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श्रुति व्यास

ईरान फैला रहा है लड़ाई!

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ईरान बेरहम, दुस्साहसी हो रहा है। इजराइल-हमास युद्ध का फायदा उठाकर वहां के अयातुल्ला, पूरे इलाके में एक व्यापक लड़ाई छेड़ना चाहते हैं – मगर एक व्यापक लड़ाई छेड़े बगैर। आंतरिक उथलपुथल के एक लम्बे दौर के बाद ईरान दुनिया को फिर अपनी ताकत दिखा रहा है। सन 2022 के अंत में हिजाब ठीक से न पहनने के जुर्म में गिरफ्तार एक महिला की हिरासत में मौत के बाद ईरान में आर-पार के प्रदर्शन हुए थे। लगने लगा था कि विरोध प्रदर्शनकारी कहीं सरकार को ही न उखाड़ फेंके। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ और आज डेढ़ साल बाद, न गुस्सा बचा है न विरोध। यह 2023 में नोबेल शांति पुरस्कार नरगिस उन मोहम्मदी को मिलने के बावजूद है जो ईरान में महिला एवं मानव अधिकारों के लिए आवाज़ उठाती रहीं हैं। उन्होने पिछले बीस सालों में अपनी ज़िन्दगी का अधिकांश हिस्सा जेलों में काटा है।

कुल मिलकर, मुल्लाओं की सरकार का पलड़ा फिर भारी है और नागरिक उनके चंगुल में। हाल में, ईरान को आर्थिक और राजनयिक मोर्चो पर भी कई सफलताएं मिली हैं। वह रूस के नज़दीक आया है और यूक्रेन के साथ लड़ाई के लिए रूस को हथियारों का प्रमुख सप्लायर बना है। तेल के निर्यात, विशेषकर चीन को, में भी बढोत्तरी हुई है। पिछले साल अगस्त में ईरान को ब्रिक्स का सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया गया और सितम्बर में कैदियों की अदला-बदली के एक समझौते के तहत अमेरिका ने ईरान की 6 अरब डॉलर की संपत्ति, जो उसने फ्रीज़ कर रखी थी, को मुक्त कर दिया।

इस समय पश्चिम एसिया में जो युद्ध चल रहा है, उसमें ईरान बहुत होशियारी से अपने पत्ते खेल रहा है। वह अपनी ताकत का प्रदर्शन अमेरिकी और इजराइली ठिकानों को ईराक, लेबनान, सीरिया, यमन इत्यादि से निशाना बनाकर कर रहा है। यह वह ‘एक्सिस ऑफ़ रेजिस्टेंस’ है जिसे ईरान ने पिछले कई दशकों में काफी मेहनत से विकसित किया है। लन्दन स्थित एक थिंकटैंक ‘इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज’ के अनुसार ईरान ऐसे स्थानों में अपनी पैठ बनाता है जहाँ शासन कमज़ोर हो, जहाँ हथियार और लड़ाके आसानी से पहुंचाए जा सकें और जहाँ कोई बाहरी ताकत ईरान को चुनौती न दे सके। ईरान अब इस स्थिति में है कि वह खुद दूर रहकर भी हमास, हिज़बुल्लाह, ईराक के शिया मिलिशियाओं और यमन के हूतियों आदि का इस्तेमाल कर कहीं भी उत्पात मचा सकता है। ईरान की अपनी सेना बहुत मज़बूत नहीं है। मगर इस नेटवर्क ने ईरान को बहुत ताकतवर बना दिया है।

ईरान लम्बे समय से हमास का मददगार रहा है मगर पश्चिमी जानकारों के अनुसार, उसे हमास के 7 अक्टूबर के इजराइल पर हमले के बारे में पहले से पता नहीं था। मगर उसने हमास के दमन के विरुद्ध प्रतिरोध की धुरी को एक्टिवेट कर दिया है। हिज़बुल्लाह और इजराइल, क्रमशः ईरान और अमेरिका के खुले समर्थन से, एक दूसरे पर हमले कर रहे हैं। अब तक हिजबुल्लाह के 19 लड़ाके मारे जा चुके हैं।

हूती, जिनका यमन की राजधानी पर नियंत्रण है, बार-बार लाल सागर में तेल के टेंकरों पर हमले कर रहे हैं और 800 किलोमीटर दूर तक वार करने वाली मिसाईलों से उन्हें निशाना बना रहे हैं। इससे बी ईरान को अपना दबदबा बढ़ाने का मौका मिला है क्योंकि स्वेज नहर से होने वाला व्यापार खतरे में पड़ गया है। उन्होंने इजराइल के बंदरगाह शहर ऐनात को निशाना बनाते हए तीन मध्यम दूरी की क्रूज मिसाईलें भी छोड़ीं और कई ड्रोन भी भेजे जिन्हें अमरीकी डिस्ट्रॉयर ने गिरा दिया। सीरिया और ईराक में ईरान समर्थित शिया लड़ाकों ने संघर्ष तेज कर दिया है और वे अमरीकी सैन्य अड्डों, जिनमें अमरीकी सैनिक रह रहे हैं, पर राकेटों और ड्रोनों से बार-बार हमले कर रहे हैं। पश्चिमी देश दो वजहों से हूतियों पर जवाबी हमले करने के इच्छुक नहीं हैं – पहला, इससे यमन के गृहयुद्ध में हुए युद्धविराम के खटाई में पड़ जाने का खतरा है, और दूसरा, हूतियों को पूरी तरह रोकना बहुत मुश्किल है। लेकिन हूतियों द्वारा बार-बार जहाजों पर किए जा रहे हमलों और उनके द्वारा अमरीकी हेलीकाप्टरों को निशाना बनाने से, अमरीकी अधिकारियों के मुताबिक,  उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है।

