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सिर्फ दस घंटे, भारत मार सकता है छलांग!

अमेरिका से यूरोप का बिदकना भारत का स्वर्णिम अवसर है। विश्व राजनीति में नई सोच, नई ताकत के लिए नए गठजोड, नए बाजार, नए साझेदार के अवसर हैं। इसमें 150 करोड़ लोगों के भारत बाजार के लिए मौके ही मौके हैं। आवश्यकता सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक्शन के दस घंटों की है। वे अफसरशाही, डोवाल-जयशंकर के घेरों से बाहर निकलें और जैसे 24 जुलाई 1991 के दिन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने सुबह आठ बजे से शाम को आठ बजे के दस घंटों में भारत की आर्थिकी को बदला वैसा ही कमाल कर दिखाएं। नरसिंह राव ने दस घंटों में ही भारत को बदला। इन दस घंटों में उन्होंने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह का बजट देखा, कैबिनेट से ओके कराया तो संसद में बजट प्रस्तुत होने के बाद बतौर उद्योग मंत्री खुद नरसिंह राव ने उद्योग-पूंजी, लाइसेंस के अफसरी ढांचे को ध्वस्त करने के नोटिफिकेशन बनवाए। प्रेस कॉन्फ्रेंस कर देश-दुनिया को समाजवाद से मुक्त बताया।

वैसा ही साहस चाहिए। भारत नए गठजोड़ के साथ नए विजन बनाए। ध्यान रहे ब्रिटेन, न्यूजीलैंड के बाद 26 जनवरी के बाद भारत-यूरोपीय संघ में मुक्त व्यापार संधि होने वाली है। यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और एंटोनियो कोस्टा गणतंत्र दिवस की परेड में विशिष्ट अतिथि हैं। कुछ दिन पहले जर्मन के चांसलर शोल्ज़ भी भारत आए थे। उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने दावोस में कहा है हम भारत के साथ एक ऐतिहासिक व्यापार समझौते के कगार पर हैं। कुछ लोग इसे ‘सभी सौदों में सबसे बड़ा’ (mother of all deals) मानते हैं—ऐसा समझौता जो दो अरब लोगों का साझा बाज़ार बनाएगा। वैश्विक जीडीपी के लगभग एक-चौथाई का प्रतिनिधित्व करेगा”। गलत नहीं है ऐसा मानना। पर गौर करे ‘दो अरब लोगों का साझा बाज़ार’! यही पेंच है। यह सवाल है कि नए दो अरब लोगों के बाजार के 150 करोड़ भारतीयों के पास यूरोप, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड के बाजार में बेचने को क्या है, जबकि यूरोप का तो हर उत्पाद भारत में भरपूर बिकेगा!

इसलिए भारत को अपनी कोर आवश्यकता की पूर्ति का सौदा पटाना चाहिए। आवश्यकता सुरक्षा के लिए हथियारों की है। भारत स्वदेश में विश्व स्तरीय हथियार बनाए। यह मिशन अब अमेरिका से झटके के बाद यूरोपीय देशों, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, यूरोपीय संघ का भी है। यूरोप बेइंतहां रिसर्च-तकनीक निर्माण में खपेगा। उससे किसी तरह भारत का साझा बने। मतलब यूरोप रिसर्च, तकनीक, शस्त्र प्रणालियां (जो भारत में संभव नहीं) बनाए और साझा पूंजी निवेश से फैक्ट्रियां भारत में लगे। भारत में रोजगार, आत्मनिर्भरता का आधार बनेगा। कुछ वैसा ही मॉडल जैसे सुजुकी कंपनी ने भारत में मारूति-सुजुकी बना अपना और जापान का दोनों का मुनाफा बनाया तो वह भारत के देशज ऑटो उत्पादन का आधार भी हुआ।

यह संभव है। प्रमाण यूरोपीय संघ के पारस से जैसे-तैसे सदस्य बने तुर्की का विकसित होना है। कई जानकार तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन और नरेंद्र मोदी को समतुल्य मानते है। दोनों राष्ट्रवादी, धर्मवादी और वैश्विक धमक के नेतृत्वकर्ता। पर कई बुनियादी फर्क है। तुर्की वास्तविक विकास की कहानी है। पिछले साल तुर्की ने स्वदेशी हथियार निर्माण की झांकी में एक रक्षा प्रदर्शनी (BAMEX’25) आयोजित की। और उसकी रिर्पोर्ट सुनते हुए मुझे  मालूम हुआ कि दस साल पहले तुर्की रक्षा साजो सामानों में सिर्फ 30 प्रतिशत आत्मनिर्भर था। अब 80 प्रतिशत है! वह अफ्रीका महाद्वीप को सर्वाधिक हथियार बेचता है। उसके उन्नत ड्रोन और अन्य रक्षा उपकरण हिट है। 2025 का तुर्की का रक्षा और एयरोस्पेस निर्यात 10.56 बिलियन डॉलर अनुमानित है। वैश्विक हथियार निर्यात में विश्व का अब वह 11वां निर्यातक देश है। जबकि भारत का 2024-25 में रक्षा निर्यात आंकड़ा 23,622 करोड़ रुपए (लगभग2.76 बिलियन डॉलर) का है।

सो, तुर्की की कहानी की एक बड़ी वजह यूरोपीय संघ के पारस से उसका सोना बनना है। वह यूक्रेन को ड्रोन बेचता है तो पुतिन से भी संबंध रखता है। आज तुर्की से कई गुना, कई तरह के बड़े अवसर भारत की बाजार हैसियत की बदौलत है। यूरोपीय देश आगे हथियारों के लिए बुद्धि-पूंजी खपाएंगे तो उन्हें इस काम में श्रम शक्ति, बाजार का साझा भी चाहिए। इसमें यदि भारत लपके, कूटनीति करे, यूरोपीय संघ (ब्रिटेन, जर्मनी आदि) की कंपनियों से भारत घुलमिल जाए तो जहां अमेरिका, रूस, चीन की तोड़ बनेगी वही सभ्य-लोकतांत्रिक यूरोपीय मिजाज की संगत भी बनेगी। क्या नहीं?

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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