सोचें, डोनाल्ड ट्रंप पर। अमेरिका का कैसा मजाक बना डाला है। चाहे जो कर रहे हैं मगर लोकतंत्र के तकाजे में कोई कुछ भी नहीं कर सकता। ईरान ने अमेरिका को हैसियत दिखा दी है। मेरा मानना है कि साठ दिनों बाद ईरान ही खाड़ी का मालिक होगा। दुनिया का संकट बना रहेगा। बावजूद इसके ट्रंप के झूठ, झांसे हॉट केक की तरह हैं। इसलिए भारत में भी उनका यह कहा अमृत वाक्य है कि नरेंद्र मोदी एक “टफ नेगोशिएटर” हैं। मोदी देखने में देवदूत जैसे लगते हैं और वे राजनीति में “किलर” हैं।
सवाल है क्यों ट्रंप ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह ‘चरित्र प्रमाणपत्र’ दिया? इसलिए क्योंकि दुनिया जानती है कि ज्योंहि प्रमाणपत्र मिलेगा त्योंहि मोदी और उनका मीडिया हिंदू भक्तों के बीच ट्रंपजी के कहे का घर-घर पहुंचा देगा। देखों हमारे भगवान को अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी देवदूत जैसा कहा!
ध्यान रहे, ट्रंप अपने आपको धूर्त, मास्टर सौदेबाज कहते हैं। उन्हे हर किसी को बेवकूफ बनाना आता है। वे प्रोपर्टी डीलर हैं। मिट्टी को भी सोने के भाव बेच सकते हैं। अमेरिका को जैसा अभी चूना लगा रहे हैं, वैसा एक भी राष्ट्रपति अमेरिकी इतिहास में नहीं हुआ है। ऐसे व्यापारी, सौदेबाज की पहली कला यह होती है कि सौदा करने से पहले सामने वाले को उसकी कीमत से थोड़ा ज्यादा महान महसूस करा दिया जाए।
ट्रंप ने आज ही लिखा है कि वे अपने आपको हिटलर, स्टालिन, माओं, सिकंदर आदि से बड़ा शक्तिमान मानते हैं। उन्हे भी इतिहास ऐसे ही याद करेगा। ट्रंप और नरेंद्र मोदी में फर्क यह है कि ट्रंप का लक्ष्य पृथ्वी के इतिहास का नंबर एक युगपुरुष होना है वही नरेंद्र मोदी को कलियुगी भारत का सबसे बड़ा देवता कहलाना है। एक की महानता का लेवल पृथ्वी का आधुनिक इतिहास है। वही दूसरे का कलियुगी हिंदुओं का नंबर एक भगवान बनना है। बारह साल, बारह युग! भारत में कभी चंद्रशेखर नाम के एक प्रधानमंत्री हुआ करते थे। उनके चेलों ने चालीस दिन बनाम चालीस साल के ऐसे नारे बनाए थे कि देश भर के चिरकूट उनका कीर्तन करते थे।
भटक गया हूं। असल मुद्दा है कि जल्द भारत का बाजार अमेरिकी का कैप्टिव बाजार होगा। ट्रंप अमेरिका से भारत को पशुओं की खुराक भिजवाएँगे तो सोयाबीन, मक्का से लेकर वे सामान भी आएंगे, जिससे भारत के विदेश व्यापार की कंगाली में आटा और गीला होगा। अब अमेरिका का बनवाया समझौता आसानी से लापतागंज में बिकेगा। 140 करोड़ ग्राहकों के बाजार में अमेरिका की उपस्थिति इसलिए बड़ी होनी है क्योंकि अमेरिका यह भी वचन ले रहा है कि इतने वर्षों में इतना अमेरिकी सामान भारत को खरीदना ही है। सोचें, एक के बाद एक मुक्त व्यापार समझौतों की बाढ़ में फंसता बाजार। यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ईएफटीए, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, ओमान, न्यूजीलैंड, अमेरिका से व्यापार (खरीद) के सौदे ही सौदे तो वही चीन बिना सौदे के पहले से ही सबसे बड़ा विक्रेता।
पता है व्यापारिक घाटे में सबसे बड़ा घाटे वाला कौन सा देश है? भारत। यों नंबर एक पर अमेरिका है। मगर वह इसलिए है क्योंकि अमेरिकी इतने अमीर है कि उन्हे काले हाथ करके सामान बनाना पसंद नहीं। अमेरिकियों की कमाई के असल जरिए दूसरे हैं। वह डॉलर छापता है। दुनिया को पूंजी, तकनीक देता है। अब वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भी मालिक है जिससे उसे डालर मिलेगा तो भारत की आईटी, सेवा क्षेत्र की डालर कमाई भी लापता होनीं है।


