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एसआईआर के बाद परिसीमन सबसे बड़ा उपाय

भाजपा को इतना भरोसा कैसे है कि 2029 में भी राहुल गांधी और उनका गठबंधन चुनाव हारेगा और भाजपा पहले से ज्यादा बहुमत से जीतेगी? इस भरोसे का एक कारण तो भाजपा का अपना संगठन, पार्टी का आधार, समर्पित हिंदू मतदाताओं का वोट, आरएसएस का नेटवर्क, ध्रुवीकरण की राजनीति जैसी पारंपरिक चीजें दिखाई देंगी। लेकिन इन पारंपरिक चीजों से हट कर तीन चीजें ऐसी हैं, जिसने भाजपा को ज्यादा भरोसा दिया है। पहली चीज है मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर। एसआईआऱ के जरिए करोड़ों मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं और नए नाम जोड़े जा रहे हैं।

पूरी प्रक्रिया इतनी गोपनीय और नियंत्रित है कि सारी विपक्षी पार्टियां परेशान हैं। सोचें, अभी इस बात का विवाद चल रहा था कि करोड़ों नाम हटाए जा रहे हैं लेकिन खबर है कि अखिलेश यादव मतदाता सूची में फर्जी नाम जोड़े जाने के खिलाफ सड़क पर उतरने वाले हैं। सब कुछ इतने नियंत्रित और केंद्रीकृत तरीके से हो रहा है कि किसी को असली बात का पता नहीं चल रहा है।

एसआईआर से भाजपा को सबसे बड़ा फायदा इस वजह से हुआ है कि देश के ज्यादातर राज्यों में उसकी या उसकी सहयोगी पार्टियों की सरकार है। सरकार में होना अपने आप में बहुत सारी चीजों को आसान बना देता है। उसमें अगर सरकार में बैठे लोगों को सत्ता के उपकरणों का मनमाना इस्तेमाल यानी दुरुपयोग करने में कोई हिचक नहीं हो तो चीजें और आसान हो जाती हैं। सरकार में होने के कारण भाजपा को पता है कि कहां से कितना नाम कट गया और कहां जुड़ गया। अभी तक की एसआईआर में मृत और फर्जी श्रेणी में चार करोड़ के करीब नाम कटे हैं। शिफ्टेड और अपने पते पर नहीं मिलने वालों की संख्या साढ़े नौ करोड़ के करीब है। पहले भी इन मतों का इस्तेमाल सत्ता में बैठी पार्टियां करती थीं। बोगस वोटिंग में इनका इस्तेमाल होता था। बड़ी संख्या में नए नाम जोड़े जाने की जो चर्चा है उसका इस्तेमाल भी बोगस वोटिंग के लिए ही होगा या तकनीक का इस्तेमाल करके वोट मैनिपुलेट करने के लिए होगा। अब ज्यादातर जगह भाजपा की सत्ता में है तो विपक्ष तो यह काम नहीं कर पाएगा।

एसआईआर के बाद दूसरा सबसे बड़ा हथियार परिसीमन का है। हालांकि इसमें बहुत सारे अगर मगर हैं। अगर समय रहते परिसीमन बिल पास हो गया और समय रहते इस पर काम पूरा हो गया तो इसका लाभ है। लेकिन परिसीमन किस कदर लाभप्रद है इसे जम्मू कश्मीर और असम के उदाहरण से समझा जा सकता है। जम्मू कश्मीर में पहले 87 सीटें थीं। लद्दाख अलग होने के बाद 83 सीटें बचीं। परिसीमन के बाद इनकी संख्या बढ़ा कर 90 कर दी गईं। यानी सात सीटों का इजाफा हुआ। इनमें से छह सीटें जम्मू संभाग बढ़ाई गईं। वहां सीटों की संख्या 37 से बढ़ कर 43 हो गई। कश्मीर घाटी में सिर्फ एक सीट बढ़ी। सबको पता है कि भाजपा कश्मीर घाटी में एक भी सीट नहीं जीत सकती है। तभी जम्मू में ज्यादा सीटें बढ़ीं और भाजपा ने उसमें से ज्यादातर सीटें जीत लीं। भाजपा ने परिसीमन के बाद हुए चुनाव में पांच सीटें ज्यादा जीतीं। उसकी सीटों की संख्या बढ़ कर 30 हो गई।

ऐसे ही असम में परिसीमन के बाद पूरा समीकरण बदल गया। इसे कई तरह से बदला गया। सीटों की संख्या 126 ही रखी गई लेकिन एससी और एसटी आरक्षित सीटों की संख्या 24 से बढ़ा कर 28 कर दी गई। ऐसे ही बोडोलैंड स्वायत्त परिषद  के इलाके में सीटों की संख्या 16 से बढ़ा कर 19 कर दी गईं। ककरीब 40 सीटों की भौगोलिक संरचना में इस तरह का बदलाव किया गया कि वहां की पूरा सामाजिक व धार्मिक संरचना बदल गई। इन 40 इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं की निर्णायक संख्या होती थी। इसे इस तरह से विभाजित किया गया कि मुस्लिम आबादी करीब 25 सीटों पर बहुत सघन हो गई और बाकी सीटों पर उनकी निर्णायक भूमिका समाप्त हो गई।

