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मीडिया, नौकरशाही में भ्रष्टाचार नहीं है!

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इस पहेली को सुलझाया जा रहा है कि एनसीईआरटी ने आठवीं क्लास के बच्चों को न्यायपालिका मे भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाने का फैसला किया तो शासन के बाकी अंगों या लोकतंत्र के बाकी स्तंभों के बारे में क्यों नहीं कुछ सोचा? क्या एनसीईआरटी की किताब तैयार करने वाली कमेटी की नजरों में लोकतंत्र के बाकी तीन स्तंभ पाक साफ हैं? उनके यहां भ्रष्टाचार नहीं है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि पर्ची निकाल कर तय किया गया कि पहले न्यायपालिका का भ्रष्टाचार पढ़ाया जाएगा और उसके बाद बाकी स्तंभों के भ्रष्टाचार के बारे में बताया जाएगा? क्योंकि दुनिया भर में प्रेस फ्रीडम को लेकर काम करने वाली ज्यादातर संस्थाओं ने भारत में मीडिया कि रेटिंग काफी नीचे रखी है। भारत में मीडिया की विश्सनीयता भी बाकी संस्थाओं से कम है। सत्ता पक्ष के नेताओं ने सरकार पर सवाल उठाने वालों को टुकड़े टुकड़े गैंग और अर्बन नक्सल का टैग दे दिया तो दूसरी ओर विपक्ष ने सरकार का समर्थन करने वालों को गोदी मीडिया या भक्त मीडिया का टैग दे दिया। इसका मतलब है कि किसी की नजर में मीडिया विश्वसनीय नहीं है। लेकिन एनसीईआरटी ने मीडिया में भ्रष्टाचार या कंप्रोमाइज को लेकर पाठ नहीं तैयार किया।

इसी तरह जिस दिन ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक अध्याय को लेकर विवाद शुरू हुआ उसी दिन अखबारों के पहले पन्ने पर ओडिशा के माइंस डिपार्टमेंट के एक डिप्टी डायरेक्टर के यहां विजिलेंस विभाग की कार्रवाई की खबर थी। खबर के साथ तस्वीरें भी थीं, जिसमें चारों तरफ नोट ही नोट दिखाई दे रहे थे। डिप्टी डायरेक्टर स्तर के अधिकारी के यहां छापे में चार करोड़ रुपए नकद बरामद हुए। इसके अलावा जमीन और फ्लैट के कागजात और जेवर आदि अलग से बरामद हुए। ऐसा नहीं है कि यह कोई अपवाद वाली खबर थी। यह सबसे रूटीन की खबर है। किसी क्लर्क के यहां या किसी चपरासी के यहां छापे में लाखों, करोडों रुपए की जब्ती बहुत आम बात है। बड़े नौकरशाह तो अरबों के आसामी होते हैं। फिर भी नौकरशाही में भ्रष्टाचार का अध्याय नहीं जोड़ा गया। क्या एनसीईआरटी की नजर में अधिकारी भी पवित्र गाय हैं?

प्रेस और कार्यपालिका के अलावा लोकतंत्र का सबसे प्रमुख स्तंभ विधायिका है। देश में आठ सौ से कुछ कम सांसद और चार हजार से कुछ ज्यादा विधायक हैं। पिछले दिनों कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी के एक विधायक पांच लाख रुपए की रिश्वत लेते गिरफ्तार हुए। देश की हर पार्टी के कुछ न कुछ नेता किसी न किसी मामले में आरोपी हैं। जो जितना बड़ा नेता है उसके ऊपर उतने ज्यादा रुपए के घोटाले के आरोप हैं। अगर किसी किताब में विधायिका यानी विधायकों और सांसदों के भ्रष्टाचार का चैप्टर शामिल किया जाए तो देश के लोग आंख मूंद कर उस पर भरोसा करेंगे। लेकिन एनसीईआरटी ने विधायकों, सांसदों यानी विधायिका में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बच्चों के स्कूल में अध्याय नहीं प्रकाशित कराया।

तभी बड़ी हैरानी की बात है कि सिर्फ न्यायपालिका को क्यों चुना गया? अगर लॉटरी या पर्ची निकाल कर यह फैसला नहीं हुआ कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार शीर्षक से किताब में अध्याय शामिल करना है और यह काम केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय, एनसीईआरटी और उसकी बनाई कमेटी ने नहीं किया तो निश्चित रूप से इसके पीछे किसी विदेशी साजिश के पहलू से सरकार को जांच करानी चाहिए। सरकार को कोई टूलकिट तलाशना चाहिए। विपक्षी पार्टी पर आरोप लग सकते हों तो उसको ही जिम्मेदार ठहराना चाहिए। ऐसा कहने का कारण यह है कि प्रधानमंत्री से लेकर शिक्षा मंत्री और एनसीईआरटी के निदेशक तक सब यही कह रहे हैं कि पता लगाओ किसने ऐसा किया!

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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