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मोदी की छवि तोड़ने की क्या जरुरत है?

नेता हो या अभिनेता, यहां तक कि खिलाड़ी, कारोबारी, पत्रकार सबकी एक विशिष्ठ छवि होती है। उस छवि को तोड़ना आमतौर पर मुश्किल होता है। वीरेंद्र सहवाग की अपनी शैली थी और राहुल गांधी की अपनी। दोनों की शैलियों की अदला बदली नहीं हो सकती। ऐसे ही ज्यादातर अभिनेता अपनी छवि में रूढ़ हो जाते हैं। बहुत कम ऐसे अभिनेता हुए, जिन्होंने अपनी छवि तोड़ी। कहते हैं कि दिलीप कुमार ट्रेजेडी फिल्में करते करते अवसाद में चले गए थे। तभी उनको डॉक्टरों ने हल्की फुल्की फिल्में करने को कहा था और उन्होंने ‘राम और श्याम’ में हास्य भूमिका की। वे इतने बड़े अभिनेता थे कि दोनों तरह की फिल्मों में कमाल किया।

ऐसा बहुत कम होता है। ठीक ऐसे ही नेता की एक छवि होती है, जो बड़ी होशियारी से गढ़ी जाती है। अपने निजी जीवन में नेता चाहे जैसा हो उसकी सार्वजनिक छवि उसकी राजनीतिक व चुनावी आवश्यकता के हिसाब से बनाई गई होती है। लालू प्रसाद ने हंसोड़, मजाकिया और अगंभीर नेता की छवि गढ़ी थी और उसी अंदाज में वे गंभीर बात भी कहते थे। जॉर्ज फर्नांडीज ने बिना इस्त्री किए कपड़े पहनने और घर के दरवाजे खुले रखने वाले नेता की छवि बनाई थी।

ठीक ऐसे ही नरेंद्र मोदी की बहुत सावधानी से एक छवि गढ़ी गई है। एक गरीब परिवार का बेटा, जिसकी मां दूसरों के घरों में बर्तन मांजती थी और पिता वडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेचते थे, जहां खुद मोदी ने भी चाय बेची। यह भी बताया गया कि कैसे उनके परिवार के बाकी सदस्य आज भी गरीब या निम्न मध्य वर्ग वाले हैं। ध्यान रहे लालू प्रसाद भी ऐसी ही पृष्ठभूमि से आए थे। उनके बड़े भाई एक सरकारी कॉलेज में चपरासी थे, जिनके एक कमरे के घर में कई लोग रहते थे। लेकिन उसकी बजाय लालू प्रसाद ने अलग छवि गढ़ी, जो सींग पकड़ कर भैंस पर चढ़ने वाली थी।

बहरहाल, मोदी के छवि निर्माण अभियान में उनकी बेहद साधारण पृष्ठभूमि और उनकी सादगी को सबसे मुख्य स्थान दिया गया। यह प्रचारित किया गया कि वे अपना सब काम अपने वेतन से करते हैं। उनको किसी चीज का लोभ नहीं है। उनका परिवार नहीं है इसलिए वे भ्रष्टाचार नहीं करते हैं। कुछ नई, कुछ पुरानी कहानियों और कुछ सच्ची व कुछ गढ़ी गई घटनाओं के जरिए उनकी छवि आम जनता के बीच स्थापित की गई। अमेरिका में फेसबुक के मुख्यालय में मोदी ने मार्क जकरबर्ग के सामने अपनी इस पहचान को बहुत भावुक अंदाज में प्रस्तुत किया था।

राजनीतिक और चुनावी रूप से यह बहुत कामयाब रहा। इसका कारण यह भी था कि इस छवि के सहारे वे नेहरू-गांधी परिवार के सामने एक कंट्रास्ट पैदा कर सके। एक तरफ भारत का सबसे पहला एरिस्टोक्रेटिक परिवार था तो दूसरी ओर नरेंद्र मोदी थे, जो अपनी आर्थिक व सामाजिक पृष्ठभूमि के जरिए देश की लगभग तीन चौथाई आबादी का प्रतिनिधित्व करते थे। एक तरफ चार पीढ़ी से देश पर शासन कर रहा आभिजात्य परिवार तो दूसरी ओर सतह से उठता हुआ पहली पीढ़ी का नेता! मोदी ने भारत के चुनावी मुकाबले को दीये और तूफान की लड़ाई में बदल दिया और उसका नतीजा सबके सामने है।

