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नया अध्यक्ष, कई मायने

बिहार के विधायक नितिन नबीन को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने को भाजपा नेतृत्व में पीढ़ीगत परिवर्तन के तौर पर देखा जा रहा है। इसकी तुलना दूसरी पार्टियों के अध्यक्षों के उम्र से भी हो रही है। जाहिर है कि इन दिनों मीडिया को वही नैरेटिव चलाना होता है, जो ऊपर से कहा जाता है। इसलिए मल्लिकार्जुन खड़गे की उम्र से लेकर ममता बनर्जी तक के उम्र की तुलना नितिन नबीन की 45 साल की उम्र से की जा रही है। लेकिन क्या पहले भी भाजपा में ऐसे ही नहीं होता था? कम से कम पिछले एक दशक से यह दिख ही रहा है। भाजपा ने जब अमित शाह को अध्यक्ष बनाया तो वह भी पीढ़ीगत परिवर्तन ही था। उस समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह थे, जिनकी उम्र 63 साल थी। उनकी जगह 49 साल के अमित शाह को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था।

उसके साथ ही तय था कि अब अगला अध्यक्ष अब अमित शाह की पीढ़ी से ही आएगा। अमित शाह ने छह साल बाद 2020 में जब अध्यक्ष पद छोड़ा तब उनकी उम्र 54 साल थी और उस समय 59 साल के हो रहे जेपी नड्डा को कमान दी गई। इस तरह शाह और नड्डा के जरिए उस समय की पहली और दूसरी दोनों लाइन के नेताओं में से किसी के अध्यक्ष बनने की संभावनाओं को समाप्त कर दिया गया। उस समय सुषमा स्वराज से लेकर अरुण जेटली, अनंत कुमार, मनोहर पर्रिकर, उमा भारती, सुशील मोदी, बीएस येदियुरप्पा जैसे तमाम नेता जैसे तमाम नेता रेस से बाहर हो गए।

वही काम अब नितिन नबीन के जरिए होगा। उनकी उम्र 45 साल है और यह मान कर चलें कि वे छह साल रहेंगे तो हटने के समय उनकी उम्र 51 साल के आसपास होगी। सो, तय मानें कि उस समय जो अध्यक्ष बनेगा वह इसी उम्र के आसपास का होगा। संभव है कि 55 साल से कम उम्र का हो। इससे कितने लोगों का पत्ता साफ हो गया? अध्यक्ष बनने के जितने दावेदार हैं। धर्मेंद्र प्रधान से लेकर भूपेंद्र यादव, विनोद तावड़े आदि सबकी संभावना खत्म हुई। नितिन नबीन के अध्यक्ष बनने के बाद का घटनाक्रम देखें तो बहुत साफ दिख रहा है कि वे दो श्रेणी के नेताओं के यहां मिलने गए। इनमें मार्गदर्शक मंडल वाले मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता हैं तो भाजपा की पहली पंक्ति वाले नेता हैं राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी आदि हैं। बाकी सारे नेता या तो हवाईअड्डे पर उनके स्वागत के लिए खड़े थे या पार्टी मुख्यालय में गुलदस्ता लेकर उनके स्वागत के लिए खड़े थे। सो, अब भाजपा के नेता कयास लगा रहे हैं कि छह साल के बाद किसकी लॉटरी निकल सकती है। लेकिन कोई किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकता है।

नितिन नबीन को अध्यक्ष बनाने से एक और बदलाव हुआ है। भाजपा ने परिवारवाद को स्वीकार करने की दिशा में एक कदम और बढ़ा दिया है। पहले कहा जाता था कि भाजपा ऐसी पार्टी है, जिसमें कोई भी सामान्य नेता या कार्यकर्ता अध्यक्ष बन सकता है, जबकि कांग्रेस में यह पद आरक्षित है। तो कांग्रेस ने उधर परिवार से बाहर और पहली पीढ़ी के राजनेता मल्लिकार्जुन खड़गे को अध्यक्ष बनाया। वही भाजपा ने अब अपनी पार्टी के नेता की दूसरी पीढ़ी के व्यक्ति को अध्यक्ष बनाया। यह बदलाव मामूली नहीं है। नितिन नबीन के पिता नवीन किशोर सिन्हा भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से थे। उन्होंने 1974 के जेपी आंदोलन में हिस्सा लिया था। एक समय बिहार में भाजपा के सबसे बड़े नेताओं में गिने जाते थे। अपने पिता की विधानसभा सीट से विधायक बन कर उनकी विरासत संभाल रहे नितिन नबीन को भाजपा ने अध्यक्ष बना कर यह संदेश दिया कि अब भाजपा के पुराने नेताओं के बच्चे सर्वोच्च पद पर पहुंच सकते हैं। अगर धर्मेंद्र प्रधान अध्यक्ष बनते तब भी यह बदलाव देखने को मिलता क्योंकि उनके पिता देवेंद्र प्रधान भी भाजपा के बड़े नेता थे। वे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री भी थे।

अब तक भाजपा इससे बचती थी। अपने किसी नेता के परिवार के सदस्यों को मुख्यमंत्री बनाने से भाजपा इनकार करती रही है और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के बारे में तो सोचा भी नहीं जा सकता था। लेकिन नितिन नबीन से यह सिद्धांत बदला है। अब अनुराग ठाकुर उम्मीद कर सकते हैं कि वे अगली बार अध्यक्ष बन जाएं, प्रवेश साहेब सिंह वर्मा और बांसुरी स्वराज भी उम्मीद कर सकते हैं। गोपीनाथ मुंडे और प्रमोद महाजन की बेटियां भी भाजपा के सर्वोच्च पद पर पहुंचने की उम्मीद कर सकती हैं। पीढ़ीगत परिवर्तन की वजह से तेजस्वी सूर्या और के अन्नामलाई जैसे नेता अब रेस में आ गए हैं। हालांकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के यहां यह देखने को मिला है कि जिनके नाम की ज्यादा चर्चा होती है उनको कुछ नहीं मिलता है। अगर आगे उन्हीं का नेतृत्व कायम रहता है तो फिर सारे नाम, जिनके कयास लगाए जा रहे हैं, बेमानी हैं।

एक बदलाव यह भी हुआ है कि संगठन के न्यूनतम अनुभव के बावजूद किसी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता है। नितिन नबीन का संगठन का कुल जमा अनुभव यह है कि वे भारतीय जनता युवा मोर्चा में अनुराग ठाकुर की टीम में थे और उसी मोर्चा के बिहार के अध्यक्ष भी रहे। उसके अलावा सिक्किम के प्रभारी और छत्तीसगढ़ के प्रभारी व सह प्रभारी रहे। इससे पहले जेपी नड्डा को भी हिमाचल प्रदेश की राजनीति से निकाल कर लाया गया था लेकिन वे पहले महासचिव बने थे। संसदीय बोर्ड के सदस्य बने थे। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के प्रभारी रहे और केंद्रीय मंत्री रहे तब राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। अमित शाह भी गुजरात से आकर उत्तर प्रदेश के प्रभारी बने थे। उनसे पहले नितिन गडकरी महाराष्ट्र प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रहे थे और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से राजनीति शुरू की थी। नितिन नबीन दिल्ली और रांची में पढ़ाई कर रहे थे, जहां से अपने पिता की विरासत संभालने पहुंचे थे।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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