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समाज में धिक्कार की शक्ति ही नहीं रही!

भारत का नौजवान नियति का मारा हो गया है। वह आंदोलित नहीं होता। सरकार के खिलाफ सवाल उठाने का तो खैर सवाल ही नहीं है। नीट यूजी की परीक्षा में 23 लाख छात्रों का भविष्य अधर में है लेकिन न तो छात्र और न उनके अभिभावक इसे लेकर आंदोलित हैं। सीबीएसई की 12वीं की बोर्ड परीक्षा में 18 लाख बच्चों के लिए संकट खड़ा हुआ लेकिन कोई आंदोलित नहीं है। सब किसी तरह सिस्टम से जूझ रहे हैं। वेबसाइट नहीं चल रही है तो इसे नियति का खेला मान कर बार बार प्रयास कर रहे हैं। महंगाई बढ़ रही है, पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत बढ़ रही है लेकिन सब मान रहे हैं कि इसमें क्या किया जा सकता है यह तो अमेरिका और ईरान के युद्ध की वजह से हो रहा है।

इसमें बहुत से लोग ऐसा मानने वाले हैं कि वह तो मोदीजी हैं, जिन्होंने इतने पर ही रोका हुआ है अन्यथा पाकिस्तान की तरह यहां भी तीन सौ रुपए पेट्रोल बिक रहा होता। शेयर बाजार में सूचीबद्ध राजेश मेहता की कंपनी राजेश एक्सपोर्ट का 15 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का घोटाला खुला है लेकिन किसी को परवाह नहीं है। 64 करोड़ रुपए के कथित बोफोर्स घोटाले के मामले में राजीव गांधी की पार्टी चुनाव हार गई थी लेकिन आज 15 लाख करोड़ रुपए के घोटाले की खबर को ऐसे लिया जाता है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। शेयर बाजार में लाखों लोगों के रुपए डूब रहे हैं लेकिन वे सरकार पर सवाल नहीं उठाते हैं।

जो चौकीदार है वह भी कॉकरोच है और जो कॉकरोच है वह तो है ही। जो सरकार पर सवाल उठा रहे हैं ऐसे कुछ कॉकरोच रेंगते हुए जंतर मंतर पर पहुंच जाएंगे लेकिन उससे क्या होगा? अभी तो यही तय नहीं हो पाया है कि कॉकरोच किसके हैं?

लालू प्रसाद की पार्टी के सांसद की सिफारिश पर कॉकरोच जनता पार्टी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए कांस्टीट्यूशन क्लब में हॉल बुक हुआ और जब बात खुली तो सांसद को सफाई देनी पड़ी कि उन्होंने सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए चिट्ठी लिखी थी उनका इससे कोई लेना देना नहीं है। जो चौकादीर हैं वे कह रहे हैं कि कॉकरोच है तो हिट भी है यानी हिट मार कर इनको खत्म कर दिया जाएगा। जो चौकीदारों के विरोधी हैं है उनको लग रहा है कि ये कॉकरोच सरकार द्वारा पैदा किए गए हैं, जिसका मकसद विपक्ष का स्पेस लेना है। मतलब कॉकरोच दोनों तरफ से संदेह के घेरे में है। सही भी है। भला कॉकरोचों को कौन अपना कहता है!

सोचें, यह जो समूह है इसकी पहली मांग यही है कि नीट यूजी की परीक्षा के पेपर लीक होने और 12वीं की परीक्षा में हुई गड़बड़ियों के कारण शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें। फिर भी इनको उन लाखों परिवारों का समर्थन नहीं है, जिनके बच्चे परीक्षा की गड़बड़ियों का शिकार हुए हैं। लोग अपना उत्पीड़न करने वाले के मोहपाश में ऐसे बंधे हैं कि वे अपनी तकलीफों पर भी आह नहीं भर रहे हैं।

अस्सी के दशक में एक लेख परसाई ने लिखा था कि समाज में धिक्कार की एक शक्ति होती है, जिसे समाज ने खो दिया है। समाज के अंदऱ धिक्कार की जो शक्ति थी उसकी वजह से नेता, अधिकारी, कारोबारी सब घबराते थे। धीरे धीरे वह शक्ति समाप्त हो गई। आज स्थिति यह है कि जो जितना धिक्कार का पात्र है वह समाज में उतना सम्मानित है। समाज और देश की पूरी व्यवस्था सिर के बल खड़ी हो गई। शब्दों के मायने बदल गए। विकलांग को दिव्यांग कहा जाने लगा और बेरोजगार को आकांक्षी युवा का टैग मिल गया। तभी आक्रोशित युवा कॉकरोच कहे जाने लगे या कॉकरोच में तब्दील हो गए। कॉकरोच जनता पार्टी बनने के बाद यह मजाक की बात बन गई कि फ्रांज काफ्का की महान रचना ‘मेटामॉरफोसिस’ में मुख्य पात्र ग्रेगर सम्सा एक सुबह उठता है तो अपने को कॉकरोच में तब्दील हो गया देखता है। उसके बाद वह जो देखता है वह एक त्रासदी है लेकिन आज त्रासदी को प्रहसन बना दिया गया है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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