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फर्क उत्तर बनाम दक्षिण भारत का!

मुझे विश्वास नहीं हुआ। इसलिए मैंने खबर को कई तरह से चेक किया। खबर सच थी। भारत में एक ऐसा मुख्यमंत्री हुआ है, जो किताबें पढ़ता है! इनका नाम है वीडी सतीशन। केरल के नए मुख्यमंत्री। उन्होंने सन् 2025 में अपनी पढ़ी 60 किताबों की सूची सार्वजनिक की थी। उनमें अरुंधति रॉय, अमिताव घोष, गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ पर संस्मरण, पर्यावरण, राजनीति, समाज और मनोविज्ञान की किताबें थीं। उन्होंने एक किताब ‘The Menopause Brain’ के बारे में कहा कि उससे महिलाओं को लेकर उनका नजरिया बदला।

क्या यह आज के उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत का सत्य नहीं है? कांग्रेस जब राज में थी तब उत्तर भारत के नेता, प्रधानमंत्री भी किताबें पढ़ते थे। नेहरू की रात 11-12 बजे किताब पढ़ते-पढ़ते ही सोने की आदत थी। पीवी नरसिंह राव और डॉ. मनमोहन सिंह भी पढ़ते थे। मुझे उन मुख्यमंत्रियों के भी नाम याद हैं जो पढ़ने, लिखने, खुद फाइल नोट बनाने, डिक्टेट करने और फाइलों पर दस्तखत करते थे। वे किताबें पढ़ते थे और कईयों ने सचमुच अपने दिमाग से किताबें भी लिखीं, लिखवाई नहीं।

तब भारत में राजनीतिक संस्कृति जिंदा थी। आज उत्तर भारत में किताब लगभग संदिग्ध वस्तु बन चुकी है। नेता जितना कम पढ़ता है, उतना “जमीन से जुड़ा” माना जाता है। नेता की पहचान अब उसके पढ़ने, उसकी बुद्धि से नहीं, उसकी भीड़ जुटाने की क्षमता से बनी होती है। तब आज जैसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री नहीं थे जो निरक्षर की तरह न नोट्स लिखते हैं, न खुद लिखकर फाइल पर निर्देश देते हैं और न ही फाइल पर दस्तखत करते हैं! मेरा मानना है 25-50 साल बाद जब प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल के दस्तावेज अभिलेखागार के जरिए लोगों की पहुंच में होंगे तो दुनिया यह देख हैरान होगी कि बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न तो कभी किसी फाइल पर दस्तखत किए हैं, न कैबिनेट बैठकों में किसी संकट विशेष में मंत्रियों की बहस हुई। ले-देकर सारा काम, सारे दस्तखत उनकी ओर से प्रमुख सचिव, कैबिनेट सचिव और अफसरों के दस्तखतों और उनकी बनाई सपाट मिनट्स में अंकित हैं।

अब प्रदेश मुख्यमंत्रियों के दफ्तरों से भी यह सुनने को मिल रहा है कि विभागों के डायरेक्टर, सचिव चैटजीपीटी को कमांड देकर पूछते हैं, बाकी राज्यों से तुलना की कमांड देकर एआई मशीन से नोट बनवाते हैं कि फलां मसले में हमारी सरकार क्या करे, इसका नोट बनाकर दें। अफसर फिर अपनी वाह बनवाते हुए उसे कैबिनेट में विचारार्थ रखवा देता है। और मंजूरी, नई नीति, योजना, आदेश का काम संपन्न। मतलब कैबिनेट बैठक में लीडर बोले (वैसे इसमें भी प्रमुख सचिव, कैबिनेट सचिव ब्रीफ दे देता है) और मंत्री गर्दन हिलाकर सहमति देते हैं। मतलब शासन का नया फैसला! तय मानिए भारत की व्यवस्था में वह दिन दूर नहीं जब भारत सरकार (मतलब विदेश, गृह, वित्त, रॉ, आईबी, राष्ट्रीय सुरक्षा आदि सहित पूरी भारत सरकार) पूरी तरह एआई, चैटजीपीटी एजेंट के अलग-अलग मॉडल से चलने लगे।