तभी सवाल है कि नरेंद्र मोदी अपनी इस छवि को क्यों तोड़ना चाहते हैं? क्या उनको यकीन हो गया है कि अब वे सार्वजनिक जीवन में भी चाहे जैसा आचरण करें, जैसी छवि बनाएं लोगों के दिमाग में वही पुरानी छवि रहेगी? नेताओं को कई बार ऐसा आभास होता है कि उसके बारे में एक बार लोगों के मन में जो धारणा बन गई और जो छवि स्थापित हो गई वह स्थायी रूप से बनी रहेगी, चाहे उसका आचरण उस छवि के बिल्कुल विपरीत क्यों न हो। लेकिन इस भ्रम से कई बार बड़ा नुकसान होता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गरीब का बेटा होने की छवि को पहला झटका तब लगा था, जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे में उन्होंने किसी कारोबारी का दिया हुआ कई लाख रुपए का सूट पहना था, जिस पर बारीक अक्षरों में उनका नाम लिखा हुआ था। लेकिन वो एकदम शुरुआती दिन थे इसलिए कोई राजनीतिक नुकसान नहीं हुआ।

ऐसा लग रहा है कि उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी और उनकी ब्रांडिंग की टीम का हौसला बढ़ा और उनको लगा कि अब कुछ भी हो जाए छवि नहीं टूटने वाली है। तभी चार हजार करोड़ रुपए का जहाज खरीदा गया और 15 एकड़ में प्रधानमंत्री इन्क्लेव बनना शुरू हुआ। पेन, चश्मे, गाड़ियों, पहनावे आदि की चर्चा को अपमानजनक या विरोध की बजाय तारीफ के तौर पर लिया जाने लगा।

जन्मदिन पर भव्य कार्यक्रम आय़ोजित करना और लोगों से घरों के सामने दीये जलवाना इसी का विस्तार है। भाजपा की राज्य सरकारों ने लोगों के बीच दीये बांटे। बड़े बड़े मंत्रियों ने अपनी हथेलियों पर दीया रख कर जलाया और उसके वीडियो बनवाए। यह कुल आयोजन बहुत खराब ऑप्टिक्स वाला था। एक लोकतांत्रिक देश में, गरीबी से उठ कर आए नेता का इस तरह अपना जन्मदिन मनमाना अभूतपूर्व भले न हो लेकिन खराब और जुगुप्साजनक दृश्य बनाने वाला जरूर था।

अब भारतीय जनता पार्टी के नेता यह कह कर इसका बचाव कर रहे हैं कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी अपनी सरकार की मंत्री राजकुमारी अमृत कौर को चिट्ठी लिख कर अपने जन्मदिन को बाल दिवस के तौर पर मनाने को कहा था। सवाल है कि क्या इसी का विरोध करके मोदी और भाजपा ने राजनीति नहीं की है? इसी का तो कंट्रास्ट बना कर मोदी सत्ता में आए फिर वैसा ही आचरण खुद कैसे कर सकते हैं? भाजपा आईटी सेल के लोग मुलायम सिंह यादव के जन्मदिन पर सैफई में होने वाले कार्यक्रमों की पुरानी तस्वीरें निकाल कर साझा कर रहे हैं। तो क्या मोदी को मुलायम सिंह जैसा बनना है? मुलायम सिंह के गांव सैफई में होने वाले भव्य कार्यक्रमों की भाजपा हमेशा आलोचना करती रही लेकिन अपने काम को जस्टिफाई करने के लिए उसी से तुलना की जा रही है!

क्या प्रधानमंत्री मोदी को लगता है कि वे हमेशा के लिए इस विरोधाभास को साध चुके हैं? वे महंगे जहाज से उड़ेंगे, महंगी गाड़ी से चलेंगे, महंगे कपड़े, चश्मे, जूते आदि पहनेंगे, विशाल घर में रहेंगे और मध्यकाल के राजाओं की तरह प्रजा से दीये जलवा कर अपना जन्मदिन मनवाएंगे और साथ ही साथ गरीब का बेटा और गरीबों का हमदर्द होने की छवि भी बनवाए रहेंगे! यह बहुत दिलचस्प परिघटना है। एक तरफ मोदी अपनी स्थापित छवि को तोड़ कर उससे बाहर निकल रहे हैं तो दूसरी ओर राहुल गांधी भी अपनी और अपने परिवार की स्थापित छवि को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। वे अपने को युवराज की बजाय सामान्य युवा के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं। फिल्मों की तरह राजनीति भी यकीन दिलाने की कला है। मोदी ने बरसों से अपनी जिस छवि का यकीन दिलाया था उसे तोड़ा जा रहा है यह हैरान करने वाली बात है!

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By अजीत द्विवेदी

संवाददाता/स्तंभकार/ वरिष्ठ संपादक जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से पत्रकारिता शुरू करके अजीत द्विवेदी भास्कर, हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ में सहायक संपादक और टीवी चैनल को लॉंच करने वाली टीम में अंहम दायित्व संभाले। संपादक हरिशंकर व्यास के संसर्ग में पत्रकारिता में उनके हर प्रयोग में शामिल और साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और फिर लगातार ‘नया इंडिया’ नियमित राजनैतिक कॉलम और रिपोर्टिंग-लेखन व संपादन की बहुआयामी भूमिका।

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