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गड़बड़ है तो विपक्ष दोषी

वैसे तो सरकार ने यह बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि सब ठीक है। लेकिन अगर फिर भी जनता को लगता है कि सब ठीक नहीं है और कहीं कुछ गड़बड़ है तो उसके लिए जिम्मेदार विपक्ष है। सरकार के मंत्री और भाजपा के नेता, प्रवक्ता विपक्ष की जिम्मेदारी दो तरह से बता रहे हैं। पहली बात तो यह बताई जा रही है कि कांग्रेस ने इतने बरसों तक शासन किया लेकिन भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया। इसके बाद भक्त जनता खुद ही इसका प्रचार कर रही है। नेहरू जी और कांग्रेस के दूसरे प्रधानमंत्रियों ने क्या किया? सवाल पूछे जा रहे हैं कि इतने दिनों तक कांग्रेस का राज रहा तो क्यों नहीं ऊर्जा का बंदोबस्त किया गया, तेल खोजे गए या दूसरे स्रोत तलाशे गए?

साथ ही यह भी पूछा जा रहा है कि भंडारण की व्यवस्था कांग्रेस की सरकारों ने क्यों नहीं बनवाई थी? सोचें, 12 साल सरकार में रहने, घर घर उज्ज्वला का सिलेंडर पहुंचाने, बिजली गांव गांव पहुंचा देने का दावा करने या श्रेय लेने के बाद अब यह सवाल है कि कांग्रेस की सरकारों ने उर्जा के स्रोत क्यों नहीं तलाशे और भंडारण की व्यवस्था क्यों नहीं बनवाई!

विपक्ष को एक और तरीके से जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। संसद के दोनों सदनों में भाषण से लेकर असम, तमिलनाडु और केरल या पश्चिम बंगाल तक की सभाओं में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित उनकी पूरी पार्टी यह साबित करने में लगी है कि देश में सब कुछ ठीक है, न तो गैस का संकट है, न तेल का संकट है और न गैस व तेल पर आधारित उद्योग बंद हो रहे हैं। इसकी जगह यह कहा जा रह है कि सब कुछ ठीक है, विपक्ष अफवाह फैला कर लोगों को गुमराह कर रहा है। सोचें, शुक्रवार को एक अखबार में फोटो छपी थी कि रांची में लोग रात में गैस एजेंसी के सामने खाली सिलेंडर रख कर वही सो रहे हैं ताकि सुबह उठें तो भरा हुआ गैस सिलेंडर मिल जाए। लेकिन सरकार कह रही है कि गैस का कोई संकट नहीं है, बल्कि विपक्ष गुमराह कर रहा है।

सरकार की ओर से अंतर मंत्रालयी प्रेस कॉन्फ्रेंस रोज होती है। उसमें सारे मंत्रालय बता रहे हैं कि सब अच्छा है। होरमुज की खाड़ी में भारत के तीन नाविक मारे गए हैं, जो दूसरे देशों के जहाज पर चालक दल में शामिल थे। यह बात भारत के विदेश सचिव ने ब्रिटेन की पहल पर हो रही बैठक में कही। लेकिन भारत में रोज प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा जाता है कि खाड़ी में भारत के नागरिक सुरक्षित हैं। हकीकत यह है कि खाड़ी देशों में भारत के नागरिक पैनिक में हैं क्योंकि युद्ध थम नहीं रहा है। खाड़ी देशों से भारतीयों से भरे जहाज देश के अलग अलग हिस्सों में पहुंच रहे हैं और यहां से खाली जहाज लौट रहे हैं। होरमुज की खाड़ी में 18 भारतीय जहाज और चार सौ से ज्यादा चालक दल के भारतीय सदस्य फंसे हैं। उनकी अलग चिंता है। लेकिन भारत में कहा जा रहा है कि सब सुरक्षित हैं और विपक्ष अफवाह फैला रहा है।

भारत की अर्थव्यलस्था में बड़ी गिरावट की आशंका है। गोल्डमैन सॉक्स ने विकास दर में 1.1 फीसदी की कमी आने का अनुमान जाहिर किया है तो अर्नस्ट एंड यंग ने भी एक फीसदी की कमी की आशंका जताई है। रुपया, शेयर बाजार सब गिर रहा है। लेकिन सरकार कह रही है कि सब अच्छा है और अगर वित्तीय सेक्टर में कोई आशंका है तो वह असल में विपक्ष का दुष्प्रचार है। सोचें, ऑस्ट्रेलिया ने अपने यहां कई जगह पब्लिक ट्रांसपोर्ट फ्री कर दिया है ताकि तेल, गैस की परेशानी झेल रही जनता को

सुविधा मिले। यहां भारत में तेल, गैस का भंडार लगातार कम हो रहा है औऱ फिर भी कहा जा रहा है कि सब ठीक है।

भारत ने एक मार्च के बाद से कॉमर्शियल गैस की कीमत में 343 रुपए प्रति सिलेंडर तक की बढ़ोतरी कर दी है। ऊपर से सॉमर्शियल गैस की सप्लाई युद्ध से पहले के 70 फीसदी के बराबर रखा गया है। यह आधिकारिक आंकड़ा है। असल सप्लाई हो सकता है कि इससे कम हो। ऊपर से कीमतें बढ़ रही हैं। जेट फ्यूल की कीमत में इजाफा हुआ तो सरकार की ओर से मीडिया में बताया गया कि सरकार ने जनता पर ज्यादा बोझ नहीं आने दिया। सिर्फ से आठ से 10 फीसदी कीमत बढ़ी है अन्यथा तेल कंपनियां सौ फीसदी कीमत बढ़ाना चाहती हैं। सवाल है कि अगर कंपनियां सौ फीसदी कीमत बढ़ाना चाहती हैं तो सरकार कब तक उनको रोक लेगी और कब तक उनके नुकसान की भरपाई करेगी? क्या यह संकट नहीं है?

इस बीच भारत सरकार ने विमानन कंपनियों को किराया अपने हिसाब से बढ़ाने की छूट दे दी। पिछले साल के अंत में इंडिगो के संकट के दौरान सरकार ने विमान किराए की ऊपरी सीमा तय की थी, जिसे हटा दिया गया है। यानी कंपनियां अब जितना चाहे किराया रख सकती हैं। इतना ही नहीं भारत सरकार ने एक निर्देश जारी किया था कि विमानन कंपनियां 60 फीसदी सीटें फ्री रखेंगी और बिना अतिरिक्त शुल्क के यात्रियों को मुहैया कराएंगी। लेकिन विमानन कंपनियों ने इसे मानने से इनकार कर दिया तो सरकार पीछे हट गई और इस नियम को लागू करने पर रोक लगा दी। यानी मनमाना किराए के बीच विमानन कंपनियां सीट के पैसे अलग से ले सकेंगी।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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