उत्तर भारत की गोबरपट्टी और दक्षिण का अंतर जीवन के हर क्षेत्र में देखने को मिलता है। राजनीति और नेताओं की वजह से कितना अंतर आ जाता है इसको शिक्षा और संस्कृति के मामले में देख सकते हैं तो आर्थिक, औद्योगिक विकास में भी देख सकते हैं। जनसंख्या नियंत्रण एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें यह अंतर सबसे ज्यादा है। उत्तर भारत के हिंदी भाषी राज्यों में इस बात का रोना है कि आबादी बहुत ज्यादा है और इसलिए लोकसभा व विधानसभा की सीटें ज्यादा चाहिए। सोचें, ज्यादा सांसद और विधायक बना देने से जैसे बड़ी आबादी का कल्याण हो जाएगा! आबादी ज्यादा है तो स्कूल और अस्पताल ज्यादा होने चाहिए, डॉक्टर और शिक्षक ज्यादा होने चाहिए, हवाईअड्डे और रेलवे स्टेशन ज्यादा होने चाहिए, सरकारी कर्मचारियों की संख्या ज्यादा होनी चाहिए और रोजगार के अवसर ज्यादा होने चाहिए।
लेकिन उसकी मांग नहीं होती है। मांग हो रही है कि परिसीमन करके सांसदों और विधायकों की संख्या बढ़ाई जाए। दूसरी ओर दक्षिण भारत के राज्यों ने आबादी पर नियंत्रण किया और आर्थिक व औद्योगिक विकास ज्यादा किया तो उनके यहां रोजगार और प्रति व्यक्ति आमदनी से लेकर हर तरह की खुशहाली है। लेकिन इस आधार पर उनकी राजनीतिक ताकत कम करने की कोशिशें चल रही हैं।
बहरहाल, नेताओं की सोच अलग होने और राजनीति अलग होने का एक सबूत यह भी है कि अखिल भारतीय परीक्षाओं में जहां आए दिन पेपर लीक होते हैं और परीक्षा केंद्र मैनेज किए जाते हैं वहीं दक्षिण में ऐसी घटनाएं शायद ही कभी सुनने को मिलें। वहां शिक्षा को पवित्र माना जाता और उसकी शुचिता का ख्याल रखा जाता है। वहां लोगों को सुंदर पिचाई और सत्या नडेला पैदा करना होता है। पेपर लीक करने के मास्टरमाइंड हिंदी पट्टी में पाए जाते हैं। अभी मेडिकल में दाखिले की नीट परीक्षा का पेपर लीक हुआ। बताया गया कि केरल से पेपर लीक हुआ है।
जांच हुई तो पता चला कि राजस्थान का एक छात्र जो केरल में मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था उसने क्वेश्चन बैंक अपने किसी जानकार को भेजा था। उस क्वेश्चन बैंक में तीन सौ सवाल थे, जिनमें से डेढ़ सौ सवाल हूबहू नीट के पेपर में आ गए। इससे पहले 2024 में भी नीट का पेपर लीक हुआ था तो उसका केंद्र बिहार और झारखंड में था और परीक्षा केंद्र मैनेज करने का काम गुजरात के गोधरा में हो रहा था। सोचें, जब से नरेंद्र मोदी की सरकार ने एक देश, एक शिक्षा का नारा देकर एनटीए के जरिए परीक्षाओं का आयोजन शुरू किया है, आए दिन कुछ न कुछ गड़बड़ी होती है।
तमिलनाडु सरकार लगातार इसका विरोध करती रही है। तमिलनाडु का कहना है कि उनके यहां पहले की तरह अपनी बोर्ड परीक्षा के आधार पर मेडिकल कॉलेजों में दाखिला देने दिया जाए। दक्षिण भारत के सभी राज्यों ने अपने यहां शानदार मेडिकल कॉलेज बनाए हैं और पढ़ाई की बहुत अच्छी व्यवस्था की है। इंजीनियरिंग में भी इन राज्यों का प्रदर्शन देश के बाकी हिस्सों से बेहतर रहा। तभी अमेरिका की सिलिकन वैली में भी भारत की पहचान इन्हीं राज्यों के पेशेवरों की वजह से है।
सभी राज्यों ने अपने को किसी न किस खास क्षेत्र में अपनी तरह का म़ॉडल बना कर विकास किया। केरल सौ फीसदी साक्षरता और शानदार मेडिकल फैसिलिटी वाला प्रदेश है और यह कोरोना काल में दिखा भी था। कोविड महामारी का सबसे बेहतर प्रबंधन अगर किसी राज्य में किया तो वह केरल था। लेकिन ऐसा नहीं है कि बाकी राज्य पीछे थे। गोबरपट्टी की तरह दक्षिण के राज्यों में ऑक्सीजन की कमी से तड़पते लोगों की हृदयविदारक तस्वीरें नहीं आ रही थीं। लावारिस लाशें वहां की पवित्र नदियों में नहीं बहाए जा रहे थे। यह भी ध्यान रखने की जरुरत है। उनके यहां कावेरी, कृष्णा, गोदावरी जैसी अनेक पवित्र नदियां हैं लेकिन किसी नदी की वैसी दुर्दशा नहीं है, जैसी गोबरपट्टी में गंगा, यमुना जैसी नदियों की है।
वहां लोग अपनी भाषा, संस्कृति के साथ साथ अपनी नदियों का भी ख्याल रखते हैं। केरल ने स्वास्थ्य सुविधाओं में ऐसा विकास किया है कि वहां की लाखों नर्सें देश और दुनिया के अलग अलग हिस्सों में काम करती हैं। वहां इससे फर्क नहीं पड़ता है कि पांच साल के बाद किसकी सरकार आएगी। 2021 के चुनाव को छोड़ दें तो केरल में हर पांच साल में सत्ता बदलती रहती है और यह भी ध्यान रखने की जरुरत है कि ज्यादा समय तक डबल इंजन की सरकार नहीं रही है। फिर भी केरल विकसित होता रहा। केरल की नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के ज्यादातर राज्य इस डबल या ट्रिपल इंजन की सरकार के मिथक को तोड़ते हैं।
इन राज्यों में डबल इंजन की सरकार नहीं होने के बावजूद प्रति व्यक्ति शिक्षकों, डॉक्टरों, अस्पताल के बेड आदि की उपलब्धता बाकी राज्यों से ज्यादा है। प्रति व्यक्ति आमदनी में भी ये राज्य काफी आगे हैं। ऐसा राजनीति और नेताओं के फर्क की वजह है। इन राज्यों में चाहे जिस पार्टी की सरकार बने और चाहे जो मुख्यमंत्री बने। उसका पहला लक्ष्य अपने राज्य के लोगों का विकास करना होता है। वे इस सूत्र वाक्य के साथ राजनीति करते हैं कि हमारे राज्य की जनता का जीवन अच्छा हो। राजनीतिक सोच के इस फर्क की वजह से दक्षिण के राज्यों ने हर क्षेत्र में ज्यादा विकास किया है।


