nayaindia US presidential election जो बाइडन: कठिन है डगर पनघट की
श्रुति व्यास

जो बाइडन: कठिन है डगर पनघट की

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अमेरिका एक बड़ा तबका परेशानहाल है। कारण: हाल में हुए जनमत सर्वेक्षणों के नतीजे। जो बाइडन अपने रिपब्लिकन प्रतिद्वंदी डोनाल्ड ट्रंप से पिछड़ रहे हैं। न्यूयार्क टाईम्स और सिएना कालेज के जनमत सर्वेक्षण से मालूम पड़ा कि प्रमुख राज्यों में ट्रंप, बाइडन से 10 पॉइंट आगे हैं। एनबीसी न्यूज द्वारा करवाए गए राष्ट्रस्तरीय जनमत सर्वेक्षण में ट्रंप, बाइडन से बहुत थोड़े अंतर पाए गए। इन परस्पर विरोधी आंकड़ों ने डेमोक्रेटों, बुद्धिजीवियों, अध्येताओं, डेमोक्रेट मतदाताओं और अमरीका के शुभचिंतकों के बीच चिंता की लहर पैदा कर दी है। यह साफ है कि बाइडन में लोगों का भरोसा कम हो रहा है।

और यह इस तथ्य के बावजूद कि जो बाइडन का पहला कार्यकाल काफी हद तक सफल कहा जा सकता है। वे देश के हालात सामान्य बना सके। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती को, देश को और अधिक नुकसान नहीं पहुंचाने दिया। उन्होंने यूक्रेन पर हुए आक्रमण और इजराइल-हमास युद्ध – दोनों मामलों में दृढ़ता का परिचय दिया।

लेकिन इसके बावजूद चुनावों के एक साल पहले बाइडन देश की पहली पसंद नहीं हैं। सवाल है कौनसी बातें उनके खिलाफ जा रही हैं? सबसे मुख्य है उनकी आयु। हालांकि मेरा मानना है कि उनकी उम्र मात्र एक नंबर होती है और उनकी चुस्ती-फुर्ती को देखते हुए लगता है कि उनकी आयु के मुद्दे को जरूरत से ज्यादा तूल दिया जा  रहा है। वैसे ट्रंप भी युवा नहीं हैं! किंतु सीएनएन के हालिया राष्ट्रीय जनमत सर्वेक्षण में भी ट्रंप को बाइडन से चार प्रतिशत आगे बताया गया है।

केवल एक-चौथाई लोगों ने माना कि राष्ट्रपति में “अपना काम करने लायक शारीरिक और मानसिक क्षमता है” जबकि 77 वर्षीय ट्रंप के बारे में आधे से अधिक लोगों ने कहा कि ट्रम्प में यह क्षमता है। इससे यह स्पष्ट है कि बहुत से लोगों ने आयु के आधार पर अपनी पसंद तय की है।

दूसरा मसला जनता तक अपनी बात पहुंचाने काहै। बाइडन और उनका प्रशासन जनता को अपने बेहतर काम से वाकिफ नहीं कर पाया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले चार सालों में बाइडन ने अमेरिका को डावांडोल स्थिति से निकालकर वहां स्थिरता कायम की है – चाहे हम अर्थव्यवस्था के बात करें या विदेश नीति की। लेकिन वे ‘बाइडनोमिक्स’ जैसी उनके लिए घातक ब्रांडिंग में उलझ गए हैं। उन्होंने अमेरिका को यह भरोसा दिलाने का प्रयास किया कि लोग जितना अच्छा महसूस कर रहे हैं, उन्हें उससे ज्यादा बेहतर महसूस करना चाहिए क्योंकि प्रमुख आर्थिक संकेतक सकारात्मक हैं। मगर वे यह कर नहीं सके। दरअसल, मतदाताओं के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है बढ़ती कीमतें और वे केवल अर्थव्यवस्था सम्बन्धी आंकड़ों को देखकर इस महंगाई को भुलाने को तैयार नहीं हैं।

अमेरिका में राष्ट्रपति पद की दौड़ में सामान्यतः वही उम्मीदवार सफलता हासिल करता है जो वोटिंग के समय मतदाताओं का प्रिय होता है। बाइडन की 2020 में यही स्थिति थी लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि 2024 में ऐसा होगा या नहीं। हालांकि बाइडन के पास हालात सुधारने के लिए और लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए समय है। चुनाव अभी एक साल दूर हैं और राजनीति में एक साल बहुत लम्बा होता है।

जो हो, ताजा जनमत सर्वेक्षणों से यही नजर आता है कि अमरीकी लोग गलत घोड़े पर दांव लगाने की दिशा में बढ़ रहे हैं। ऐसा लगता है कि या तो वे डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल को भूल चुके हैं या वे उन्हें माफ कर चुके हैं या उसे महत्व नहीं देना चाहते – उस कार्यकाल को जिसमें ट्रम्प ने लोकतंत्र के मानदंडों को तहस-नहस कर दिया था। मगर यह उम्मीद बाकी है कि आने वाले महीनों में शायद कोई बात या शायद कोई व्यक्ति मतदाताओं को झकझोरेगा जिससे वे अपनी आत्मघाती मानसिकता से बाहर आ सकें। (कॉपी: अमरीश हरदेनिया)

By श्रुति व्यास

संवाददाता/स्तंभकार/ संपादक नया इंडिया में संवाददता और स्तंभकार। प्रबंध संपादक- www.nayaindia.com राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समसामयिक विषयों पर रिपोर्टिंग और कॉलम लेखन। स्कॉटलेंड की सेंट एंड्रियूज विश्वविधालय में इंटरनेशनल रिलेशन व मेनेजमेंट के अध्ययन के साथ बीबीसी, दिल्ली आदि में वर्क अनुभव ले पत्रकारिता और भारत की राजनीति की राजनीति में दिलचस्पी से समसामयिक विषयों पर लिखना शुरू किया। लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों की ग्राउंड रिपोर्टिंग, यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के साथ अंग्रेजी वेबसाइट दिप्रिंट, रिडिफ आदि में लेखन योगदान। लिखने का पसंदीदा विषय लोकसभा-विधानसभा चुनावों को कवर करते हुए लोगों के मूड़, उनमें चरचे-चरखे और जमीनी हकीकत को समझना-बूझना।

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