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सिलेंडर भरने वालों की चांदी

एलपीजी गैस की एजेंसियां की गड़बड़ियों की खबरें रोज आ रही हैं। असल में दो खबरों ने आम नागरिकों के बीच पैनिक की स्थिति पैदा की। पहले तो सरकार ने नियम बनाया कि एक सिलेंडर लेने के बाद शहरों में 25 दिन और गांवों में 45 दिन तक बुकिंग नहीं हो पाएगी। दूसरी खबर यह आई कि कंपनियां 14 किलो के सिलेंडर में 10 किलो गैस डाल कर बेचेगी। इससे अपने आप मैसेज गया कि गैस की किल्लत है। एजेंसियों ने इसका फायदा उठाया। उन्होंने महंगी कीमत लेकर सिलेंडर बेचने शुरू किए। जो सक्षम थे उन्होंने 14 किलो का एक हजार रुपए का सिलेंडर चार हजार में खरीद लिया। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि जरुरतमंतद लोग भटकते रहे। कंपनियों के पासे सारे रिकॉर्ड हैं। जिन लोगों ने काफी समय से सिलेंडर नहीं लिए थे उनके नाम पर सिलेंडर जारी कर दिए गए। हर दिन सैकड़ों लोग सोशल मीडिया पर स्क्रीन शॉट डाल रहे हैं कि उन्होंने बुकिंग नहीं कराई लेकिन उनके मोबाइल फोन पर सिलेंडर डिलीवर होने का मैसेज आ गया। ये सारे सिलेंडर कालाबाजारी में गए।

इसके बाद छोटे सिलेंडर भरने वालों की चांदी हुई। वे एजेंसियों से ऊंची कीमत पर गैस लेकर उसे और ज्यादा ऊंची कीमत पर बेचने लगे। छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक में बड़ी आबादी ऐसी है, जिसके पास गैस कनेक्शन नहीं है। इसमें झुग्गियों में रहने वाली आबादी है तो किराए में रह कर पढ़ने वाले या छोटी मोटी नौकरी करने वाले लोग हैं। उनके पास पांच किलो के सिलेंडर लगा चुल्हा होता है। इसमें वे खुदरा गैस भरवाते हैं। इसकी कीमत आठ से 10 गुना बढ़ गई।

पांच किलो के सिलेंडर में खुदरा गैस चार हजार रुपए तक में भरे जाने की खबर आई है। लोग एक एक किलो गैस चार सौ या पांच सौ रुपए में भरवा रहे हैं। सिर्फ इस समस्या की वजह से बड़ी संख्या में छात्र अपने घरों को लौटे हैं। दिल्ली से वापसी कम है लेकिन प्रयागराज, वाराणसी, पटना, रांची जैसे शहरों से लाखों की संख्या में लोग अपने गांव या कस्बे में लौट गए हैं। उनके सामने दो तरह के संकट हैं। पहला तो खुद खाना बनाने के लिए गैस नहीं मिल रही और मिल रही है तो बहुत महंगी मिल रही है। दूसरा संकट यह है कि ज्यादा ढाबे, रेस्तरां या कैंटीन या तो बंद हो गए हैं या उन्होंने अपना मेन्यू बहुत छोटा कर दिया और कीमत बहुत बढ़ा दी है।

पहले तो सुप्रीम कोर्ट या कांग्रेस मुख्यालय की कैंटीन के सीमित ऑपरेशन की खबर आई थी। अब हर जगह ऐसा हो गया है। दिल्ली में कई ऐतिहासिक दुकानें बंद हो गईं या उन्होंने अपना कामकाज घटा दिया। दिल्ली में छोले भटूरे की सबसे मशहूर सीताराम की दुकान बंद हो गई। इस एक दुकान से लाखों रुपए का रोज का कारोबार था। ऐसे कई फूड ज्वाइंट के बंद होने या बहुत सीमित रूप से चलने की खबर है। देश के कई हिस्सों से खाने के बिल पर एलपीजी सरचार्ज जोड़े जाने की खबरें आईं तो केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण यानी सीसीपीए ने इसे कानून का उल्लंघन बताते हुए आदेश जारी किया।

कुल मिला कर छोटे होटल, रेस्तरां, ढाबे, कैंटीन आदि या तो बंद हुए हैं या कामकाज सीमित किया है या कीमतें बहुत बढ़ा दी हैं। इसका असर हर तरफ देखने को मिल रहा है। दिल्ली और एनसीआर में तो इन दिनों सप्ताहांत और रामनवमी की छुट्टियों के कारण भीड़ कुछ कम है लेकिन वैसे भी टैक्सी और ऑटो वाले बता रहे हैं कि सड़क पर ट्रैफिक कम हुआ है क्योंकि काफी लोग वापस घर चले गए हैं या घरों से निकलना कम कर दिया है।

बहरहाल, सरकार की ओर से बताए जा रहे आंकड़ों या सीसीपीए की ओर से जारी सख्त निर्देश से आम जनता को कोई राहत नहीं मिली है। होटल, रेस्तरां या ढाबे में अलग से सरचार्ज लेने की बजाय कीमत बढ़ा दी। दूसरा तरीका मात्रा घटाने का था, वह भी आजमा लिया। मिठाई की छोटी छोटी दुकानों पर बनने वाली चीजें बंद हो गईं। अब वही चीजें बिक रही हैं, जो फैक्टरी से आ रही हैं। कई लोगों ने वीडियो शेयर किए कि 15 रुपए में तीन कचौड़ी मिलती थी अब दो मिल रही है और वह भी ठंडी। सरकार इस संकट को भी स्वीकार नहीं कर रही है, जबकि खुद उसने माना है कि कॉमर्शियल गैस की आपूर्ति बड़ी मुश्किल से 50 फीसदी हो रही है।

सरकार ने कॉमर्शियल गैस की आपूर्ति बंद कर दी थी। बाद में इसे 30 फीसदी शुरू किया गया। 23 अप्रैल से इसे बढ़ा कर 50 फीसदी किया गया। जाहिर है जब गैस की आपूर्ति 50 फीसदी होगी तो कामकाज भी उतना ही होगा। तभी देश के हर हिस्से से खाने पीने की दुकानों के साथ साथ छोटे छोटे उद्योग, हस्तशिल्प की दुकाने या दस्तकारी की दुकाने बंद होने की खबरें हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में चूड़ियों की फैक्टरियां बंद हो गई हैं तो मुरादाबाद में पीतल के सामान बनाने वालों के सामने भी इसी तरह का संकट है। देश के लगभग हर हिस्से में छोटे व मझोले उद्योगों पर मार पड़ी है।

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By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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