और अब ईरान ने पाकिस्तान के उन स्थानों को भी निशाना बनाया, जो उसके अनुसार पाकिस्तान में स्थित आतंकी शिविर थे। बदले की कार्यवाही करते हुए पाकिस्तान ने भी ईरान पर मिसाईल हमले किए।इस अप्रत्याशित हमलेबाजी, ईरान और पाकिस्तान का एक-दूसरे पर ताकत आजमाना कुल मिलाकर तेहरान के मुल्लाओं के हौसले, आक्रामकता का सबूत है।

शिया बहुमत वाला ईरान लंबे समय से खौल रहा है,  विशेषकर जबसे सऊदी अरब और इजराइल के रिश्ते सुधरने शुरू हुए हैं। बहरीन, मोरक्को, सूडान और संयुक्त अरब अमीरात के इजराइल से मधुर कूटनीतिक संबंध स्थापित होने के बाद ईरान के अयातुल्लाओं को यह फूटी आंख नहीं सुहाएगा कि सुन्नी-नेतृत्व वाले मुस्लिम देशों और इजराइल का सहयोग और बढ़े। हमास के हमले और उसके बाद इजराइल द्वारा छेड़े गए युद्ध से ईरान को एक मौका हाथ लग गया है। यद्यपि ईरान पश्चिम और उसके मित्रों के साथ युद्ध नहीं चाहता लेकिन वह स्वयं इसके खतरे को बढ़ा रहा है।

इस बीच शांति के एक दौर के बाद ईरान की अंदरूनी राजनीति में दुबारा कटुता घुल गई है। देश के मूड को दर्शाते एक कार्टूनिस्ट में दिखाया गया है कि एक अयातुल्ला इजराइल का झंडा बिछा रहा है ताकि लोग उसे अपने तले कुचल सकें।बावजूद मगर देश आर्थिक मुसीबतों में फंसा हुआ है। क्लाइमेट चेंज का असर भी है। अमरीकी प्रतिबन्ध जारी हैं और चीन जैसे देश वहां निवेश करने के लिए तैयार बैठे हैं। सऊदी अरब निवेश करने से पहले यह वायदा चाहता है कि ईरान अपने मुख्तारों को समर्थन देना बंद कर दे। यह भी कहा जा रहा है खमेनी बहुत कमज़ोर हो गए हैं और लम्बे समय तक राजकाज नहीं चला सकेंगे। उनका उत्तराधिकारी तय नहीं है इसलिए कई ईरानियों को लगता है कि उत्तराधिकार को लेकर विवाद से सरकार कमज़ोर होगी। इसके बाद भी ईरान अपने आप को युद्ध में धकेल रहा है और पश्चिम और उसके साथियों के कोप का भाजन बन रहा है। ईरान ने जिस ढंग से ‘एक्सिस ऑफ़ रेजिस्टेंस’ को एक्टिवेट किया है, उससे ऐसा लगता है कि जल्द ही वह अकेला पड़ जायेगा ।

सो एक बड़ा, विनाशकारी युद्ध क्षितिज पर मंडरा रहा है। और दुनिया सांसत में है। (कॉपी: अमरीश हरदेनिया)

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By श्रुति व्यास

संवाददाता/स्तंभकार/ संपादक नया इंडिया में संवाददता और स्तंभकार। प्रबंध संपादक- www.nayaindia.com राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समसामयिक विषयों पर रिपोर्टिंग और कॉलम लेखन। स्कॉटलेंड की सेंट एंड्रियूज विश्वविधालय में इंटरनेशनल रिलेशन व मेनेजमेंट के अध्ययन के साथ बीबीसी, दिल्ली आदि में वर्क अनुभव ले पत्रकारिता और भारत की राजनीति की राजनीति में दिलचस्पी से समसामयिक विषयों पर लिखना शुरू किया। लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों की ग्राउंड रिपोर्टिंग, यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के साथ अंग्रेजी वेबसाइट दिप्रिंट, रिडिफ आदि में लेखन योगदान। लिखने का पसंदीदा विषय लोकसभा-विधानसभा चुनावों को कवर करते हुए लोगों के मूड़, उनमें चरचे-चरखे और जमीनी हकीकत को समझना-बूझना।

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