ओर से तैयार अभिभाषण पढ़ने से किसी राज्यपाल ने इनकार किया हो या उसमें सुधार किया हो।

लेकिन अब यह इतनी सामान्य परिघटना हो गई है कि भाजपा विरोधी शासन वाले राज्यों का हर राज्यपाल अभिभाषण में सुधार करवा रहा है या पढ़ने से इनकार कर रहा है या अधूरा पढ़ रहा है। विधानसभा से पास विधेयकों को लंबे समय तक रोके रखना भी एक सामान्य परिघटना हो गई है और कानून व्यवस्था के नाम पर सरकार के कामकाज में अड़ंगेबाजी या उसकी आलोचना भी एकदम सामान्य बात हो गई है। इससे एक गलत परंपरा की शुरुआत हो रही है। आगे जब केंद्र की सरकार बदली तब भी यह परंपरा जारी रहेगी और उससे राज्यों में स्थायी टकराव करी संभावना बनी रहेगी। इसलिए इसे रोका जावा चाहिए। ध्यान रहे देश में लंबे समय से इस बात की चर्चा होती रही है कि राज्यपाल का पद जरूरी है या नहीं। इसे चेक एंड बैलेंस के लिए बनाया गया था लेकिन राज्यपाल चेक एंड बैलेंस का काम सिर्फ उन्हीं प्रदेशों में करते हें, जहां केंद्र सरकार की विरोधी पार्टी की सरकार होती है।

अजादी के बाद 78 साल का अनुभव यह बताता है कि राज्यपाल का पद होने से राज्य के कामकाज पर कोई गुणात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है। यह सिर्फ टकराव बढ़ाने के काम आता है। वैसे भी भारत में शासन की जो प्रणाली अपनाई गई है उसमें चुने हुए मुख्यमंत्री के ऊपर दबाव बनाने .या उसे काम करने से रोकने की कोई व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। इसलिए इस बात पर सहमति रही है कि राज्यपालों को अधिकार नहीं मिलना चाहिए और उन्हें राजकाज में दखल से रोकना चाहिए। फिर भी अगर अभी राज्यपाल का पद नहीं समाप्त किया जाता है तो कम से कम अभिभाषण की प्रथा खत्म कर देनी चाहिए। यह एक तमाशा है, जिसकी कोई आवश्यकता नहीं। देश के एक विद्वान राष्ट्रपति आर वेंकटरमन ने इसके लिए बहुत प्रयास किया था। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्रियों राजीव गांधी और चंद्रशेखर दोनों को कई बार कहा कि संविधान के अनुच्छेद 87 और 176 में संशोधन करके राष्ट्रपति और राज्यपालों के अभिभाषण की व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाए। आर वेंकटरमन के प्रयासों के 35 साल बाद अब यह अनिवार्य हो गया है कि ये दोनों अनुच्छेद बदले जाएं और अभिभाषण की व्यवस्था समाप्त हो।

By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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