नरेंद्र भाई मोदी की लोकप्रियता इस समय अपने निम्नतम स्तर पर है। भाजपा के लिए समर्थन तो और भी बहुत नीचे चला गया है। लेकिन इस के बावजूद योगी आदित्यनाथ को हराना अगर ख़ाला जी का खेल नहीं है। सपा और कांग्रेस अगर अलग-अलग लड़े तो तय मानिए कि योगी सवा दो सौ सीटों का आंकड़ा छुएंगे। अगर उन्हें 160 के आसपास रोकना है तो सपा-कांग्रेस की एकजुटता ज़रूरी है।
मैं इसे अखिलेश यादव के सियासी सोच का छोटापन मानता हूं कि उन्होंने गोरखपुर या बनारस के बजाय रायबरेली से अपनी यात्रा शुरू करना बेहतर समझा। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के पांच महीने पहले भी अगर उन के मन की परतें इस तरह गुंथी हुई हैं तो यह कोई सुखद लक्षण नहीं हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में 37 सीटें जीत लेने के बाद समाजवादी पार्टी के पैरों में पंख लगना स्वाभाविक है। लेकिन अखिलेश को समझना चाहिए कि अपने परों को तौले बिना आसमान में छलागं लगा देने के उपक्रम में औंधे मुंह गिरने की संभावनाएं भी बढ़ जाती हैं।
2022 के चुनाव में रायबरेली की 6 सीटों में से 4 पर समाजवादी पार्टी जीती थी। बाकी 2 भाजपा को मिली थीं। कांग्रेस को तो वहां एक भी सीट नहीं मिली थी। लेकिन जन-मन में रायबरेली पारंपरिक तौर पर आज भी कांग्रेस का ही गढ़ माना जाता है। 2027 का चुनाव सपा और कांग्रेस मिल कर लड़ेंगे, यह तो तय-सा है। कम-से-कम कांग्रेस को अपनी तरफ़ से साफ़ कर चुकी है कि वह सपा से मिल कर ही लड़ना चाहती है। मगर इसे ले कर अभी थोड़ी दबाव की राजनीति चल रही है कि सपा और कांग्रेस में से कौन कितनी-कितनी सीटें लड़ेंगे।
शायद इसीलिए अखिलेश यादव को लगा होगा कि अगर वे रायबरेली के बछरांवा से अपनी यात्रा षुरू करेंगे तो उन्हें यह दिखाने का मौका मिलेगा कि राहुल के निर्वाचन क्षेत्र में भी सपा अगर इतनी मजबूत है तो बाकी उत्तर प्रदेष में तो बात ही अलग है। संदेश है कि इस वज़ह से कांग्रेस को बहुत ज़्यादा सीटें लेने का आग्रह नहीं करना चाहिए। कांग्रेस के कुछ शूरवीरों ने बात चूंकि बराबर-बराबर सीटें यानी दो-दो सौ पर लड़ने से षुरू कर दी तो अखिलेष ने कांग्रेस को उस की असली स्थिति का अहसास कराने के लिए यह यात्रा राहुल के निर्वाचन क्षेत्र से षुरू करनी तय कर लिया।
इस तथ्य से कौन इनकार कर सकता है कि पिछले चुनाव में कांग्रेस को उत्तर प्रदेष में महज़ दो सीटें और सिर्फ़ सवा दो प्रतिषत वोट मिले थे। लेकिन यह भी तो तथ्य है कि रायबरेली से 2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को 6 लाख 90 हज़ार वोट से जीते हैं। भारतीय जनता पार्टी वहां से 3 लाख 90 हज़ार वोट से हारी थी। एक और बात ध्यान रखने की है कि उत्तराखंड के अलग होने के बाद से उत्तर प्रदेष में जो पांच चुनाव हुए हैं, उन में कभी कम, कभी ज़्यादा, मगर कांग्रेस को औसतन 8 प्रतिषत वोट मिलते रहे हैं। पिछले दो साल में राहुल की सक्रियता ने, युवाओं में उन के प्रति पैदा हुए जबरदस्त उत्साह ने और नरेंद्र भाई मोदी-अमित भाई षाह की पूरी तरह निरंकुश कार्यशैली से जूझते रहने की उन की अनवरतता ने 2029 चुनावों के मद्देनज़र राहुल को जनमानस में उस चेहरे की तरह स्थापित कर दिया है, जो मौजूदा विपक्ष के सत्ता में आने पर प्रधानमंत्री होगा।
