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महिला आरक्षण का भी भरोसा

एसआईआर और परिसीमन के बाद भाजपा के चुनाव जीतने के भरोसे का एक आधार महिला आरक्षण की तैयारियां हैं। हालांकि नरेंद्र मोदी सरकार ने महिला आरक्षण का दांव 2034 के चुनाव के लिए रखा था। तभी 2023 में महिला आऱक्षण के लिए नारी शक्ति वंदन कानून को पास करते समय उसमें जनगणना और परिसीमन की शर्त जोड़ दी गई। लेकिन 2024 के चुनाव नतीजों के बाद अब सरकार को बेचैनी है कि परिसीमन और महिला आरक्षण दोनों 2024 के चुनाव में ही लागू किया जाएगा। अगर परिसीमन का फैसला होता है और सीटों की संख्या बढ़ा कर साढ़े आठ सौ की जाती है तो उसमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। 33 फीसदी आरक्षण के अलावा भी अनारक्षित सीटों पर महिलाओं को टिकट मिलेगी। सो, महिला सदस्यों की संख्या 40 फीसदी तक जा सकती है।

पिछले एक दशक से ज्यादा समय के अपने शासन में नरेंद्र मोदी ने महिलाओं को एक अलग और स्वतंत्र वोट समूह के रूप में तैयार करने और उन्हें अपने साथ जोड़ने के लिए कई काम किए हैं। यह भी ध्यान रखने की बात है कि पिछले दो दशक में महिलाओं की स्वतंत्र कांस्टीट्यूएंसी विकसित हुई है। अलग अलग राज्यों के नेताओं ने भी इसके लिए काम किया। बिहार में नीतीश कुमार, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल आदि की मिसाल दी जा सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी ने महिलाओं को अपने साथ जोडऩे के लिए काम किए। शौचालय की योजना से लेकर लखपति दीदी तक कई योजनाएं चलाई गईं।

लोकसभा और राज्यों के चुनाव के बाद पोस्ट इलेक्शन डेटा एनालिसिस में सीएसडीएस और अन्य एजेंसियों ने महिला वोट का जो आकलन किया है उसका निष्कर्ष यह है कि महिलाएं मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को अपेक्षाकृत थोड़ा ज्यादा वोट करती हैं। महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत भी हर चुनाव के साथ बढ़ रहा है। यह भी माना जा रहा है कि महिलाएं जाति के बंधन से निकल कर वोट कर रही हैं। तीन तलाक को अवैध करने के फैसले के बाद यह भी दावा किया जाता है कि मुस्लिम महिलाओं के भी कुछ वोट भाजपा को मिलते हैं।

अब भारतीय जनता पार्टी को ऐसा लग रहा है कि अगर इस समय लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू कर दिया जाए तो कम से कम एक चुनाव में तो महिलाओं का वोट थोक में हासिल किया जा सकता है। हालांकि यह भाजपा और नरेंद्र मोदी सरकार की सदिच्छा है, जो हो सकता है कि पूरी नहीं भी हो। कई बार इस तरह के दांव उलटा पड़ जाते हैं। कांग्रेस जब केंद्र में थी तब उसने 2014 के चुनाव से ठीक पहले आंध्र प्रदेश का विभाजन यह सोच कर किया था कि इससे 10 साल की एंटी इन्कम्बैंसी खत्म होगी और अगर आंध्र में नहीं तो नए राज्य तेलंगाना में तो कांग्रेस जरूर जीत जाएगी। लेकिन अगले दो चुनाव तक वह तेलंगाना तो नहीं ही जीती, आंध्र प्रदेश से साफ अलग हो गई। तीन चुनाव से आंध्र में कांग्रेस का खाता नहीं खुल रहा है।

बहरहाल, भाजपा और नरेंद्र मोदी एसआईआर के बाद परिसीमन और महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी में हैं। इससे भरोसा बना है कि 2029 हर हाल में जीतेंगे। विपक्ष महिला आरक्षण के समर्थन में है। लेकिन उसकी कई पार्टियां आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग कर रही हैं। उनका कहना है कि अगर महिला आरक्षण के भीतर एससी, एसटी और ओबीसी को आरक्षण नहीं मिला तो संभव है कि लोकसभा और विधानसभाओं में इन जातीय समूहों का प्रतिनिधित्व कम हो। अगर यह मुद्दा बनता है तो भाजपा को लेने के देने पड़ सकते हैं। वैसे भाजपा अब कांग्रेस व अन्य प्रादेशिक पार्टियों से ज्यादा जातीय मामलों की चैंपियन बन गई है। हिदुत्व से ज्यादा भाजपा नेता अब जाति की बात कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी को ओबीसी और एससी, एसटी का नया मसीहा बनाया जा रहा है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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