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हिंदू को बरदास्त ही करना है!

हम हिंदू पहले से राजा को विष्णु का अवतार मानते है। तभी उसके अंदर इतनी सहनशीलता है कि कुछ भी हो जाए वह बर्दाश्त करेगा। सो, देश की जनता बर्दाश्त कर रही है। बारिश का मौसम है और जरा सी बारिश होते ही सड़कें पानी से भर जा रही हैं, पानी में करंट आने से लोग मर जा रहे हैं, बारिश के पानी से सड़कें धंस रही हैं और लोगों की गाड़ियां उनमें गिर जा रही हैं, जरा सी बारिश होते ही बिजली की आपूर्ति बाधित हो जाती है लेकिन इसके लिए कोई जिम्मेदार नहीं होता है। लोग इसे सहज रूप से स्वीकार करते हैं, जैसे बारिश होने पर यह सब होना ईश्वर की व्यवस्था का नियम है।

ऐसे ही कुछ दिन बाद सर्दियां आएंगी तो प्रदूषण से लोगों का दम घुटने लगेगा। इस वजह से निर्माण कार्य रोक दिए जाएंगे, फैक्टरियों में काम बंद हो जाएगा, लोगों की आवाजाही सीमित हो जाएगी। सर्दियों में कहीं शीतलहर से लोग मरेंगे तो कहीं शीतलहर से किसानों की फसल खराब होगी। कोहरे कारण ट्रेन और विमान लेट होंगे। लेकिन इसके लिए भी किसी की जिम्मेदारी नहीं है।

झूठे सच्चे आंकड़ों से समझाया जाएगा कि कहां की पराली जलाने के कहां प्रदूषण हो रहा है। फिर लोगों से कहा जाएगा कि वे गाड़ियों से बाहर नहीं निकलें, सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करें, जो जरुरत से बहुत कम है, वर्क फॉर्म होम करें आदि आदि। यानी वायु प्रदूषण बढ़ रहा है तो इसके लिए किसान और नागरिक जिम्मेदार हैं और उन्हीं को इसे ठीक करने के लिए काम करना होगा। सरकार सिर्फ नियम बनाएगी और लोगों से जुर्माना वसूलेगी। अभी गर्मियां बीती हैं। राजधानी दिल्ली और एनसीआर से लेकर देश भर में बिजली कटौती की खबरें आईं।

राजधानी और आसपास में आग लगने की अनगिनत घटनाएं हुईं। हैरान करने वाली बात है और दुनिया के किसी भी सभ्य समाज में इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है कि जो ऑथोरिटी 20 मंजिल की इमारत बनाने की इजाजत देती है उस ऑथोरिटी के पास छठी मंजिल से ऊपर आग बुझाने का संयंत्र नहीं है। एनसीआर के इलाके में कई ऊंची इमारतों में आग लगी और फायर ब्रिगेड के लोग नीचे असहाय खड़े रहे क्योंकि उनके पास छठी मंजिल से ऊपर जाने से हाइड्रोलिक सीढ़ी नहीं थी। ऊपर लोग असहाय अपना घर जलते देखते रहे। यह उस सरकार में हाल है, जो 24 घंटे नागरिकों से कर्तव्य निभाने की अपील करती रहती है। जिस सरकार के मुखिया ने राजपथ का नाम कर्तव्य पथ, सरकारी कार्यालयों का नाम कर्तव्य भवन और अपने कार्यालय का नाम सेवा तीर्थ रखा।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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