अखिलेश क्या यह नहीं समझते होंगे कि रायबरेली में पिछली बार अगर अदिति सिंह और राकेष सिंह चुनाव के पहले कांग्रेस छोड़ कर नहीं जाते तो नतीजे अलग होते। इसलिए अखिलेश को यह बात भी समझनी चाहिए कि उन के लिए यह वक़्त कांग्रेस पर दबाव बनाने के बजाय भाजपा से खुल कर दो-दो हाथ करने का है। मैं अखिलेश को यह भी याद दिलाना चाहता हूं कि उत्तर प्रदेश में चार करोड़ मतदाता 18 से 30 साल की उम्र के हैं और युवाओं के बीच राहुल हर हाल में उन से तो बड़े प्रेरणासªोत हैं। इसलिए अखिलेश की तरफ़ से ऐसा कोई काम नहीं होना चाहिए, जिस से मतदाताओं को कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच तारतम्यता की कमी महसूस होने लगे। बाकी वे जानें! मैं मानता हूं कि कांग्रेस के लिए भी यह समय दो सौ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का दुराग्रह करने का नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 40 सीटों पर आगे रही है। इस हिसाब से उसे सौ-सवा सौ सीटों के आसपास संतोश करना चाहिए।
नरेंद्र भाई मोदी की लोकप्रियता इस समय अपने निम्नतम स्तर पर है। भाजपा के लिए समर्थन तो और भी बहुत नीचे चला गया है। लेकिन इस के बावजूद योगी आदित्यनाथ को हराना अगर ख़ाला जी का खेल नहीं है। सपा और कांग्रेस अगर अलग-अलग लड़े तो तय मानिए कि योगी सवा दो सौ सीटों का आंकड़ा छुएंगे। अगर उन्हें 160 के आसपास रोकना है तो सपा-कांग्रेस की एकजुटता ज़रूरी है। राहुल और अखिलेष दोनों ही इस वास्तविकता से ज़रूर वाकिफ़ होंगे और हम उम्मीद करें कि उन्हें नाहक ही चने के झाड़ पर चढ़ाने के अगलियों-बगलियों के जालबट्टे में वे दोनों ही नहीं फसेंगे।
उत्तर प्रदेश का इस बार का चुनाव कई कारणों से बहुत महत्वपूर्ण है। उस के नतीजे 2029 के लोकसभा का परिदृश्य तय करेंगे। उत्तर प्रदेश समेत पूरे देष में इस समय विपक्ष की साख अच्छे-ख़ासे उठाव पर है। मतदाताओं का विश्वास भाजपा से उठता जा रहा है। एक बात तो तय है कि कांग्रेस किसी भी हालत में लोकसभा में समाजवादी पार्टी से तो ज़्यादा सीटें ले कर आएगी ही। अपनी अखिल भारतीय उपस्थिति के कारण कांग्रेस लोकसभा में 2029 में विपक्ष का सब से बड़ा राजनीतिक दल भी होगी ही। सरकार बनी तो उस की अगुआई का मौक़ा कांग्रेस को ही मिलेगा। अखिलेश को सियासत के इन सभी आयामों के मद्देनज़र अभी से अपनी रणनीति तय करनी चाहिए।
2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों पर भी अखिलेश को एक बार ठीक से निग़ाही डाल लेनी चाहिए। में भाजपा 75 सीटों पर लड़ी और 33 जीती। उसे साढ़े 41 प्रतिशत वोट मिले। समाजवादी पार्टी 62 पर लड़ी और 37 जीती। उसे क़रीब 34 प्रतिशत वोट मिले। कांग्रेस 17 पर लड़ी और 6 जीती। उसे साढ़े 9 प्रतिशत वोट मिले। बहुजन समाज पार्टी 79 पर लड़ी और एक भी नहीं जीती। उसे सवा 9 प्रतिशत वोट मिले। कांग्रेस को मिले कुल वोट भी और वोट प्रतिशत भी बसपा से ज़्यादा रहा। कांग्रेस को बसपा से क़रीब 75 हज़ार वोट अधिक मिले। एनडीए और इंडिया एलायंस के मतों में सिर्फ़ 0.17 प्रतिशत का फर्क रहा। एनडीए को 43.69 और इंडिया को 43.52 प्रतिशत वोट मिले। इंडिया समूह को भाजपा से क़रीब 15 लाख वोट ज़्यादा मिले।
2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन विधानसभा की 224 सीटों पर आगे रहा। एनडीए सिर्फ 174 पर आगे रहा। यानी इंडिया-समूह को 50 सीटों की बढ़त थी। सपा 184 विधानसभा सीटों पर और कांग्रेस 40 पर आगे रही। भाजपा अकेले 153 पर ही आगे रही। बसपा एक पर भी नहीं। इंडिया-समूह और भाजपा में तो 71 सीटों का अंतर रहा। अखिलेश को अपना सारा ध्यान इस मुद्दे पर केंद्रित करना चाहिए कि 2022 के विधानसभा चुनाव में 255 सीटें जीतने वाली भाजपा 2024 में 153 सीटों पर पर ही आगे रही है। यानी 102 सीटों का घाटा हुआ है। 111 सीटें जीतने वाली सपा 184 सीटों पर आग रहीे। यानी उसे 73 सीटों का फायदा हुआ है। कांग्रेस पिछले विधानसभा चुनाव में सिर्फ़ 2 पर जीती थी। मगर अब 40 पर आगे है। यानी उसे 38 सीटों का फायदा हुआ है। सो, उम्मीद करें कि राहुल-अखिलेश अपने अश्वमेध के रथ पर अगले पांच महीने नज़रबट्टू टांगे रखेंगे।
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