इसका लाभ भाजपा को मिला। पहली बार ऐसा हुआ है कि 126 के सदन में भाजपा अपने दम पर बहुमत हासिल करने में कामयाब रही। उसने 82 सीटें जीत लीं। परिसीमन के असर को इस आंकड़े से भी समझ सकते हैं कि कांग्रेस सिर्फ 19 सीटों पर जीती, जिसमें से 18 मुस्लिम विधायक हैं। लोकसभा चुनाव में भी 14 सीटों में से भाजपा अकेले 10 सीटों पर जीती और दो सीटें उसकी सहयोगी पार्टियों को गईं। सो, असम में परिसीमन ने जादू का काम किया है। इस प्रयोग को पूरे देश में दोहराने की तैयारी है।

लोकसभा चुनाव में अब ढाई साल का समय बचा है क्या इतने कम समय में पूरे देश में परिसीमन का काम हो जाएगा? अगर इससे पहले हुए परिसीमन की बात करें तो उसमें करीब छह साल लगे थे। हालांकि वह मामला प्रशासनिक व राजनीतिक कारणों से उलझा रहा था। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज जस्टिस कुलदीप सिंह की अध्यक्षता में 12 जुलाई 2002 को चौथे परिसीमन आयोग का गठन किया गया था। इसे 2001 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या 543 बनाए रखते हुए उसको रिस्ट्रक्चर करने की सिफारिश करना था। आयोग ने 2007 के अंत में अपनी सिफारिश सौंपी थी, जिसे फरवरी 2008 में स्वीकार किया गया था। लेकिन उससे पहले तीसरे परिसीमन आयोग ने अपना काम तीन साल में पूरा कर लिया था।

इंदिरा गांधी की सरकार ने 1971 की जनगणना के आधार पर परिसीमन के लिए 1973 में तीसरे आयोग का गठन किया था। आयोग ने 1976 में अपनी सिफारिश की। इसकी सिफारिशों के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या 522 से बढ़ा कर 543 कर दी गई। उसी समय इंदिरा गांधी ने परिसीमन के लिए 1971 के आंकड़े और लोकसभा की सीटों की संख्या 25 साल के लिए फ्रीज कर दी थी। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 2001 में सीटों की संख्या पर फ्रीज को 25 साल के लिए बढ़ा दिया था।

बहरहाल, तीसरे और चौथे परिसीमन आयोग ने जो समय लिया हो लेकिन अगर केंद्र सरकार किसी तरह से परिसीमन बिल को पास कराने में कामयाब हो जाती है तो अगले चुनाव से पहले उसकी सिफारिशों को स्वीकार करने और लागू करने का प्रयास होगा। आज तक जनसंख्या के आंकड़ों से लेकर सीटों की भौगोलिक संरचना तक सब कुछ डिजिटल रूप में उपलब्ध है। इसलिए पहले की तरह इस काम में बहुत समय नहीं लगेगा। गौरतलब है कि परिसीमन आयोग का अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के किसी रिटायर जज को बनाया जाता है। उसके अलावा मुख्य चुनाव आयुक्त या उनकी ओर से नामित कोई आयुक्त इसका सदस्य होता है। फिर राज्यों के मुख्य चुनाव अधिकारी इसके सदस्य होते हैं। सहयोगी सदस्य के रूप में हर राज्य से पांच लोकसभा सांसद और पांच विधायक नामित किए जाते हैं। चूंकि केंद्र से लेकर ज्यादातर जगहों पर भाजपा या एनडीए की सरकार है। तो नामित सदस्य उसकी पसंद के होंगे और वे कामकाज में ज्यादा अड़चन नहीं डालेंगे।

आबादी की संरचना को समझने या एससी, एसटी आबादी के हिसाब से सीटों की संरचना तय करने और आरक्षित सीटों की सिफारिश करने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। समय लगने का काम यह है कि ड्राफ्ट तैयार होने के बाद उसे सार्वजनिक किया जाता है, उस पर आपत्ति मंगाई जाती है और जन सुनवाई आय़ोजित करनी पड़ती है। हालांकि इसमें भी सरकार जो चाहती है वही होता है। ज्यादातर काम दिखावे का ही होता है। इस बार समस्या यह है कि विपक्ष बहुत आंदोलित है और सहयोग करने के मूड में नहीं है। उधर दक्षिण भारत के राज्य भी टकराव के मूड में है। इसलिए वह उस लेवल पर भी काम को अटकाने की कोशिश होगी। सरकार के हाथ में एक अस्त्र यह है कि संविधान के मुताबिक आयोग की अनुशंसा अंतिम मानी जाती है। उसे किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है और लोकसभा व विधानसभा में भी जब इसे मंजूरी के लिए रखा जाता है तो कोई भी सदन इसमें बदलाव नहीं कर सकता है।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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