बहरहाल, विषयांतर हुआ। असल बात पढ़ने वाले सतीशन का केरल का मुख्यमंत्री बनना है। यों जिस कम्युनिस्ट नेता पिनरायी विजयन को सतीशन ने हराया है, उन्होंने भी केरल में बतौर मुख्यमंत्री “रीडिंग कल्चर” को सामाजिक रूप से मजबूत बनाया। विजयन हमेशा किताब मेलों, साहित्यिक आयोजनों और शिक्षा अभियानों से जुड़े रहे। इससे भी उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत का फर्क जाहिर है।

हम हिंदीभाषियों (खासकर भाजपाई, संघ परिवार के भक्त हिंदीभाषियों को) को अहसास ही नहीं है कि उत्तर भारत में वोट के चक्कर में दिमाग को कैसे गोबर में बदलने का महाअभियान चला हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह (जिन पर हिंदी का जिम्मा है) ने हिंदीभाषी लोगों को अज्ञानी, झूठा, भक्त, गुलाम बनाने के लिए अखबार, किताब, सोशल मीडिया, हिंदी पाठ्यपुस्तकों को खत्म या भ्रष्ट करने का ऐसा जेहादी अभियान चला रखा है, जिससे सनातन सभ्यता में सत्य का सत्व-तत्व बूंद भर न बचे और विवेक, तर्क, शास्त्रार्थ, सत्य सभी गंगा में बह जाएं, लुप्त हो जाएं।

केरल में पुस्तकें सामाजिक शक्ति हैं। लोग किताब पढ़ते हैं। मलयाली अखबार आज भी संपादकीय, वैचारिक, बेबाक लेख लिए होते हैं। केरल हिंदू, वामपंथी, सेकुलर और फ्री थिंकर सभी तरह के विचारों से भरपूर, हरा-भरा है। पढ़ना समाज की आदत है। लाइब्रेरी आंदोलन वहां राजनीति जितना ही बड़ा सामाजिक आंदोलन था। आज भी “रीडिंग मंथ” मनाया जाता है। स्कूलों में बच्चे घर-घर से किताबें इकट्ठा करके लाइब्रेरी बनाते हैं। गांव “बुक विलेज” कहलाते हैं। विधानसभा भी इंटरनेशनल बुक फेस्टिवल आयोजित करती है। ध्यान रहे, 1940 के दशक में पी एन पनिक्कर ने ग्रंथशाला आंदोलन शुरू किया था। गांव-गांव में किताबें सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनीं। केरल में लोग मानते हैं किताब केवल साहित्य नहीं, लोकतंत्र की बुनियादी मशीनरी है। संस्कृति की आत्मा किताब पढ़ना बुद्धि, विवेक, राजनीति, है।

कम्युनिस्ट राजनीति ने केरल में पढ़ने को (सोचें, भाजपा-संघ परिवार पर) “कैडर निर्माण” का हिस्सा बनाया। चर्च ने शिक्षा को सामाजिक उन्नति का माध्यम बनाया। यह भी वजह थी जो लोग बेइंतहां खाड़ी देशों में गए। लाइब्रेरी आंदोलन ने गांव तक किताब पहुंचाई। इन सबने ऐसा समाज बनाया, जहां राजनीति बहस से चलती है, नारे, जुमलों और भक्ति से नहीं।

कहते हैं मलयाली टीवी डिबेट हिंदी न्यूज चैनलों की तरह जंग के मैदान नहीं होते। लोग लंबी राजनीतिक बहस सुनते हैं। अखबार भी पढ़ते हैं और संपादकीय पर भी चर्चा होती है। वहां हर नेता बौद्धिक विश्वसनीयता चाहता है। तभी आश्चर्य नहीं जो केरल देश के सभी राज्यों से बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक शुचिता, मानव विकास की कसौटियों में भारत का गौरव है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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