इन दिनों हर दिन वोट चोरी, एसआईआर, चुनाव आयोग को लेकर खबरों, सवालों का हल्ला है। कभी सुप्रीम कोर्ट के सवाल और निर्देश हैं तो किसी दिन कर्नाटक की वोटर लिस्ट, किसी दिन दिल्ली या पश्चिम बंगाल लिस्ट की धांधली और पूरी एसआईआर प्रक्रिया को लेकर खबर। कौन सा दिन है जब वोटों में धांधली के आरोप और ज्ञानेश कुमार की खबर नहीं होती? याद करें, स्वतंत्र भारत के इतिहास में चुनाव आयोग और मतदाता सूची को लेकर इतने लंबे समय तक ऐसा कौन सा स्कैंडल, विवाद चला? जाहिर है भाजपा अब चुनावों में कितनी ही जीते, उसकी जीत पर सवाल स्थायी है।
तब भला नरेंद्र मोदी अपनी कमान में चुनाव और लोकतंत्र का पाखंड क्यों ढो रहे हैं? क्यों नहीं नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री किसी शाम राष्ट्र को संबोधित करते हुए घोषणा कर दें कि 2047 तक लोकतंत्र, चुनाव, नागरिक आजादी, अभिव्यक्ति की आजादी, मीडिया, उन सबको स्थगित किया जाता है जो विकसित भारत के निर्माण में बाधक हैं। भारत भूमि को लोकतंत्र नहीं चाहिए, विकास चाहिए। इसलिए 2047 तक सब स्थगित और देश मोदी काल के अनुशासन पर्व में विकास के पथ संचलन की ओर अग्रसर!
और वोट ही क्यों? पढ़ना भी तो मोदी और संघ परिवार के लिए सवाल पैदा करता है। अखबार सवाल पैदा करता है। पत्रिका सवाल पैदा करती है। किताब आदमी के दिमाग में वह खुराफात पैदा करती है जिसमें वह सरकार से पूछता है, भला ऐसा क्यों?
तभी शुक्रवार को मैंने खबर पढ़ी कि एक साल में भारत में 80 हजार से ज्यादा पत्र-पत्रिकाएं रजिस्ट्रेशन सूची से बाहर हुईं। वजह प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ पीरियोडिकल्स एक्ट, 2023 के तहत अनुपालन बताई गई। मतलब मोदी राज में बना नया कानून और उसके बाद इतनी बड़ी संख्या में प्रकाशनों का रजिस्ट्रेशन खत्म। फिर डाक का मामला। नया पोस्ट ऑफिस रेगुलेशंस, 2024 लागू हुआ है। इससे पत्र-पत्रिकाओं को रियायती डाक दरों की पात्रता से भेजना मुश्किल होगा। छोटे, मासिक, त्रैमासिक, छमाही प्रकाशनों के सामने पहले ही पाठक और वितरण का संकट है। ऊपर से यदि डाक की रियायत पाने की शर्तें ऐसी हों कि छोटे प्रकाशक उन्हें पूरा न कर सकें तो वे पाठक तक पहुंचेंगे कैसे? पाठक पत्रिका पाएगा कैसे?
