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श्रुति व्यास

चीन की आर्थिकी को वायरस!

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ड्रेगन लस्त-पस्त हो चला है। चीन की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है। उसके उद्यमों का कुल क़र्ज़ देश की जीडीपी से भी ज्यादा हो गया है। रियल एस्टेट कारोबार ढह रहा है। वहां के प्रापर्टी बाज़ार के शहंशाह एवरग्रांड की हालत उसके दो बड़े अधिकारियों की हिरासत के बाद से खराब है। ब्याज दरें घटाने के बाद भी उद्यमी क़र्ज़ नहीं ले रहे हैं। और धन के प्रवाह के डाटा से पता चलता है कि चीनी कारोबारों के वित्तीय घाटे में हाल के वर्षों में गिरावट आई है। खबरों के अनुसार कम से कम बैलेंसशीट की दृष्टि से चीन मंदी की गिरफ्त में जा चुका है। बूढ़ी होती जनता और अन्य देशों से तनावपूर्ण रिश्तों के बीच चीन के लिए चारों तरफ अँधेरा नजर आ रहा है। इसके नतीजे में चीन की अर्थव्यवस्था पर जनता का भरोसा अपने सबसे निचले स्तर तक पहुंच चुका है। वे खर्च करने और निवेश करने दोनों में हिचकिचा रहे हैं। इसकी बजाए अपना पैसा बैंक में रखना पसंद कर रहे हैं। वे रियल एस्टेट खरीदना नहीं चाहते, जो एक समय अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था। एवरग्रांड पहले से ही दिवालियेपन की कगार पर है, और अन्य प्रापर्टी डेवलपर भी इसी दिशा में बढ़ रहे हैं। प्रापर्टी डेवलपर्स के शेयरों में 7.1 प्रतिशत की गिरावट आ गई है।

चीन के विकास का श्रेय काफी हद तक रियल एस्टेट व्यापार को दिया जा सकता है। प्रापर्टी व्यवसाय का चीन की अर्थव्यवस्था में 30 प्रतिशत का योगदान था, जो रोजगार का बड़ा जरिया था और जिसमें चीन का मध्यम वर्ग अपनी बचत का निवेश करता था। स्थानीय सरकारों को भी ज़मीन की खरीदी-बिक्री से राजस्व मिलता था। इस तरह प्रापर्टी व्यवसाय, बैंकिग क्षेत्र और स्थानीय सरकारों के कर्जे एक दूसरे से जुड़े हुए थे। इस संकट के आने के पहले कई वर्षों तक ज़मीनों के बिकने से प्राप्त होने वाली राशि स्थानीय सरकारों की आय का सबसे बड़ा हिस्सा होती थी जिसका कुल आय में योगदान 20 से 30 प्रतिशत के बीच होता था। रियल एस्टेट डेवलपर्स सरकार से जमीन खरीदते थे, जो ज्यादातर मामलों में बैंकों से कर्ज लेकर खरीदी जाती थी।

बैंकों को पता रहता था कि जो क़र्ज़ वे दे रहे हैं वह आसानी से वापस आ जायेगा और चीनी निवेशकों को इसमें निवेश फायदे का सौदा लगता था। स्थानीय सरकारें भी भविष्य में होने वाले भूमि विक्रय के आधार पर कर्ज ले लेती थीं। इस तंत्र से जुड़े व्यक्ति भी एक-दूसरे से जुड़े रहते थेः डेवलपर, बैंककर्मी और सरकारी अधिकारी मिलते-बैठते थे और इसके हर चरण में भ्रष्टचार होता था। यहां तक कि इसे लेकर संगठित अपराध भी होते थे। यह सिर्फ परिवारों द्वारा मकान खरीदने में निवेश तक सीमित नहीं था बल्कि कई कंपनियां, जिनके पास अतिरिक्त धन होता था, वे उसे अपने व्यवसाय में लगाने के बजाए रियल एस्टेट में निवेश करती थीं क्योंकि इसमें बहुत अधिक फायदा होता था।

लेकिन अब देश की जनसंख्या पहले की तरह नहीं बढ़ रही है और कई सालों तक कोविड-19 से जुड़ी सख्त पाबंदियां लगी रहने से चीनी उपभोक्ता आशंकित है। सरकार ने भी रियल एस्टेट के क्षेत्र में जोखिमपूर्ण सौदों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की है। इस सबका मिला-जुला प्रभाव यह हुआ कि रियल एस्टेट डेवलपर्स कर्ज के भारी बोझ तले दबेगए हैं और बिक्री के लिए उपलब्ध मकानों की संख्या खरीदारों की संख्या से ज्यादा हो गयी है। और चीनी सरकार, राज्य के निर्देशन में निवेश और निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्था की बजाए घरेलू उपभोक्ताओं द्वारा खरीददारी पर आधारित अर्थव्यवस्था की ओर जाने का प्रयास कर रही है।

