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कितने भक्तों के भरोसे 2029 की जीत?

सवाल है भाजपा के पास ऐसे कितने करोड़ वोट हैं जो कुछ भी हो जाए, मोदी के नाम पर ही वोट देंगे? महंगाई बढ़े, बेरोजगारी बढ़े, रुपया गिरे, नौजवान सड़कों पर उतरें, मुसलमान नाराज हों, दलित और आदिवासी बिदकें, तब भी जिनका वोट नहीं बदलेगा। क्या ऐसे मतदाता बीस करोड़ हैं? पच्चीस करोड़ हैं? या तीस करोड़? पिछले तीन चुनावों का हिसाब देखें। 2014 में भाजपा को 31.34 प्रतिशत वोट मिले थे। 2019 में यह बढ़कर 37.7 प्रतिशत हुआ। फिर 2024 में घटकर 36.56 प्रतिशत रह गया। एनडीए को इन तीन चुनावों में क्रमशः लगभग 38.5, 45.4 और 43.8 प्रतिशत वोट मिले। मतलब 2019 के मुकाबले 2024 में भाजपा और एनडीए, दोनों का वोट प्रतिशत घटा। भाजपा की सीटें 303 से घटकर 240 हो गईं। बावजूद इस ट्रेंड के अमित शाह को 2029 में जीत का पक्का भरोसा है!

सवाल है क्या उन्हें लगता है कि भाजपा के 2024 के लगभग 23.6 करोड़ मतदाता अब स्थायी मोदी भक्त बन चुके हैं? या एनडीए के लगभग 28.3 करोड़ वोटों में कोई कमी संभव नहीं? लेकिन इन संख्याओं में तो सब तरह के मतदाता हैं। हिंदुत्व के पक्के समर्थक हैं तो सरकारी योजनाओं के लाभार्थी भी। जाति के हिसाब से वोट देने वाले हैं तो स्थानीय उम्मीदवार के कारण भाजपा को चुनने वाले भी। कुछ मोदी के नाम पर वोट देते हैं तो कुछ विपक्ष को पसंद नहीं करने के कारण। इनमें से कितने ऐसे हैं जो हर परिस्थिति में भाजपा को ही वोट देंगे?

ऐसी ही एक दूसरी गणित भी है। 2014 में भाजपा ने महज 31.34 प्रतिशत वोटों से लोकसभा में अपने दम पर बहुमत बनाया था। यानी सौ वोट डालने वालों में लगभग 69 ने भाजपा को वोट नहीं दिया, फिर भी उसे पूर्ण बहुमत मिला। 2019 में 37.7 प्रतिशत वोटों से 303 सीटें मिलीं। और 2024 में 36.56 प्रतिशत वोटों पर 240 सीटें। अंतर सिर्फ वोट प्रतिशत का नहीं था। वोट कहां पड़े, किस सीट पर विपक्ष बंटा, कहां उम्मीदवार मजबूत था, कहां गठबंधन बना, इन बातों से सीटों का गणित बदला और हमेशा बदलता है।

यहीं 2029 में मोदी-शाह की जीत का असली सूत्र याकि रहस्य है। भाजपा को देश के पचास प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन मिलना जरूरी नहीं। उसे उन निर्वाचन क्षेत्रों में पर्याप्त वोट चाहिए जहां से लोकसभा की बहुमत वाली संख्या बनती है। इसलिए संभव है कि देश में असंतोष बढ़े, कई सामाजिक समूहों में नाराजगी हो, नौजवान आंदोलन करें, फिर भी पार्टी विशेष का चुनावी आधार बना रहे। हालांकि इसमें यह भी खतरा है कि राष्ट्रीय वोट प्रतिशत में मामूली गिरावट से दर्जनों सीटें हाथ से निकल जाएं। जैसे 2024 में भाजपा का अनुभव था।

फिलहाल जेनरेशन ज़ेड का भौकाल मुखर है। नौजवानों में आज कितने मोदी समर्थक हैं और कितने विरोधी? मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों में कितने भाजपा को वोट देते हैं? पर इन्हें एक साथ जोड़कर कोई मोदी विरोधी आबादी नहीं बनाई जा सकती। जेनरेशन ज़ेड में भी मोदी समर्थक हैं। दलितों और आदिवासियों में भी भाजपा को वोट मिले हैं। लेकिन यह भी सच है कि एक ही मतदाता युवा भी हो सकता है, दलित भी और किसी आंदोलन का समर्थक भी। इसलिए इन समूहों की आबादी जोड़कर भाजपा विरोधी वोटों की संख्या निकालना संभव ही नहीं।

तो अमित शाह ने कैसे हिसाब लगाया हुआ होगा? मेरा मानना है कि वे भाजपा के प्रतिबद्ध वोटों पर निर्भर नहीं रहते। वह बूथवार वोट हिसाब के पारखी हैं। समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने से लेकर उम्मीदवार, गठबंधन और स्थानीय सामाजिक समीकरणों का हिसाब रखते हैं। अब इस सबके साथ मतदाता सूचियों के एसआईआर, परिसीमन और महिला आरक्षण की संभावनाएं भी हैं। इसलिए राहुल गांधी, कांग्रेस और विपक्ष के लिए जीवन-मरण का स्वाभाविक सवाल है कि 2029 का चुनाव आखिर किन मतदाता सूचियों, किन निर्वाचन क्षेत्रों और किन नियमों के अंतर्गत होगा?

कैसे? आखिर जब चुनावी जीत का अंतर कई जगह कुछ हजार वोटों का हो, तब मतदाताओं के नाम कटने या जुड़ने से ही चुनावी मुकाबला तय होता है। पश्चिम बंगाल उदाहरण है। दो-चार, दस लाख नहीं, लाखों (39 लाख) वैध दस्तावेजी सबूतों के बावजूद वोट डालने के अधिकार से वंचित किया गया। ऐसा चुनाव आयोग, ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट सभी के बावजूद हुआ।

तो नरेंद्र मोदी-अमित शाह के 2029 में चुनाव जीतने के अडिग विश्वास का कारण सत्ता का ऐसा दुरुपयोग और अहंकार क्या नहीं है? यदि 2024 के 23.6 करोड़ भाजपा वोटों को भक्तों की स्थायी संख्या भी मान लें तब भी इनके बूते जीत संभव नहीं है जब तक वोट सूची ईमानदार न हो। 2029 में कितने करोड़ नए या पुराने वोटर मतदान करने के पात्र रहेंगे? कितने कटेंगे, और कितने बंगाल की तरह लटकाए रखे जाएंगे, उससे अधिक तय होगा?

सो, भाजपा को 2029 में कितने करोड़ लोग पसंद करते हैं, से अधिक महत्त्वपूर्ण होगा कि उसने सीटवार अपने वोट कितने करवाए हुए हैं? और यह काम ज्ञानेश कुमार की कमान के चुनाव आयोग के जरिए चुटकियों में संभव बना रहेगा।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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