सोचें, किसी सभ्य सरकार का काम क्या होना चाहिए? जिस देश में पढ़ना घट रहा हो, पत्र-पत्रिकाओं की दुकानें बंद हो रही हों, वहां सरकार को छोटे प्रकाशनों को घर-घर पहुंचाने का रास्ता आसान करना चाहिए या और मुश्किल? यह सवाल मैं आंकड़ों से पहले आए दिन, अक्सर रोजमर्रा के अनुभवों से सोचता हूं।
मैं जब दिल्ली में बंगाली मार्केट जाता हूं, या कनॉट प्लेस घूमता हूं या उदयपुर, भीलवाड़ा जैसे शहरों में, उनके रेलवे स्टेशनों पर खोजता हूं तो देखकर संताप होता है। बंगाली मार्केट में नाथू स्वीट्स की बगल में पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों की वह दुकान, जिसे मैं 1977 से देखते आया, जहां से पत्रिकाएं खरीदते आया, वह अब हमेशा के लिए बंद हो गई है। सिर्फ वही नहीं। कनॉट प्लेस में भी लगभग सब बंद।
कभी हर शहर में दो, चार, पांच, दस पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों की दुकानें हुआ करती थीं। पाठ्यपुस्तकों की नहीं। पढ़ने की किताबों की। रेलवे स्टेशन पर स्टॉल थे। आदमी चलते-चलते अखबार खरीदता था। पत्रिका का नया अंक देखता था। कोई किताब नजर आई तो उलटता-पलटता था। मैं खुद ऐसा करता आया हूं। अब खोजता हूं तो वे दुकानें ही एक-एक कर बंद हो गई हैं। हिंदी किताबों का सार्वजनिक संसार आंखों के सामने से लगभग गायब है।
हां, इसके पीछे इंटरनेट है। मोबाइल है। सोशल मीडिया है। पढ़ने की आदतों का बदलना है। बाजार और वितरण की अपनी मुश्किलें हैं। मगर सवाल सत्ता की खोपड़ी, उसकी मानसिकता का है। जब देश में पढ़ने का सार्वजनिक संसार सिकुड़ रहा है तो सरकार को उसे बचाने के लिए कुछ करना चाहिए या डाक और पत्र-पत्रिकाओं के रजिस्ट्रेशन से प्रकाशनों को बरबाद करके खत्म करना चाहिए?
पर मोदी सरकार है और उसे पढ़ने-लिखने वाले अक्लमंदों से नफरत है। उसे जहालत चाहिए, सभ्य समाज वाली नागरिकता नहीं।
सोचें, जिस आदमी को पढ़ने की आदत नहीं होगी वह जानेगा कहां से? जिसको जानना नहीं है वह पूछेगा क्या? और जो पूछता नहीं है उसके लिए सरकार और प्रचार में अंतर क्या है?
पर यही तो नया भारत है। मोबाइल पर चलने वाला अंगूठाछाप। यह भारत WhatsApp पढ़ रहा है। Reel देख रहा है। भक्तिभाव में अपने-अपने सत्य का पाठ कर रहा है। लेकिन अखबार, पत्रिका, साहित्य और किताब से मिलने वाली वह असुविधाजनक चीज, यानी विचार, बहस, सत्यशोध का मानव विकास सिकुड़ता जा रहा है।
तभी जरा विचार करें वोट और किताब के रिश्ते पर। मतदाता सूची से जहां नाम गायब होने की शिकायतें हैं वहीं बाजार से पत्रिकाएं गायब हैं। एक तरफ सवाल है, मेरा वोट कहां गया? दूसरी तरफ वह सार्वजनिक संसार सिकुड़ गया है, जिसमें नागरिक पढ़कर यह समझता था कि अपने वोट के साथ क्या हो रहा है। एक नागरिक का मताधिकार सवालों में है और दूसरे का पढ़ना घट रहा है। तब लोकतंत्र बचेगा किसके बूते?
तभी मेरा मानना है कि आवश्यकता ही क्या है जो चुनाव, लोकतंत्र, मीडिया और आजादी रहें? जब देश को बुद्धि नहीं चाहिए, सवाल नहीं चाहिए और कथित विकसित भारत की झांसेपट्टी में ही लोगों को जीना है तो क्यों तो संविधान जरूरी है और क्यों वोट? चुनाव क्यों? सुप्रीम कोर्ट क्यों? विधायिका क्यों? स्वतंत्र मीडिया क्यों? पर ये भी क्या सत्ता के आगे अपनी मौत मरते हुए नहीं हैं?
इसलिए नरेंद्र मोदी यानी हिंदूशाही को सब कुछ खत्म करने का फैसला लेना चाहिए। क्यों डाक कानून और नियमों जैसे टुच्चे तरीकों से छोटे प्रकाशनों का जीना मुश्किल करना? क्यों एसआईआर और मतदाता सूचियों को लेकर रोज आरोप-सफाई का झंझट? क्यों चुनाव आयोग? क्यों विपक्ष? क्यों हर पांच वर्ष बाद वोट मांगने का नाटक?
नरेंद्र मोदी सीधे अपने को चक्रवर्ती राजा घोषित करें। तब न चुनाव का झंझट। न वोटर लिस्ट का। न पत्रकार का सवाल। न पत्रिका। न किताब। न असहमति। निश्चित ही तब हिंदू सभ्यता-संस्कृति के भारत देश का मोदीछाप डंका बनेगा और बजेगा! क्या नहीं?
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