चीनी अधिकारी आम लोगों को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। अब तक सरकारी संस्थाओं के निशाने पर रियल एस्टेट कंपनियां और बैंकों के अधिकारी रहे हैं। लेकिन इस गिरावट के लिए असली दोषी राजनीति है। परंपरागत रूप से अर्थव्यवस्था संबंधी जिम्मेदारियां चीन के दूसरे सबसे शक्तिशाली व्यक्ति प्रधानमंत्री को निभानी होती हैं। और वर्तमान प्रधानमंत्री ली चांग अपेक्षाकृत कमजोर हैं। मार्च में नियुक्त हुए चांग इस पद तक केवल राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मेहरबानी से पहुंचे हैं। देश की संपन्नता कायम रखना उनकी जिम्मेदारी है। लेकिन मोटे तौर यह लक्ष्य अक्सर देश की सुरक्षा के सर्वोच्च लक्ष्य के बाद दूसरे स्थान पर आता है। ली उत्साह से भरे और जानकार व्यक्ति हैं लेकिन वे स्टेट काउंसिल (चीन के मंत्रिमंडल) को केवल पार्टी के विचारों के कार्यान्वयन की एजेंसी के रूप में देखते हैं, विचारों के स्त्रोत के रूप में नहीं। एक समय फलते-फूलते आवासीय सेक्टर के एक बुलबुले की तरह फूटने की स्थिति में आ जाना इसका एक बड़ा उदाहरण है। शी जिनपिंग ने कहा था ‘‘घर रहने के लिए है, सट्टेबाजी के लिए नहीं”।काउंसिल ने राष्ट्रपति की इस टिप्पणी के आधार पर उग्र वैचारिक अभियान शुरू कर दिया।

जब शी जिनपिंग ने सन् 2012 में सत्ता संभाली तब चीन अजेय था, उसकी अर्थव्यवस्था की वृद्धि जबरदस्त गति से हो रही थी। यह वृद्धि आवासीय सेक्टर की बदौलत थी, जो बीजिंग के अधिकारियों के नेतृत्व में नहीं हो रही थी वरन् इसका श्रेय स्थानीय सरकारों को जाता था। लेकिन जैसे-जैसे शी शक्तिशाली होते गए इस माडल की चमक कमज़ोर पड़ने लगी। पहले केन्द्र सरकार द्वारा लगाए गए कड़े वित्तीय प्रतिबंधों के भीतर रहते हुए स्थानीय संस्थाओं के बीच कड़ी प्रतियोगिता होती थी। अब ऐसा नहीं है। शी ने स्थानीय सरकारों पर अधिक सख्त वित्तीय नियम लाद दिए हैं। नतीजा यह कि अब वे अर्थव्यवस्था को एक फिर धक्का देकर रीस्टार्ट करने की स्थिति में नहीं है। चीन के मंदी के एक लंबे दौर में जाने का खतरा इसलिए नहीं है कि निजी क्षेत्र निवेश नहीं करना चाहता बल्कि इसलिए है कि केन्द्र सरकार अपनी बैलेंस शीट को खराब करना नहीं चाहती। इसका सबसे बुरा नतीजा एवरग्रांड जैसे बड़े प्रापर्टी डेव्लपर्स को भुगतना पड़ेगा क्योंकि रियल स्टेट की तबाही के लिए स्थानीय सरकारों के अधिकारियों को कठघरे में खड़ा किया जाएगा। ये अधिकारी एक-दूसरे पर दोष मढेंगे – और ज्यादा बड़ी संख्या में लोग जेल की सलाखों के पीछे भेजे जाएंगे। चीनी ड्रेगन हांफने लगा है। (कॉपी: अमरीश हरदेनिया)

By श्रुति व्यास

संवाददाता/स्तंभकार/ संपादक नया इंडिया में संवाददता और स्तंभकार। प्रबंध संपादक- www.nayaindia.com राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समसामयिक विषयों पर रिपोर्टिंग और कॉलम लेखन। स्कॉटलेंड की सेंट एंड्रियूज विश्वविधालय में इंटरनेशनल रिलेशन व मेनेजमेंट के अध्ययन के साथ बीबीसी, दिल्ली आदि में वर्क अनुभव ले पत्रकारिता और भारत की राजनीति की राजनीति में दिलचस्पी से समसामयिक विषयों पर लिखना शुरू किया। लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों की ग्राउंड रिपोर्टिंग, यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के साथ अंग्रेजी वेबसाइट दिप्रिंट, रिडिफ आदि में लेखन योगदान। लिखने का पसंदीदा विषय लोकसभा-विधानसभा चुनावों को कवर करते हुए लोगों के मूड़, उनमें चरचे-चरखे और जमीनी हकीकत को समझना-बूझना।

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