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जापान “आयरन लेडी” की कमान में!

इन दिनों दुनिया की सबसे ताकतवर महिला के रूप में “आयरन लेडी” सानाए ताकाइची वैश्विक चर्चा के केंद्र में हैं। जापान में उनके प्रचंड बहुमत ने उन्हें सुर्खियों में ला खड़ा किया है। लेकिन यह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं है, यह जापान के राजनीतिक इतिहास का एक प्रतीकात्मक मोड़ भी है। उस देश में, जहाँ दशकों तक सत्ता कुछ चुनिंदा राजनीतिक परिवारों और जमे हुए गुटों के बीच घूमती रही, वहाँ पहली महिला प्रधानमंत्री का उभार एक नई कहानी की शुरुआत जैसा है। यह केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं, राजनीतिक संस्कृति में बदलाव का संकेत भी है। ऐसे देश में, जहाँ दशकों तक सत्ता नेटवर्क और विरासत से चलती रही, यह बदलाव गंभीर मायनों वाला है।

कहानी केवल विशेषणों की नहीं है। असली सवाल यह है कि यह जीत किस समय में हुई है। आज लोकतंत्रों में नेता व्यवस्था से थकी जनता की उम्मीदों पर सवार होकर उभरते हैं। वे सख्त नेतृत्व का संकेत देते हैं, संस्थाओं की धीमी चाल से असंतोष को दिशा देते हैं और राजनीति को व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द केंद्रित करते हैं। ताकाइची इसी दौर की उपज हैं—संतुलित अंदाज़ में जनोन्माद की भाषा बोलती हुईं, और यह भरोसा दिलाती हुईं कि वे अनिश्चित समय में स्थिर हाथ साबित होंगी।

सानाए ताकाइची स्वयं की अर्जित पहचान चुनाव जीती है। उन्होंने पार्टी की सीढ़ियाँ अपने दम पर चढ़ीं है। उनकी अपील इस बात पर कि उनकी सत्ता दावेदारी किसी पारिवारिक विरासत से नहीं बल्कि खुद के दम पर है।

चौंकाने वाली बात यह है कि 64 साल की उम्र में भी वे युवा मतदाताओं के बीच लोकप्रिय हैं, जबकि वे सामाजिक रूप से रूढ़िवादी विचार रखती हैं। वे समलैंगिक विवाह और अलग उपनाम रखने के खिलाफ हैं। फिर भी 18 से 29 वर्ष के युवाओं में उनका समर्थन मजबूत है। यह दिखाता है कि युवा राजनीति अब पहले आर्थिक मुद्दों से जुड़ती है, विचारधारा बाद में आती है।

ताकाइची की शैली शोर भरी नहीं है बल्कि वे संतुलन भरी है। वे मंच की ताकत समझती हैं, कैमरे की भाषा जानती हैं और प्रतीकों का इस्तेमाल सोच-समझकर करती हैं। पर असली परीक्षा लोकप्रियता की नहीं, शासन की है। क्या वे इस जनोन्मादी ऊर्जा को स्थिर नीति में बदल पाएँगी? क्या उनकी छवि संस्थाओं को मजबूत करेगी या केवल नेतृत्व को और केंद्रीकृत? आज की राजनीति का यही मूल प्रश्न है—व्यक्तित्व की चमक बनाम व्यवस्था की स्थिरता।

उनका व्यक्तित्व संतुलित है। वे आक्रामक शैली नहीं अपनातीं, बल्कि शांत और संयत दिखती हैं। जहाँ जनोन्मादी राजनीति अक्सर उत्तेजना पर चलती है, वहाँ उनका तरीका अपेक्षाकृत स्थिर लगता है।

वे मार्गरेट थैचर से प्रभावित हैं और अक्सर अपना काला बैग साथ रखती हैं, जो आयरन लेडी की याद दिलाता है। आज की राजनीति में प्रतीक भी संदेश बन जाते हैं। ताकाइची केवल प्रतीक तक सीमित नहीं रहतीं। उनका अंदाज़ मंचीय है। एक शिखर सम्मेलन में उन्होंने दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति के साथ ड्रम बजाया। यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया। जापान की पारंपरिक कूटनीति में ऐसा दृश्य नया था।

उनकी लोकप्रियता इतनी है कि उनका अपना प्रशंसक समूह बन गया है। लोग उनके वीडियो साझा करते हैं, उनके कपड़े और सामान अपनाते हैं। यह राजनीति और पॉप संस्कृति का मेल है। साथ ही वे लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर एक अलग छवि पेश करती हैं। इस पार्टी पर लंबे समय से बंद कमरे की राजनीति के आरोप रहे हैं। ताकाइची मेहनत और अनुशासन की बात करती हैं — सुबह जल्दी दफ्तर पहुँचना, फाइलों पर काम करना और “वर्क, वर्क, वर्क” दोहराना।

वैश्विक स्तर पर भी यही रुझान दिख रहा है। कई लोकतंत्रों में दक्षिणपंथी नेता जनभावनाओं को राजनीतिक शक्ति में बदल रहे हैं। ताकाइची भी उसी प्रवृत्ति का हिस्सा हैं। वे जापान की ऐसी नेता हैं जो कहानी कहने में सक्षम हैं और मंच पर सधे हुए दिखती हैं।

अब असली सवाल शासन का है। क्या वे केवल लोकप्रियता तक सीमित रहेंगी या संतुलित नेतृत्व दे पाएँगी? चीन और ताइवान पर उनका सख्त रुख महत्वपूर्ण है। जापान की भौगोलिक स्थिति और सुरक्षा जरूरतों को देखते हुए व्यावहारिक नीति जरूरी है।

यदि वे यासुकुनी श्राइन जाती हैं तो पड़ोसी देशों के साथ संबंध प्रभावित हो सकते हैं। अगर वे विदेशियों के खिलाफ सख्त भाषा अपनाती हैं तो यह जापान की श्रम जरूरतों पर असर डाल सकता है।

उन्होंने मतदाताओं से पूछा था — क्या आप अशांत समय में मुझ पर भरोसा करते हैं? जवाब था — हाँ। ऐसे जनादेश दुर्लभ होते हैं, लेकिन स्थायी नहीं। मजबूत नेता देश को स्थिर करने के लिए चुने जाते हैं। वे संस्थाओं को मजबूत करेंगे या सिर्फ अपनी छवि को — यही उनकी असली पहचान तय करेगा।

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By श्रुति व्यास

संवाददाता/स्तंभकार/ संपादक नया इंडिया में संवाददता और स्तंभकार। प्रबंध संपादक- www.nayaindia.com राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समसामयिक विषयों पर रिपोर्टिंग और कॉलम लेखन। स्कॉटलेंड की सेंट एंड्रियूज विश्वविधालय में इंटरनेशनल रिलेशन व मेनेजमेंट के अध्ययन के साथ बीबीसी, दिल्ली आदि में वर्क अनुभव ले पत्रकारिता और भारत की राजनीति की राजनीति में दिलचस्पी से समसामयिक विषयों पर लिखना शुरू किया। लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों की ग्राउंड रिपोर्टिंग, यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के साथ अंग्रेजी वेबसाइट दिप्रिंट, रिडिफ आदि में लेखन योगदान। लिखने का पसंदीदा विषय लोकसभा-विधानसभा चुनावों को कवर करते हुए लोगों के मूड़, उनमें चरचे-चरखे और जमीनी हकीकत को समझना-बूझना।

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