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2023 में विपक्ष का सवाल

सितंबर 2023 में विपक्ष ने सवाल किया था कि सरकार 2024 के चुनाव में ही महिला आरक्षण क्यों नहीं लागू कर देती? तब कहा गया कि जनगणना होगी और परिसीमन होगा तब महिला आरक्षण लागू करेंगे। यानी उस समय इस बात को जस्टिफाई किया गया कि 2024 में नहीं हो सकता है। इसे 2029 या 2034 में लागू किया जाएगा। उस समय इस बात को जस्टिफाई किया गया और अब इस बात को जस्टिफाई किया जा रहा है कि महिला आरक्षण के लिए जनगणना की जरुरत नहीं है। 2011 के आंकड़े पर ही महिला आऱक्षण लागू कर देंगे। सरकार चाहती है कि जैसे लोगों ने पहली बात पर यकीन कर लिया वैसे ही इस बात पर भी यकीन करे। सरकार को महिलाओं का हितैषी और विपक्ष को महिला विरोधी माने। लेकिन इस बार विपक्ष सजग था। विपक्ष को पता था कि परिसीमन का प्रोजेक्ट लंबे समय में देश की राजनीति को पूरी तरह से बदल कर रख देगा। लोकसभा में चर्चा के दौरान विपक्षी सांसदों ने यह चिंता जताई। उनको पता है कि परिसीमन में सरकार अपने हिसाब से सीटों को एडजस्ट करेगी। भूगोल और जनसंख्या दोनों का ऐसा एडजस्टमेंट होगा कि विपक्ष के लिए चुनाव जीतने की संभावनाएं वैसे ही कम होती जाएंगी, जैसे परिसीमन वाले दूसरे राज्यों में हुआ है। गुजरात मे पहले हुआ था और जम्मू कश्मीर व असम में बाद में हुआ है। सो, विपक्ष ने सरकार की योजना को पंक्चर किया।

यह किस स्तर की कुटिलता थी उसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि जिस नारी शक्ति वंदन कानून को सितंबर 2023 में पास किया गया था उसे गुरुवार, 16 अप्रैल को अधिसूचित किया गया। सोचें, एक तरफ सरकार ने नारी शक्ति वंदन कानून को अधिसूचित किया और दूसरी ओर उसमें संशोधन के लिए बिल संसद में पेश किया। इसका अर्थ यह है कि अगर बिल पास हो जाता है तो ठीक नहीं और अगर नहीं पास होता है तो पुराना वाला बिल कानून की शक्ल में लागू रहेगा। वही हुआ। विपक्ष ने बिल तो पास नहीं होने दिया लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि परिसीमन नहीं होगा। परिसीमन का फैसला तो हो चुका है। विपक्ष ने 2023 में इसकी मंजूरी दे दी थी। अब सरकार इस साल और अगले साल के चुनाव में विपक्ष को महिला विरोधी बताएगी और जल्दबाजी में जनगणना के आंकड़े जारी करके उसके आधार पर परिसीमन कराएगी। यह तय मानना चाहिए कि 2029 के चुनाव से पहले सरकार परिसीमन का काम भी कराएगी। उसको पता है कि अगर परिसीमन नहीं हुआ तो 2029 का चुनाव मुश्किल हो सकता है।

By हरिशंकर व्यास

मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक और पत्रकार। नया इंडिया समाचारपत्र के संस्थापक-संपादक। सन् 1976 से लगातार सक्रिय और बहुप्रयोगी संपादक। ‘जनसत्ता’ में संपादन-लेखन के वक्त 1983 में शुरू किया राजनैतिक खुलासे का ‘गपशप’ कॉलम ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ तक का सफर करते हुए अब चालीस वर्षों से अधिक का है। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम की प्रस्तुति। सप्ताह में पांच दिन नियमित प्रसारित। प्रोग्राम कोई नौ वर्ष चला! आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों की बारीकी-बेबाकी से पडताल व विश्लेषण में वह सिद्धहस्तता जो देश की अन्य भाषाओं के पत्रकारों सुधी अंग्रेजीदा संपादकों-विचारकों में भी लोकप्रिय और पठनीय। जैसे कि लेखक-संपादक अरूण शौरी की अंग्रेजी में हरिशंकर व्यास के लेखन पर जाहिर यह भावाव्यक्ति -

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